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कविता -- नरेन्द्र कुमार -- मीठा एहसास


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-नरेन्द्र कुमार
मीठा एहसास


एक किलोमीटर दूर
रहता है
मेरी बूढ़ी हड्डियों का
सहारा
सुनना चाहता था मैं
उसकी दस्तक जो
नहीं सुनाई दी मुझे आज तक
मैं ही चला जाता हूँ
गांधी को सुन
कसरतों की रानी के पास
सप्ताह में एक बार
पैदल
भूल जाता है उसे लेकर
चढ़ा गर्द-ओ-गुबार,
तनाव
बढ़ती उम्र की चटकती हड्डियों का
कोलाहल
यह मन पागल
मानते हुए निकल पड़ता है
ले विचार
हर वस्तु, प्रकरण का
सिरा होता है
ज्ञात या अज्ञात
एक आकृति के साथ शायद
टैगोर यह सब जानते थे
उम्रदराजों का बच्चों के साथ
सान्निध्य
आकर्षक फूलों की महक के साथ
नाना रंगों का मिलन
तनाव हर लेता है
परन्तु
वापस मुड़ते ही
ख़्याल आता है
कल जब यह बच्चा
बड़ा हो जायेगा
मेरे बच्चों को खूब रुलायेगा
सोचता बहुत हूँ
पर कुछ कर नहीं सकता
पा लेता हूँ
यू ही दो पलों का
मीठा एहसास।

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सम्पादक-दिवान
सी0 004 उत्कर्ष अनुराधा,
सिविल लाईन्स, नागपुर-440001

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कविता -- डॉ0 वेद ‘व्यथित’ -- यक्ष प्रश्न


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 वेद ‘व्यथित’
यक्ष प्रश्न


तुम्हारे मन में
असामयिक मेघों की भाँति
उमड़ते-घुमड़ते प्रश्नों का उत्तर
इतना सरल नहीं था
क्योंकि वे अर्जुन का विषाद नहीं थे।
कुन्ती का पुत्र मोह भी
कहाँ था उनमें
गांधारी का पुत्र सत्य का
विजय का आशीर्वाद
नहीं थे वे
क्योंकि वे तो
प्रतिज्ञाओं की शंखला में आबद्ध
कृत्रिम सत्यान्वेषण को
ललकारने की
स्वीकृति भर चाहते थे
ताकि दुःख की बदली से भरकर
निरभ्र हो जाएँ
और खून ये आँसुओं की
धारा से प्लावित कर दे
उन उत्तरों को
जो बोझ की भाँति
धर दिये हैं
जबरदस्ती
दहकते कलेजे पर।।

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अनुकम्पा
1577 सैक्टर-3, फरीदाबाद-121004

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कविता -- राजेन्द्र ग्रोबर -- मन समय के साथ अलग न हो पाता


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-राजेन्द्र ग्रोबर
मन समय के साथ अलग न हो पाता



दिन भर भटकता रहता मन,
क्या बात करें
क्या न करें
रात्रि के अंधेरे में भी, न मिला आराम,
थक गया मन व तन
स्वप्न में भी,
रात की भटकन,
दिवस की धड़कन,
जग किस वस्तु से
किस भाव से, विचार से,
मिश्रित है
या अलग है
जब तक साँस है
तब तक आस है,
समय को कौन देख सकता,
केवल आभास करता
मन समय के साथ
अलग न हो पाता।

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771-हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी,
अम्बाला छावनी (हरियाणा) 133001

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कविता -- कुन्दन पाटिल -- पैसा क्या है?


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-कुन्दन पाटिल
पैसा क्या है?


पैसा क्या है?
इस संसार के
व्यवहार को चलायमान
रखने का माध्यम।
पैसा क्या है?
मेहनत का मोती
सुख की रोटी
आत्म-स्वाभिमान का सूख।
पैसा क्या है?
व्यवहार का दर्पण
शोहरत पिपासा
अहंकार की जड़।
पैसा क्या है?
मोहपाश का बंधन
माया का जाल
क्रम का है चक्र।
पैसा क्या है?
दुश्मनी का पदार्पण
भाई का भाई से बैर
अलगाव की गाथा।
पैसा क्या है?
मन की प्यास
सख की आस
पैसों की भूख।

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129 नयापुरा,
मराठा समाज, देवास (म0प्र0)

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कविता -- राजेन्द्र ग्रोबर == भूली-भूली नज़में, भूली-भूली दास्तां


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-राजेन्द्र ग्रोबर
भूली-भूली नज़में, भूली-भूली दास्तां


भूली-भूली नज़में, भूली-भूली दास्तां
गीत संगीत डांवाडोल हुआ
अक्षरों का शब्दों से न मेल हुआ।
मार्ग लेखन का टेढ़ा मेढ़ा
उधर पंगडडियों ने डाला घेरा,
रास्ते का वास्ता घनेरा
बारम्बार लगाता फेरा।
हम क्या समझे, वे क्या समझे,
समझाने की जरूरत भी कैसे,
जब दिल के अरमां भटक गये जीवन डगर में
फिर क्या पड़ा अगर मगर में।
यौवन-जर का मेल टेढ़ा
क्या रात क्या सबेरा।
भूली-भूली नज़में, भूली-भूली दास्तां।

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771-हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी,
अम्बाला छावनी (हरियाणा) 133001

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कविता -- डॉ0 महेन्द्र भानावत -- अन्तहीन यात्राओं के लिए अनाम


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 महेन्द्र भानावत
अन्तहीन यात्राओं के लिए अनाम


बार-बार तुमने मेरा नाम पूछा
मैं क्या बताऊँ अपना नाम
नाम तो श्री भगवान का।
क्या धरा है मेरे नाम में
कई नाम रहे होंगे मेरे
पिछले जन्मों में
मैं कई जन्मों का संस्करण हूँ।
वे सब जन्म छाया की तरह
लुके हैं मेरे साथ
जो दिखाई नहीं देते।
वे अदृश्य में
संस्कार शील और स्मृतियों से
पूरते हैं मुझे
परिपूर्ण करने की कोशिश करते हैं।
मैं फिर इस जन्म में उलझ गया हूँ
इसीलिए तो कहा है -
जनम-जनम का फेरा रे
मैं कहाँ-कहाँ अब
डालूँ अपना डेरा रे
सब यहीं पड़ा रह जाना रे
मिटटी हो या कि खजाना रे
क्या तेरा क्या मेरा रे
जनम-जनम का, फेरा रे।
माँ ने बताया था मुझे
कि मैं माता जी की मनौती से हुआ हूँ
पालना बँधाया गया था
नाक में नथड़ी पहनाई थी
और नाम दिया था नत्थू
जिसका तोरण पर सासुमां ने
नारक्या दिया था।
यह टोटका था
वैवाहिक जीवन की दीर्घजीवी खुशी का
तभी तो पहली बच्ची हुई
नाम रखा गया था खुशी।
यों मैं थावर को हुआ था
सो पास में रहने वाले
भीमा भाया ने मुझे
थावर्या कहना शुरू कर दिया था।
नाक बहुत बहने के कारण
भुवा ने लाड़ में मुझे हेबड़ कह दिया
और बहुत रोने के कारण
रोड़ी के हवाले कर दिया
तब एक नाम
रोड़या भी पड़ गया।
माँ जब बीमार हो गई
तो मौसी ने पाला
मेरा नाम रोड़ीवाला रतन कर दिया।
फिर महादेव के मेले में
ले गये चाचा
वहाँ गुदने वाला था
उन्होंने मेरे हाथ पर
मिठू गुदवा दिया
बोले -
जब मैं चार माह का था
तभी ऊँची मेड़ी में
पालने में झूलते समय
कहीं से
एक मिठू उड़ता हुआ आया
और मेरे संग झूलने लग गया।
पहली बार जब मुझे
स्कूल ले जाया गया
दादी ने दाख खाने को दी
दादा छोटी थड़ी के थे
ठिंगने
सफेद दाढ़ी लिए
उनके सिर पर
सफेद लम्बे बालों के
तीन बड़े पट्टे थे।
भैंस के सींगड़े से बने
महीन दाँतों वाले
धनुषाकार कांगसिये से
वे बाल सँवारा करते थे
उन्होंने आशिष दिया
मदन मस्त रहो।
पिताजी सरवण पूत थे
अतः उन्होंने स्कूल में
मेरा नाम मदन लिखवा दिया।
दूसरे ही दिन
लड़कों ने मुझे चिढ़ाना शुरू किया-
मदन मदारी
फूटी तगारी
तगारी में तेल
मदन होग्यो फेल।
मैंने घर आकर
धाड़ापाड़ रोना शुरू कर दिया
लगा जैसे आसमां से
बदली फट गई
पूरे मोहल्ले की आँखें
मेरी ओर अट गईं।
उन्हीं दिनों देश आजाद हो गया
मारे खुशियों से सब लपके
हम भी दूसरी से
चौथी में जा टपके
नई हवा और रोशनी से
पूरा स्कूल भर दिया
माड़साब ने मेरा नाम
मदन से महेन्द्र कर दिया।
मैं इस जनम में ही
कई नामों से गुजरता रहा हूँ
अब मैं अनाम होना चाहता हूँ
अगली अन्तहीन यात्राओं के लिए।
वे सब लोग
जिनमें से आधे अब नहीं रहे
जब भी मिलते हैं
मुझे उन्हीं नामों से पुकारते हैं
नत्थू, थावर्या, हेबड़, रोड़्या,
रतन, मिठु, मदन
मैं इन सब नामों से बोलता हूँ
जानता हूँ
नाम में क्या धरा है।

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352 श्रीकृष्णपुरा,
सेंटपॉल स्कूल के पास, उदयपुर-313001

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कविता -- सुकीर्ति भटनागर -- दिन कहता है


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-सुकीर्ति भटनागर
दिन कहता है


दिन कहता है चलो सदा तुम,
जैसे सूरज चलता है।
दिन कहता है हँसो सदा तुम,
फूल-फूल ज्यों हँसता है।।
बच्चो तुम जीवन का हो सुख,
तुम जीवन की आशा हो।
तुम आगत के सच्चे सपने,
माँ भारत की भाषा हो।।
दिन कहता है बढ़ो सदा तुम,
जैसे गौरव बढ़ता है।
दिन कहता है चढ़ो सदा तुम,
शिखर-शिखर पग चढ़ता है।।
हर निराश संध्या से कहना,
रात नहीं रुक पाएगी।
आशाओं के सुन्दर-सुन्दर,
फूल सुबह चुन लाएगी।।
दिन कहता है रुको नहीं तुम,
झर-झर झरना बहता है।
दिन कहता है झुको नहीं तुम,
गगन छत्र बन रहता है।।

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432, अरबन एस्टेट फेज-1
पटियाला-147002

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कविता -- देवेन्द्र कुमार मिश्रा == नीचे-ऊपर वाले


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-देवेन्द्र कुमार मिश्रा
नीचे-ऊपर वाले


ऊँचाई से हर चीज
छोटी दिखाई देती है
और नीचे से हर ऊपरी चीज
आश्चर्य से भरपूर।
ऊँचाई वाला हमेशा ऊँचाई
पर ही बना रहना चाहता है
वह नीचे वाले को देखता है
दया या हिकारत की दृष्टि से,
नीचे वाला ऊपर जाना चाहता है
ऊँचाई उसकी मंजिल है,
ऊँचाई पर बैठा उसका आदर्श।
नीचे वाला जब ऊपर उठता है
तो ऊपरवाला उसे आसानी से
ऊपर नहीं आने देता
प्रयास करता है हरसंभव उसे गिराने का
उसे अपनी सत्ता डोलती नजर आती है
वह नहीं चाहता अपना प्रतिद्वन्द्वी
हर नीचे वाला ऊपर आने लगेगा
या कोशिश करेगा
तो ऊपरवाले की क्या रह जायेगी
उसे आदर्श, भगवान कौन मानेगा
कौन उसकी सेवा अर्चना करेगा।
नीचे विद्रोह न हो सो कभी-कभार
ऊपरवाला कुछ सिक्के उछाल देता है नीचे
नीचे वाले सिक्के को झपटने पाने के
चक्कर में आपस में उलझे रहते हैं
और शुक्रिया अदा करते हैं ऊपर वाले का
कभी कोई साहस करके, संकटों को पार
करके पहुँच जाता है ऊपर।
नीचे वालों को आस
बँधती है कुछ।
किन्तु ऊपर पहँुचते ही
उसे सभी नीचे वाले
बौने लगते हैं
वह अपने को नीचे
की जमात से हटाकर
ऊपर वालों की जमात में
शामिल कर लेता है
अब वह स्वीकार ही नहीं करता
कि वह कभी नीचे था
उसे तो लगता है कि वह हमेशा से
ऊपर ही था।
ऊँचाई बनाये रखने के लिए
वह नीचे वालों को उलझाकर
रखता है धर्म-जाति-भाषा
रोटी, कपड़ा, मकान के चक्रव्यूह में
नीचे वाले आवाज लगाते हैं
ऊपरवाले अनसुनी कर देते हैं
नीचे वाले आवाज उठाते हैं
ऊपरवाले राहत राशि, सामग्री
फेंक देते हैं
नीचे वाले दया-दृष्टि मान
धन्यवाद देते हैं।

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जैन हार्ट क्लीनिक के सामने, एस0ए0एफ0 क्वार्टर्स,
बाबू लाइन परासिया रोड, छिन्दवाड़ा (म0प्र0) 480001

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कविता -- मालती शर्मा -- आत्म-निर्णय के क्षणों में


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-मालती शर्मा
आत्म-निर्णय के क्षणों में


तुम्हारा यह रास्ता
बन्द नहीं हुआ है
एक बड़ी भारी आँधी आने से
सदियों से खड़े पेड़ गिरने से
अवरुद्ध हो गया है।
आत्म-निर्णय के इन क्षणों में
तुम चींटी, बंदर, चूहा, कछुआ, कंगारू
कुछ भी हो सकते हो
या फिर शामिल होने को
जाने वाला कोई भी काफिला चुन सकते हो
या...प्रतीक्षा कर सकते हो
किसी क्रेन केे आने की
पर यह भी सच बात है कि
इन बड़े दरख्तों के गिरने से
राजपथ जरूर रुक गया है
पर अब साफ दिखने लगे हैं
उनकी सघनता में ओझल रहे
दूर तक फैले धरती-आकाश
और खुली-खुली दिशायें
आओ हम, ऐसा करें......
इस कीचड़ में ठहरे पानी में
कोई ईट या पत्थर का टुकड़ा डालकर
क्यों न कोई पगडंडी बनायें
राजपथ के इधर उधर कदम रखकर
और चल पड़े उन अनजानी दिशाओं की ओर
जिधर पंखी पखेरू
आँधी में यहाँ पेड़ गिर जाने पर
उड़कर गये हैं
अपने हाल के जन्मे बच्चे लेकर।

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1034/1 मॉडल कॉलोनी,
कैनाल रोड, पुणे-411016

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कविता-ग़ज़ल -- देवी नागरानी


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-देवी नागरानी


ये है पहचान, एक औरत की
माँ, बहन, बीवी, बेटी या देवी
अपने आँचल की छाँव में सबको
दे रही है पनाह औरत ही
दरिया अश्कों का पार करती वो
ज़िन्दगी के भँवर में जो रहती
दुनिया वाले बदल गये लेकिन
एक मैं ही हूँ जो नहीं बदली
जितनी ऊँची इमारतें हैं ये
मैं तो लगती हूँ उतनी ही छोटी
बेनकाबों की भीड़ में ‘देवी’
खुद को पर्दानशीं नहीं करती

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ग़ज़ल


खुदा तू है कहाँ ये ज़िक्र ही सबकी जुबां पर था
जमीं पर तू कहाँ मिलता हमें तू आसमां पर था
वफ़ा मेरी नज़रअंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का ज़िक्र कल जिनकी जुबाँ पर था
भरोसा दोस्त से बढ़कर किया था मैंने दुश्मन पर
मेरा ईमान हर लम्हा मक़ामे -इम्तहां पर था
बड़ा ज़ालिम लुटेरा था वो जिसने नोच ली इस्मत
मगर इलजाम बदकारी का आखि़र बेजुबाँ पर था
ये आँसू, दर्दो-ग़म, आहें सभी हैं मस्अले दिल के
मुहब्बत का ज़माना बोझ इक क़लबे-जवाँ पर था
गुज़ारी ज़िन्दगी बेहोश होकर मैंने दुनियाँ में
मेरा विश्वास सदियों से न जाने किस गुमाँ पर था
बहुत से आशियाने थे गुलिस्तां में, मगर ‘देवी’
सितम बर्क़े-तपां का सिर्फ मेरे आशियाँ पर था।

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9 डी कॉर्नर व्यू सोसायटी,
15/33 रोड, बान्द्रा (वेस्ट), मुम्बई-400080

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कविता -- डॉ0 शशिकला त्रिपाठी -- कमरों में कैद घर


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 शशिकला त्रिपाठी
कमरों में कैद घर


घर वही था
जिसमें रहती थी माँ
लट्टू जैसी नाचती माँ।
सदा के लिए बनती ’अन्नपूर्णा’
तो दादी के लिए ’दर्दनाशक-गोली’
बाबू जी के लिए बनती ’उर्वशी-रम्भा’
तो बच्चों के लिए ’गुड़िया-गुड्डा’
माँ हरेक की जरूरत थी।

चूल्हे की दहकती लपटें
कलाइयों को कर देती हों भले स्याह-लाल
मगर माँ के हाथ कभी नहीं रुके
वे रोटियाँ बनाती थीं
गोल-गोल चंदा जैसी फूली हुई,

थाली परोसकर पंखा झलतीं बाबूजी को
गर्मी की उमसभरी दुपहरिया में
करती थीं बातें हल्की-फुल्की ही
ताकि बेस्वाद न हो भोजन,
बच्चों को सिखाती स्लेट पर क लिखना
तो कभी रटातीं पहाड़ा सब्जी काटते हुए
बनाती कभी गीली मिट्टी के आम-अमरूद
तो कभी कागज के नाँव और जहाज
तब पूरे घर में उष्मा की अन्तरंगता की
उठतीं थीं पेंगे अनकहे सहयोग की

क्षण हो, हँसी या रुँदन का
स्वरों में होती थी रुकरुपता
आधुनिक संसाधनों के अभाव में भी,

परन्तु अब उस घर में
माँ नहीं थी, उनकी बहुएँ हैं
वे नहीं बेलतीं रोटियाँ गोल-गोल
बेलतीं हैं अण्डाकार-वर्गाकार
पृथ्वी की तरह परिभाषा बदलने को तत्पर
वे पकाती हैं ईर्ष्या-द्वेष चावल के भगोने में
भौतिकता व फैशन के होड़ में
वे धंसी हुई स्त्रियाँ हैं भोग भँवर के गड्ढे में
अब, घर में बन गये हैं कई कमरे
और कमरों में कैद हो गया है ‘घर’

==================================
उपाचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग,
वसन्त महिला महाविद्यालय,
राजघाट, वाराणसी-221001

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कविता -- गुरू प्रताप शर्मा ‘आग’ -- असभ्यता के रखवाले


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-गुरू प्रताप शर्मा ‘आग’
असभ्यता के रखवाले



आतंक और अपराधों के, धागों से बुना कफन दोगे,
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
अत्याचारों की बाढ़ से टूट जायें अगर किनारे ही,
हाथों में हथियार थामके उठ खड़े होंगे बेचारे भी,
ये मत सोचो झुके हुए सिर कभी नहीं तन पायेंगे,
बादलों से ही कभी, बरस सकते हैं अंगारे भी।
औलादों को अपनी क्या जलता हुआ गगन दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
रोज रोज है बिखर रहा ये देश क्यों देख नहीं पाते,
गालों पर पड़े तमाचों से भी सबक सीख नहीं पाते,
बढ़ रहे हैं नौनिहालों के पग किस ओर ये देखो तो,
अपनी ही संतानों के बहके कदम रोक नहीं पाते।
उन्हें चाँद के रूप में, क्या सूरज को लगा ग्रहण दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
चारों ओर धमाके होंगे, आतंक में डूबा शहर होगा,
अपने ही भ्रष्ट आचारों का, वह चौथा प्रहर होगा,
अन्यायी राहों की दौलत, काम न उनके आयेगी,
पीने को बस आँसू होंगे या इक जाम जहर होगा।
कहाँ रखेंगे पाँव बेचारे क्या टूटा हुआ वतन दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
भूख की भीषण लपटों में सहृदयता जल जायेगी,
ये छद्म शांति पिघलेगी हथियारों में ढल जायेगी,
बागी हो जायेंगी कलमें पैरवी करेंगी धमाकों की,
और किताबों के पन्नों से अराजकता उबल आयेगी।
उन शोलों से बचने को, उन्हें लाक्षा भवन दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।

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अंगरस गौड़ भवन,
घोटुर्ली, उमरेड, नागपुर-441204

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कविता -- डॉ0 रीता हजेला ‘आराधना’ -- काम पर जाती स्त्री, चालक सीट पर स्त्री


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 रीता हजेला ‘आराधना’
काम पर जाती स्त्री


काम पर जाती स्त्री
निपटा चुकी होती है काम
काम पर जाने से पहले
राजधानी को मात करती
उसकी रफ्तार
हवाई जहाज के दक्ष पायलट सा
उड़ाती हाथ-पाँव
कलाबाजियाँ सा करता जिस्म
नजर टिकाए घड़ी पर
न क्षण भर इधर न उधर
कम्प्यूटर के स्क्रीन सेवर सा
पल पल बदलता जाता उसका रंग
कारपोरेट जगत की डेड लाइन्स
वह रोज सुबह
पूरी करती है
अपनी सम्पूर्ण उर्जा के
प्रदर्शन के साथ
नींद न पूरी होने की मजबूरी ओढ़े
खुलती है उसकी आँख
और सेकेंडों में
शून्य से सौ पर आता है उसका स्पीडोमीटर
तब जब लोगबाग
अलसाई सलवटों के बीच
बैड टी के घूँटों से
आँखें खोलने का कर रहे होते हैं प्रयास
वह दौड़ने लगती है
हर स्टेशन पर रुकती
ई एम यू गाड़ी की तरह
हालांकि
उसे कभी सम्बोधित नहीं किया गया
प्रबन्धन गुरु की तरह
बुलाया नहीं गया भाषण के लिए
प्रशिक्षण केन्द्रों में
विशेषज्ञ की तरह
वह सँभाल लेती है सारी व्यवस्था
स्वचालित रॉकेट की तरह
जहाँ-तहाँ से सिर उठा लेते हैं
तुरन्त समाधान माँगते
आकस्मिक प्रश्न
मगर पाया नहीं गया उसे कभी
चीखते चिल्लाते
कड़क बास की तरह
कायम रहता है उसका सन्तुलन
रस्सी पर नट की तरह
फोन की घंटी भी टपक पड़ती है
बीच में
अनपेक्षित मेहमान की तरह
धैर्य का परीक्षा पत्र बन
लेकिन वह देती है उत्तर
गया में वटवृक्ष के नीचे स्थापित
बुद्ध की तरह
उसके अंग अंग को फड़कना होता है
परमाणु ऊर्जा के अक्षय स्रोत की तरह
काम पर जाती स्त्री को
चाहिए होती है ऊर्जा
काम के लिए
और काम पर जाने से पहले
काम के लिए
काम से लौट कर
फिर काम के लिए
हवा भरे जाते गुब्बारे की तरह

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चालक सीट पर स्त्री


एक अजीब सी निगाह से
देखी जाती है
चालक सीट पर बैठी स्त्री
जिसका बगल से गुजर
आगे निकल जाना
किसी को नहीं होता बर्दाश्त
जैसे देखी जा रही हो
कमीज की सफेदी
उसकी रफ्तार
मेरी रफ्तार से तेज कैसे
हटा लिया है उसने अपना हाथ
पुरुष के कान्धे से
जरूरत नहीं पीठ से सटकर बैठने
स्पर्श सुख देने की
हथेलियाँ कस कर थामे हैं
स्कूटर का हैन्डिल
गुजरते जा रहे हैं बगल से
वाहन चालक पुरुष
चली जा रही है स्त्री
सड़क पर निर्विकार
कोई भाग दौड़ नहीं
खुदा न खास्ता
कुछ मद्धिम हुआ यातायात
उसके पास
उसने सफाई से बढ़ा दिया स्कूटर आगे
पीछे छूट गई पुरुषों की कतार
स्कूटर मोटर साइकिल सब
बस बाई चान्स
मगर तन गई भृकुटियाँ
आ गया उबाल
सारे एक्सलेरेटरों पर बढ़ गया दबाव
हाय एक स्त्री गुजर गई
उन्हें ओवरटेक कर
ऐसी तौहीन
यकायक सड़क पर मच गया
एक अघोषित कोहराम
हर वह शख्स जो कहीं भी था
उसके आस पास
दौड़ पड़ा है बेचैन होकर
अब वो तब तक नहीं लेगा साँस
जब तक किसी तरह
स्त्री को नहीं देगा पछाड़
जब तक निकलते रहे
उनकी बगल से
अनगिनत पुरुष चालक
स्कूटर मोटरसाइकिल मोटरकार सवार
कोई परेशानी नहीं हुई
स्त्री के गुजरते ही
आ गया भूचाल
सड़क पर चलती चालक स्त्री को
मालूम होना चाहिए
ट्रैफिक का ये अघोषित नियम
रेड सिग्नल के अलावा भी राह में हैं
रेड सिग्नल।

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कविता -- डॉ0 अंजली दीवान -- प्रकृति के मोती


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 अंजली दीवान
प्रकृति के मोती


खामोश नजारे
कुछ न कहते हुए
कितना कुछ कह रहे हैं।
एक अजीब सी तनहाई
छाई है चारो ओर।
दूर किसी ने पुकारा
गूँज उठे पहाड़।
झरनों का जल
कल-कल करता हुआ
सुना रहा है कहानियाँ।
बादल मूक बस
तैर रहे हैं आकाश में
धरती की ओर
झाँकते हुए।
रेत पर पड़ी सीपियाँ
पानी की लहरों से
इधर-उधर बिखरती हुईं।
दूर इक किश्ती जाती
दिखाई देती है।
सब कुछ अपने आप
चल रहा है।
सूरज उगता है
रात ढलती है।
चांद पूर्णिमा में
दीखता है सफेद
गोले जैसा।
तारे टिमटिमाते हैं
कुछ बड़े, कुछ छोटे।
इक माला में
पिरोये सब मोती हैं
जो दूर होते हुए भी हैं
साथ-साथ
धागे के एक छोर से
दूसरे छोर तक।


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सेंट बीड्स कॉलेज,
शिमला-हि0प्र0

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कविता -- डॉ0 सुनील गुप्ता ‘तन्हा’ -- नारी-महिमा


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 सुनील गुप्ता ‘तन्हा’
नारी-महिमा


हे नारी,
तेरे पावन चरणों को नमन्
तूने काँटों से बिंधकर भी
सींचा है जीवन का उपवन।
हे धैर्य धारणी
पुरुषों की तारणी
नारी होकर भी
पुरुषों की तुम प्राण हो।
उनकी आत्मा हो
आत्मा का स्वाभिमान हो।
हे नारी,
तू ममता की मूरत,
अपना सर्वस्व लुटाकर
पुरुषों के पुरुषत्व को जगाती हो।
तुम अमृत बाँटकर
पुरुषों के विष को पी जाती हो।
हे नारी,
हे क्षमा की देवी,
तेरे चरित्र का, यशगान अधूरा है,
तेरी महिमा का बखान अधूरा है।
कोई शब्द नहीं शब्दकोष में
कि पूर्ण हो तेरी स्तुति
कर रहा हूँ हे नारी अर्पित
मैं तुमको ये भाव भभूती।

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पुष्पगंधा प्रकाशन,
कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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कविता -- आर0डी0 अग्रवाल ‘प्रेमी’ -- आदमी जिंदा लाश......


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-आर0डी0 अग्रवाल ‘प्रेमी’
आदमी जिंदा लाश......


आदमी जिंदा लाश की तरह है जी रहा,
यह दुनिया झूठी, स्वार्थ का है फसाना;
यहाँ की हर चीज है धोखादायी,
यहाँ कोई किसी का नहीं है भाई;
हर आदमी है बेसहारा, नहीं है कोई सहारा,
आदमी जिंदा लाश की तरह है जी रहा!!

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
आदमी दो जून पेट भरने के लिए है परेशान!
न कोई रंग है, न रंगत, बिन नमक का भोजन,
बेरस, फीका, बेस्वाद है जीवन-जी रहा!
आदमी जिंदा लाश की तरह है जी रहा!!

खाना-पीना सो जाना सब काम है पशु समाना,
बिना ज्ञान जीवन नरक बना, कुछ भी नहीं सुहाता!
भीड़ में अकेला खो गया, अपनी ही पहचान भूल गया,
जीवन का न कोई ठिकाना, क्यों कर है जी रहा?
आदमी जिंदा लाश की तरह है जी रहा!

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32/34 खेतवाड़ी, मुम्बई-4

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कविता -- डॉ0 प्रभा दीक्षित -- एक औरत के सपनों का पुल, दिनचर्या


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 प्रभा दीक्षित
एक औरत के सपनों का पुल


एक औरत की नींद में होते हैं
बदरंग सपने/अधूरी कामनायें/
मुरझाये फूल/झुलसी लतायें/
और मुट्ठी से खिसकती
उम्र की रेत।
एक औरत
जिसे समझा जाता है/केवल एक देह/
एक कोख/या एक वस्तु मात्र/
सुन्दर बनाने की खातिर
करती है अनथक प्रयत्न
रचती है रिश्तों का आत्मीय संसार
अपने आन्तरिक सौन्दर्य से
पर जहाँ से
सबसे पहले निर्वासित की जाती है
वह खुद ही।
एक औरत
जो टूट-टूट कर जुड़ने की कोशिश में
बिता देती है सारी उम्र
चुभती रहती है
उसकी आँखों में
सपनों की आधी-अधूरी किरचें
जिसमें रह-रह कर झाँकते हैं
उसकी लहुलुहान कामनाओं के बिम्ब
एक जोड़ा हंसों की उडान
कली के पाश में बेसुध भ्रमर
नवजात शिशुओं को दाना चुगाती गौरैया
बहेलियों का जाल लेकर उड़ते
कबूतरों का झुंड।
एक औरत
जो समझी जाती है
पढ़ी लिखी मूर्ख
बच्चा जनने और धन कमाने की मशीन
घरेलू कामों की अवैतनिक मजदूर
जिसके पास कभी नहीं होता
खुद पर सोचने का वक्त
पर जो घर-भर की चिंता में
हर पल रहती है व्यस्त
जिसे जीवन भर नसीब नहीं होती
एक भरपूर नींद
एक प्यार भरा आलिंगन
एक आत्मीय सुरक्षा
पर उसके फटे आँचल से भी
निरन्तर झरता है
मातृत्व का अमृत
स्नेह का दरिया
और बुनियादी परिवर्तन का सात्विक आक्रोश
एक औरत के सपनों की हकीकत
होती है इतनी भयावह
कि वह पहचान नहीं पाती
अपना चेहरा/वक्त के दरपन में
फिर भी वह चलती है
सपनों के उस पुल पर
जिसका कोई
वजूद ही नहीं होता।

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दिनचर्या


देखती हूँ
कैसे छिपाती हैं ये स्त्रियाँ
अपने गैर जिम्मेदार
पतियों की बेवफाई?
कैसे छिपाती हैं?
अपनी हँसी में
छलक-छलक आती
एक मूक रुलाई?
कैसे ढकती हैं
समृद्धता के आवरण में
अपनी उपेक्षा
वंचित प्रेम की वासना का दंश?
कैसे निभाती हैं
दिन पर दिन स्वार्थी होते जाते
बच्चों के अनचाहे कर्तव्य
कैसे घिसी-पिटी दिनचर्या में
समेट लेती हैं
जीवन-भर के
बहुमूल्य उद्देश्य?
कैसे कसैला हो जाता है
उनके जीवन का स्वाद?
कैसे विषैला हो जाता है
उनकी भाषा का संसार?
कितनी यांत्रिक बन जाती है
उनकी जिन्दगी काम के बोझ से
रिश्तों के संवेदन
और प्रेम की ऊष्मा से रहित
थकी हारी पराजित
आक्रोशित बड़बड़ाहट की तरह
उपेक्षित अनसुनी।

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128/222 वाई वन ब्लाक
किदवई नगर, कानपुर-208011

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कविता -- कवि चमन ठाकुर -- प्रेम गीत


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-कवि चमन ठाकुर
प्रेम गीत


आओ सब मिलकर
एक प्रेम गीत गाएँ
फूलों के इस अनुपम चमन में
तन-मन महकाएँ
शील सदाचार संस्कार से
अहं गलितकर आत्मजोत जगाएँ
तोड़ डालें बन्धनकारा
विराट में समा जाएँ
आओ सब मिलकर
एक प्रेम गीत गाएँ।।

आओ सब मिलकर
एक प्रेम गीत गाएँ
फूलों के इस अनुपम चमन में
एक गुल नया खिलाएँ
हिन्दु-मुस्लिम, सिख-ईसाई
धर्म भेद मिटाएँ
एक जोत से सब जग उपजा
एक परम् सत्य अपनाएँ
काम क्रोध से दूर रहें
सागर सम हो जाएँ
आओ सब मिलकर
एक प्रेम गीत गाएँ।।

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शेहूबाग, पत्रालय पराड़ा
नाहन -सिरमौर, (हि0प्र0) 173001

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दो गीत


गीत / जुलाई-अक्टूबर 08
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हितेश कुमार शर्मा




(1) अब भारत की बात करो
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छुआ छूत के बन्धन तोड़ो, मत स्वारथ की बात करो।
जनहित और देशहित सोचो, अब भारत की बात करो।।
अब भी बटे रहेंगे हम तो आक्रान्ता छा जायेंगे।
उग्रवाद, आतंक-नक्सली-मानवता खा जायेंगे।
हिन्दी हैं हम हिन्दू हैं हम, हैं केवल हिन्दुस्तानी।
सबके खूँ में मिला हुआ है गंगा-यमुना का पानी।
एक मंच पर सभी खड़े हों पैदा वह हालात करो।
जनहित और देशहित सोचो अब भारत की बात करो।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य कह समाज को मत बाँटो।
एक वृक्ष हिन्दुत्व हमारा शाखाओं को मत काटो।
सब समान हैं सबके अन्दर भारत भू की आत्मा है।
सकल विश्व का एक रचयिता परमपिता परमात्मा है।
सब में हो एकात्म-भाव, जाग्रत ऐसे जज्वात करो।
जनहित और देशहित सोचो अब भारत की बात करो।।
संविधान में परिवर्तन हो जात-पात के शब्द हटें।
आरक्षण या तुष्टिकरण के सभी विशेषण तुरत कटे।
सबका केवल मात्र नाम हो, जाति सूचक पूँछ न हो
एक भाव हो राष्ट्र प्रेम का, लम्बी छोटी मूँछ न हो।
स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर भेंट यही सौगात करो।
जनहित और देशहित सोचो अब भारत की बात करो।।


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(2) आओ दीपावली मनायें
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आओ दीपावली मनायें, हर मुंडेर पर दीप जलायें।
द्वेष, दम्भ, पाखण्ड सरीखे, मन के दुर्गुण दूर भगायें।।
संयम का हो दीप, स्नेह वर्तिका धर्य का तेल भरा हो।
अंधकार को दूर भगाता, हर आंगन में दीप धरा हो।
हर चेहरे पर चमक खुशी की, अंतर्मन में स्नेह खरा हो।
खुशियाँ खील, मिठाई बाँटे, सबको बढ़कर गले लगायें।
आओ दीपावली मनायें।।
सम्बोधन सम्मानयुक्त हों, अपनापन वाणी में छलके।
त्योहारों की परम्परागत प्रीति-रीति प्राणी में झलके।
नई नवल आशाओं के संग, उगे चन्द्रमा दिनकर ढलके।
धरती लगे ज्योति का सागर, आओ ऐसा इसे सजायें।
आओ दीपावली मनायें।।
सबके मन के अंधकार का, दीवाली के दीप हरें तम।
सबका मालिक एक भला फिर, आपस में क्यों बैर करें हम।
सबकी झोली भरे खुशी से, रहे कहीं भी जरा न ग़म।
हर मन की इच्छा पूरी हो, हर आंगन लक्ष्मी जी आयें।
आओ दीपावली मनायें।।
दीवाली से दीवाली तक, भरे रहें भण्डार सभी के।
लक्ष्मी मैया दूर भगा दें, आपद् और विपत सब ही के।
हर घर आंगन उजियारा हो, रहें नहीं चैबारे फीके।
धरती का शृंगार देखकर, चाँद सितारे भी शरमायें।
आओ दीपावली मनायें।।
तुमको शुभ हो, मुझको शुभ हो, दीपावली हम सबको शुभ हो।
आने वाला समय सुखद हो, कुछ भी कहीं न मित्र अशुभ हो।
माँ लक्ष्मी इस दीवाली पर, हर आंगन सुख ही सुख हो।
अपने और पराये सबको, पहुँचें दीपावली की सुकामनायें।
आओ दीपावली मनायें।।


गणपति काम्पलैक्स,
सिविल लाइन्स,
बिजनौर (उ0प्र0) पिन-246701

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दो गीत


गीत / जुलाई-अक्टूबर 08
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हितेश कुमार शर्मा




(1) अब भारत की बात करो
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छुआ छूत के बन्धन तोड़ो, मत स्वारथ की बात करो।
जनहित और देशहित सोचो, अब भारत की बात करो।।
अब भी बटे रहेंगे हम तो आक्रान्ता छा जायेंगे।
उग्रवाद, आतंक-नक्सली-मानवता खा जायेंगे।
हिन्दी हैं हम हिन्दू हैं हम, हैं केवल हिन्दुस्तानी।
सबके खूँ में मिला हुआ है गंगा-यमुना का पानी।
एक मंच पर सभी खड़े हों पैदा वह हालात करो।
जनहित और देशहित सोचो अब भारत की बात करो।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य कह समाज को मत बाँटो।
एक वृक्ष हिन्दुत्व हमारा शाखाओं को मत काटो।
सब समान हैं सबके अन्दर भारत भू की आत्मा है।
सकल विश्व का एक रचयिता परमपिता परमात्मा है।
सब में हो एकात्म-भाव, जाग्रत ऐसे जज्वात करो।
जनहित और देशहित सोचो अब भारत की बात करो।।
संविधान में परिवर्तन हो जात-पात के शब्द हटें।
आरक्षण या तुष्टिकरण के सभी विशेषण तुरत कटे।
सबका केवल मात्र नाम हो, जाति सूचक पूँछ न हो
एक भाव हो राष्ट्र प्रेम का, लम्बी छोटी मूँछ न हो।
स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर भेंट यही सौगात करो।
जनहित और देशहित सोचो अब भारत की बात करो।।


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(2) आओ दीपावली मनायें
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आओ दीपावली मनायें, हर मुंडेर पर दीप जलायें।
द्वेष, दम्भ, पाखण्ड सरीखे, मन के दुर्गुण दूर भगायें।।
संयम का हो दीप, स्नेह वर्तिका धर्य का तेल भरा हो।
अंधकार को दूर भगाता, हर आंगन में दीप धरा हो।
हर चेहरे पर चमक खुशी की, अंतर्मन में स्नेह खरा हो।
खुशियाँ खील, मिठाई बाँटे, सबको बढ़कर गले लगायें।
आओ दीपावली मनायें।।
सम्बोधन सम्मानयुक्त हों, अपनापन वाणी में छलके।
त्योहारों की परम्परागत प्रीति-रीति प्राणी में झलके।
नई नवल आशाओं के संग, उगे चन्द्रमा दिनकर ढलके।
धरती लगे ज्योति का सागर, आओ ऐसा इसे सजायें।
आओ दीपावली मनायें।।
सबके मन के अंधकार का, दीवाली के दीप हरें तम।
सबका मालिक एक भला फिर, आपस में क्यों बैर करें हम।
सबकी झोली भरे खुशी से, रहे कहीं भी जरा न ग़म।
हर मन की इच्छा पूरी हो, हर आंगन लक्ष्मी जी आयें।
आओ दीपावली मनायें।।
दीवाली से दीवाली तक, भरे रहें भण्डार सभी के।
लक्ष्मी मैया दूर भगा दें, आपद् और विपत सब ही के।
हर घर आंगन उजियारा हो, रहें नहीं चैबारे फीके।
धरती का शृंगार देखकर, चाँद सितारे भी शरमायें।
आओ दीपावली मनायें।।
तुमको शुभ हो, मुझको शुभ हो, दीपावली हम सबको शुभ हो।
आने वाला समय सुखद हो, कुछ भी कहीं न मित्र अशुभ हो।
माँ लक्ष्मी इस दीवाली पर, हर आंगन सुख ही सुख हो।
अपने और पराये सबको, पहुँचें दीपावली की सुकामनायें।
आओ दीपावली मनायें।।


गणपति काम्पलैक्स,
सिविल लाइन्स,
बिजनौर (उ0प्र0) पिन-246701

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

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