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ईदगाह

धरोहर कहानी / जुलाई-अक्टूबर 08
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प्रेमचन्द




रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है। आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुर्ते में बटन नहीं है। पड़ोस के घर से सुई-तागा लाने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गये हैं, उनमें तेल डालने तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैल को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगा। तीन कोस की पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना। दोपहर के पहले लौटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे। आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिन्ताओं से क्या प्रयोजन। सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खायेंगे। वे क्या जाने कि अब्बाजान क्यों बदहवास चैधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चैधरी आज आँखे बदल लें, तो वह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस-बारह। उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास, एक, दो, तीन, आठ नौ, पन्द्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लायेंगे- खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या? और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पांच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गयी। किसी को पता न चला क्या बीमारी है। कहती भी तो कौन सुनने वाला था। दिल पर जो बीतती थी वह दिल ही में सहती और जब न सहा गया तो संसार से विदा हो गयी। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है। और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रुपये कमाने गये हैं। बहुत-सी थैलियाँ लेकर आयेंगे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं। इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज है और फिर बच्चों की आशा। उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है। हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर में एक पुरानी-धुरानी टोपी; जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आयेंगी तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे। अभागिनी अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नहीं। आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती। इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इन निगोड़ी ईद को। इस घर में उसका काम नहीं; लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब! उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दल-बल लेकर आये, हामिद की आनन्द-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।
हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है - तुम डरना नहीं अम्मां, मैं सबसे पहले जाऊँगा। बिलकुल न डरना।
अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है। उसे कैसे अकेले मेले जाने दे, उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्हीं-सी जान, तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जायेंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में लेगी; लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकायेगा। पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहाँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे। माँगे ही का तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिये थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए। लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती। हामिद के लिए कुछ नहीं है तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटवे में। यही तो बिसात है और ईद का त्योहार। अल्लाह ही बेड़ा पार लगाए। धोबन और नाइन और मेहतरानी और चूड़िहारिन सभी तो आयेंगीं। सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी की आँखों नहीं लगता। किस-किससे मुँह चुरायेगी और मुँह क्यों चुराए! साल भर का त्योहार है। जिन्दगी खैरियत से रहे, उसकी तकदीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे, ये दिन भी कट जाएंगे।
गाँव से मेला चला और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब-के सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इन्तजार करते। ये लोग क्यों इतना धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अन्दर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फलांग पर है। खूब हँस रहे हैं। माली को कैसा उल्लू बनाया है। बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे। सब लड़के नहीं हैं जी। बड़े-बड़े आदमी हैं सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं, इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हैं; बिलकुल तीन कौड़ी के, रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या। क्लबघर में जादू होता है। सुना है यहाँ मुरदे की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं, पर किसी को अन्दर नहीं जाने देते। और यहाँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हैं, मूंछो-दाढ़ी वाले और मेमें भी खेलती हैं सच। हमारी अम्मा को वह दे दो, क्या नाम है, बैट तो उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढ़क न जाएँ।
महमूद ने कहा-हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे, अल्ला कसम।
मोहसिन बोला-चलो, मनों आटा पीस डालती हैं। जरा-सा बैट पकड़ लेंगी तो हाथ काँपने लगेंगे। सैकड़ों घड़े पानी रोज निकालती है। पाँच घड़े तो भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़ा तो आँखों तले अंधेरा आ जाए।
महमूद-लेकिन दौड़ती तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकती।
मोहसिन-हाँ, उछल-कूद नहीं सकती, लेकन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चैधरी के खेत में जा पड़ी थी, तो अम्मा इतनी तेज दौड़ी कि मैं उन्हें पा न सका सच।
आगे चले। हलवाइयों की दुकाने शुरू हुईं। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न एक-एक दुकान पर मनों होगीं। सुना है रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी दुकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है वह तुलवा लेता है और सचमुच रुपये देता है, बिलकुल ऐसे ही रुपये।
हामिद को यकीन न आया-ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जाऐंगे!
मोहसिन ने कहा-जिन्नात को रुपये की क्या कमी। जिस खजाने में चाहें, चले जायें। लोहे के दरबाजे इन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहिरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहिरात दे दिए। अभी यहीं बैठे हैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुच जाएँ।
हामिद ने फिर पूछा-जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते होंगे।
मोहसिन-एक-एक आसमान के बराबर होता है जी, जमीन पर खड़ा हो जाये तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाये।
हामिद-लोग उन्हें कैसे खुश करते होंगे? कोई मुझे वह मन्तर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लूं।
मोहसिन-अब यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन चैधरी साहब के काबू में बहुत जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाये, चैधरी साहब उसका पता लगा देंगे और चोर का नाम भी बता देंगे। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुये, कहीं न मिला। तब झक मारकर चैधरी के पास गये। चैधरी ने तुरन्त बता दिया कि मवेशीखाने में है, और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।
अब उसकी समझ में आ गया कि चैधरी के पास क्यों इतना धन है, और क्यों उनका इतना सम्मान है।
आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यही सब कानिस्टबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाम को! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जाएँ।
मोहसिन ने प्रतिवाद किया-यह कानिस्टबिल पहरा देते हैं? तभी तुम बहुत जानते हो। अजी हजरत यही चोरी कराते हैं। शहर के जितने चोर डाकू हैं, सब इनसे मिलते हैं, रात को ये लोग चोरों से तो कहते हैं कि चोरी करो और आप दूसरे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जागते रहो!’ पुकारते हैं। जभी इन लोगों के पास इतने रुपये आते हैं। मेरे मामू एक थाने में कानिस्टबिल हैं। बीस रुपये महीने पाते हैं; लेकिन पचास रुपये घर भेजते हैं। अल्ला कसम। मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रुपये कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे-बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले-हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाएँ। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाये।
हामिद ने पूछा-यह लोग चोरी करवाते हैं तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं? मोहिसन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला- अरे पागल, इन्हें कौन पकड़ेगा। पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं लेकिन अल्लाह इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर आग लग गई। सारी लेई-पूंजी जल गई। एक बर्तन न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोये, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे। फिर न जाने कहाँ से एक सौ कर्ज लाए तो बर्तन-भाड़े आये।
हामिद-एक सौ तो पचास से ज्यादा होते हैं।
‘कहाँ पचास, कहाँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है सौ तो दो थैलियों में भी न आएँ।’
अब बस्ती घनी होने लगी थी। ईदगाह जाने वालों की टोलियाँ नजर आने लगीं। एक-से-एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-तांगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल, अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थी। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से बार-बार हार्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
सहसा, ईदगाह नगर आया। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजिम बिछा हुआ है। और रोजेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहां तक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजिम भी नहीं है। नये आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गये। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था। लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, और फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। एक साथ झुकते हैं और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्रिया होती है जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनन्तता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानन्द से भर देती थीं। मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोये हुए है।
नमाज खत्म हो गई है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दुकानों पर धावा होता है। ग्रामीणों का वह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला है। एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट छड़ों से लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊँटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक-तिहाई, जरा-सा चक्कर खाने के लिए, वह नहीं दे सकता।
सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दुकानों की कतार लगी हुई है। तरह तरह के खिलौने हैं-सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधू। वाह! कितने सुन्दर खिलौने हैं! अब बोलना ही चाहते हैं। अहमद सिपाही लेता है, खाकी वर्दी और लाल पगड़ी वाला कन्धे पर बन्दूक रखे हुए। मालूम होता है, अभी कवायद किये चला जा रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई, ऊपर मशक रखे हुए, मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है। शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक में पानी उड़ेलना चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्धता है उसके मुख पर। काला चोगा, नीचे सफेद अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए है। मालूम होता है, अभी किसी अदालत में जिरह या बहस किये चले आ रहे हैं। यह सब दो-दो पैसे में खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने मंहगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के?
मोहसिन कहता है-मेरा भिश्ती रोज पानी दे जाएगा, सांझ सबेरे।
महमूद-और मेरा सिपाही घर पर पहरा देगा। कोई चोर आयेगा, तो फौरन बन्दूक से फैर कर देगा।
नूरे-और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।
सम्मी-और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोयेगी।
हामिद खिलौने की निन्दा करता है-मिट्टी के ही तो हैं, गिरें तो चकनाचूर हो जाएँ। लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते, विषेशकर जब अभी नया शौक हो। हामिद ललचाता रह जाता है।
खिलौनों के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहनहलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है।
मोहसिन कहता है-हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार हैं।
हामिद को संदेह हुआ, यह केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है; लेकिन यह जानकर भी उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।
मोहसिन-अच्छा, अब की जरूर देंगे हामिद, अल्ला कसम ले जा।
हामिद-रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं?
सम्मी-तीन ही तो पैसे हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगे?
अहमद-हमसे गुलाबजामुन ले जाव हामिद। मोहसिन बदमाश है।
हामिद-मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं।
मोहसिन-लेकिन दिल में कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?
महमूद-हम समझते हैं इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जायेंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।
मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीजों की हैं, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती है तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होगी। फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में काम की चीज हो जायेगी। खिलौनों से क्या फायदा। व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई आँख उठाकर नहीं देखता। ये तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जायेंगे। चिमटा कितने काम की चीज है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो। कोई आग माँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्मा बेचारी को कहाँ फुसरत है कि बाजार आयें और इतने पैसे ही कहाँ मिलते हैं। रोज हाथ जला लेती हैं। हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब-के-सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं। इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूँछूँगा। खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा फोड़े फुन्सियाँ निकलेंगी, आप ही जवान चटोरी हो जायेगी। तब घर से पैसे चुरायेंगे और मार खायेंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं। मेरी जवान क्यों खराब होगी! अम्मा चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथों से ले लेगी और कहेगी-मेरा बच्चा अम्मा के लिए चिमटा लाया है। हजारों दुआयें देगी। फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएँगी। सारे गाँव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआएँ देगा। बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरन्त सुनी जाती है। मेरे पास पैसे नहीं है। तभी तो मोहसिन और महमूद यों मिजाज दिखाते हैं। मैं भी इनको मिजाज दिखाऊँगा। खेलें खिलौने और खाएँ मिठाइयाँ। मैं नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिजाज क्यों सहूँ। मैं गरीब सही, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता। आखिर अब्बा जान कभी-न-कभी आयेंगे। अम्मां भी आयेगी। फिर इन लोगों से पूँछूँगा। कितने खिलौने लोगे! एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह सलूक किया जाता है। यह नहीं कि पैसे की रेवड़ियाँ लो तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सब-के-सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसे मेरी बला से। उसने दुकानदार से पूछा-यह चिमटा कितने का है।
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा-यह तुम्हारे काम का नहीं है जी!
‘बिकाऊ है कि नहीं!’
‘बिकाऊ क्यों नहीं! और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?’
‘तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छः पैसे लगेगे।’
हामिद का दिल बैठ गया।
‘ठीक-ठीक बताओ।’
‘ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो?’
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा-‘तीन पैसे लोगे।’
यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुनें। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बन्दूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सब-के-सब क्या-क्या आलोचनाएँ करते हैं।
मोहसिन ने हँसकर कहा-यह चिमटा क्यों लाया पगले! इसे क्या करेगा!
हामिद ने चिमटे को पटककर कहा-जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर-चूर हो जायें बच्चा की!
महमूद बोला-यह चिमटा कोई खिलौना है?
हामिद-खिलौना क्यों नहीं है? अभी कंधे पर रखा, बन्दूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ तो तुम लोगों के सारे खिलौने की जान निकल जाये। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाएँ, मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है-चिमटा।
सम्मी ने खंजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला-मेरी खंजरी से बदलोगे। दो आने की है।
हामिद ने खंजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खंजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, डब-डब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया। लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ है, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रार्थ हो गया है। सम्मी तो विधर्मी हो गया। दूसरे पक्ष में जा मिला; लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है; वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए, तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जायें, मियाँ सिपाही मिट्टी की बन्दूक छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुँह छिपाकर जमीन पर लेट जाएँ। मगर यह चिमटा, यह बहादुर रुस्तमे-हिन्द लपककर शेर की गर्दन पर सवार हो जायेगा और उसकी आँखें निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर कहा-अच्छा पानी तो नहीं भर सकता।
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा-भिश्ती को एक डाँट बतायेगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई-अगर बच्चा पकड़ जाये तो अदालत में बँधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के ही पैरों पड़ेंगे।
हामिद इस प्रबल तर्क का जबाव न दे सका। उसने पूछा-हमें पकड़ने कौन आयेगा?
नूरे ने अकड़कर कहा-यह सिपाही बन्दूक वाला।
हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा-ये बेचारे हम बहादुर रुस्तमे-हिन्द को पकड़ेगे? अच्छा लाओ; अभी जरा कुश्ती हो जाये। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगे क्या बेचारे।
मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई-तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग से जलेगा।
उसने समझा था कि हामिद लाजबाव हो जायेगा लेकिन यह बात न हुई हामिद ने तुरन्त जबाव दिया-आग में बहादुर ही कूदते हैं। जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लेडियों की तरह घर में घुस जायेंगे। आग में कूदना वह काम है जो रुस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।
महमूद ने एक जोर और लगाया-वकील साहब कुर्सी-मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबर्चीखाने में पड़ा रहेगा।
इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने। चिमटा बाबर्चीखाने में पड़े रहने के सिवा और क्या कर सकता है।
हामिद को कोई फड़कता हुआ जबाव न सुझा तो उसने धाँधली शुरू की-मेरा चिमटा बाबर्चीखाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।
बात कुछ बनी नहीं। खासी गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट में डालने वाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए। मानों कोई धेलचा कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट कर गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज है। उसका पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे-हिन्द है। अब इसमें मोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किये पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है खिलौने का क्या भरोसा? टूट-फूट जायेंगे। हामिद का चिमटा बना रहेगा, बरसों।
सन्धि की शर्ते तय होने लगी। मोहसिन ने कहा-जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें, तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो।
महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किये।
हामिद को इन शर्तों के मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं।
हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे-मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच। यह लोहे का चिमटा भला इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले।
लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से सन्तोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
मोहसिन-लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा!
महमूद-दुआ को लिये फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मा जरूर कहेगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने तुम्हें मिले! हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौने को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी जितनी दादी चिमटे को देखकर होगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था और उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रुस्तमे-हिन्द है और सभी खिलौनों का बादशाह।
रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिये। महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था।
ग्यारह बजे सारे गाँव में हलचल मच गई। मेले वाले आ गये। मोहसिन की छोटी बहिन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर बहन-भाई में मारपीट हुई। दोनों खूब रोये। उनकी अम्मां यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चाँटे और लगाये।
मियाँ नूरे के वकील का अन्त उसके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में दो खूटियाँ गाड़ी गई, उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की पट्या और बिजली के पंखे रहते हैं। क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो? कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जायेगी कि नहीं। बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे। मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया। बड़े जोर-जोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।
अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया। लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो था नहीं, जो अपने पैरो चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाये गये, जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उसके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरफ से ‘छोने वाले जागते रहो’ पुकारते हैं। मगर रात तो अंधेरी होनी ही चाहिए; महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूट कर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बन्दूक लिए जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल गया है, जिसमें वह टूटी टाँग को आनन-फानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जोड़ दी जाती है, लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जबाव दे देती है। शल्यक्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टांग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टांग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपान्तर चाहो, कर सकते हो, कभी-कभी तो उससे वाट का काम भी लिया जाता है।
अब मियाँ हमीद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चैकी-‘यह चिमटा कहाँ था?’
‘मैंने मोल लिया है।’
‘कै पैसे में?’
‘तीन पैसे दिये।’
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा। सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?
हामिद ने अपराधी भाव से कहा-तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं इसलिए मैंने इसे लिया।
बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया।
और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई-हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदे गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!

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उसने कहा था

उसने कहा था
चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’


बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली की मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चैड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुये, इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की उँगलियों के पोरों को चीथकर अपने ही को सताता हुआ बताते हैं और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं; तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में हर एक लड्ढी वाले के लिये ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़ाकर ‘बचो खालसाजी!’ ‘हटो माईजी !’ ‘ठहरना भाई !’ ‘आने दो लाला जी !’ ‘हटो बाछा !’ कहते हुये सफेद फेंटों, खच्चरों और बत्तखों, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल में राह खेते हैं। क्या मजाल है कि ‘जी’ और ‘साहब’ बिना सुने किसी को हटना पड़े ! यह बात नहीं कि इनकी जीभ चलती ही नहीं; चलती है, पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं -

‘हठ जा जीणे जोगिए; हट जा करमावालिए, हट जा पुत्तां प्यारिए; बच जा, लम्बी उमराँ वालिए !’’ समष्टि में इनके अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है ? .............. बच जा।
ऐसे बम्बूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चैक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिक्ख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिये दही लेने आया था, और यह रसोई के लिये बड़ियां ! दूकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
‘‘तेरे घर कहां हैं ?’’
‘‘मगरे में; - और तेरे ?’’
‘‘माझे में; - यहां कहां रहती है ?’’
‘‘अतर सिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।’’
‘‘मैं भी मामा के यहां आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार में है।’’
इतने में दूकानदार निबटा और इनको सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुस्कराकर पूछा-‘‘तेरी कुड़माई हो
गई ? ’’ इस पर लड़की कुछ आंखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।

दूसरे तीसरे दिन सब्जी वाले के यहां, दूध वाले के यहां, अकस्मात् दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, ‘‘तेरी कुड़माई हो गई ?’’ और उत्तर में वही धत् मिला। एक दिन जब लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिये पूछा तो लड़की, लड़के की सम्भावना के विरुद्ध बोली,-‘‘हां, हो गई।’’
‘‘कब ?’’
‘‘कल; देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ ‘साल’।’’
लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन-भर कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उँडेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।

(2)


‘‘राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खन्दकों में बैठे-बैठे हड्डियां अकड़ गई। लुधियाना से दन गुना जाड़ा और मेंह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुये हैं। गनीम कहीं दीखता नहीं,-घण्टे-दो-घण्टे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती हैं और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है। इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का ज़लज़ला सुना था, यहां दिन में पच्चीस ज़लज़ले होते हैं। जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुये हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।’’

‘‘लहना सिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खन्दक में बिता ही दिये। परसों ‘रिलीफ’ आ जायेगी, और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फिरंगी मेम के बाग में मखमल की सी हरी घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं पर दाम नहीं लेती। कहती है तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आये हो।’’
‘‘चार दिन तक पलक नहीं झँपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाये। फिर सात जर्मनों को अकेला मारकर न लौटूँ तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े-संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था-चार मील तक जर्मन नहीं छोड़ा था। पीछे जनरल साहब ने हट आने का कमान दिया, नहीं तो’’
‘‘नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते। क्यों ?’’ सूबेदार हजारा सिंह ने मुस्कराकर कहा-‘‘लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाई नहीं चलते। बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गये तो क्या होगा।’’
‘‘सूबेदार जी, सच है,’’ लहना सिंह बोला-‘‘पर करें क्या ? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धँस गया है। सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ से चम्बे की बावलियों के-से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाये, तो गर्मी आ जाये।’’
‘‘उदमी, उठ, सिगड़ी में कोयले डाल। वजीरा, तुम चार जने बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदला दे।’’ यह कहते हुये सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे।

वजीरा सिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गँदला पानी भरकर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला-‘‘मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!’’ उस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गये।
लहना सिंह ने दूसरी बाल्टी भरकर उसके हाथ में देकर कहा-‘‘अपनी बादी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।’’
‘‘हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमाव जमीन यहीं माँग लूंगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।
‘‘अच्छा अब बोधा सिंह कैसा है ?’’
‘‘अच्छा है।’’
‘‘जैसे मैं जनता ही न होऊँ ! रात-भर तुम अपने दोनों कम्बल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न माँदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है मौत है, और निमोनियां से मरने वालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।’’
‘‘मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूँगा। भाई कीरत सिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाये हुये आंगन के आम के पेड़ की छाया होगी।’’
वज़ीरा सिंह ने त्योरी चढ़ाकर कर कहा-‘‘क्या मरने-मारने की बात लगाई
है ? मरे जर्मन और तुरक ! हां भाइयो, कैसे ........’’
सारी खन्दक गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गये, मानों चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों।

(3)


दो पहर रात गई। अँधेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधा सिंह खाली बिस्कुटों के तीन टिनों पर अपने कम्बल बिछाकर और लहना सिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़कर सो रहा है। लहना सिंह पहरे खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधा सिंह के दुबले शरीर पर। बोधा सिंह कराहा।
‘‘क्यों बोधा भाई, क्या है ?’’
‘‘पानी पिला दो।’’
लहना सिंह ने कटोरा उसके मुँह में लगाकर पूछा-‘‘कहो कैसे हो ?’’
पानी पीकर बोधा बोला-कँपनी छूट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दांत बज रहे हैं।’’
‘‘अच्छा मेरी जरसी पहन लो।’’
‘‘और तुम ?’’
‘‘मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है, पसीना आ रहा है।’’
‘‘ना, मैं नहीं पहनता; चार दिन से तुम मेरे लिये .......’’
‘‘हाँ, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सवेरे ही आई है। विलायत से मेंमे बुन-बुनकर भेज रही हैं। गुरू उनका भला करे।’’ यों कहकर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतारने लगा।
‘‘सच कहते हो।’’
‘‘और नहीं झूठ !’’ यों कहकर नाहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता-भर पहनकर पहरे पर जा खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी।
आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुँह से आवाज आई-‘सूबेदार हजारा
सिंह ?’’
‘‘कौन लपटन साहब ? हुकुम हुजूर !’’ कहकर सूबेदार तनकर फौजी सलाम करके सामने हुआ।

‘‘देखो इसी समय धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई हैं। उसमें पचास से जियादह जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे दो खेत काटकर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहाँ मोड़ है वहाँ पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़कर सबको साथ ले उनमें जा मिलो। खन्दक छीनकर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहाँ रहेगा।’’ ‘‘जो हुकुम।’’
चुपचाप सब तैयार हो गये। बोधा भी कम्बल उतारकर चलने लगा, तब लहना सिंह ने उसे रोका। लहना सिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहना सिंह समझकर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना नही चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेरकर खड़े हो गये और जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्हांेंने लहना की ओर हाथ बढ़ाकर कहा-‘‘लो, तुम भी पियो।’’
आँख मारते-मारते लहना सिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपाकर बोला-‘‘लाओ साहब !’’ हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में कहाँ उड़ गये और उनकी जगह कैदियों से कटे हुये बाल कहाँ से आ गये ?
शायद शराब पिये हुये हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है। लहना सिंह ने जांचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे।
‘‘क्यों साहब हम लोग हिन्दुस्तान कब जायेंगे?’’ ‘‘लड़ाई खत्म होने पर। क्यों, क्या यह देश पसन्द नहीं ?’’

‘‘नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ ? याद है पारसल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी जिले में शिकार करने गये थे-हाँ-हाँ, वहीं जब आप खोते पर सवार थे और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था ? बेशक पाजी कहीं का !’-सामने से वह नीलगाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थी। और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुट्ठे में निकली। ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा आता हैं। क्यों साहब ! शिमले से तैयार होकर उस नीलगाय का सिर आ गया था न ? आपने कहा था कि रेजिमेंट की मैस में लगायेंगे। हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया !’-ऐसे बड़े-बड़े सींग ! दो-दो फुट के तो होंगे ?’’
‘‘हाँ लहना सिंह, दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया ?’’
‘‘पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ।’’-कहकर लहना सिंह खन्दक में घुसा। अब उसे सन्देह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिये।
अँधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया।
‘‘कौन ? वजीरा सिंह ?’’
‘‘हाँ क्यों लहना ? क्या कयामत आ गई ? जरा तो आँख लगने दी होती !’’

(4)


‘‘होश में आओ। कयामत आई और लपटन साहब की वर्दी पहनकर आई है।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘लपटन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गये है। उनकी वर्दी पहनकर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की है। सौहरा साफ उर्दू बोलता हैंः पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।’’
‘‘तो अब ?’’
‘‘अब मारे गये। धोखा। सूबेदार होराँ कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उधर उन पर खुले में धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गये होंगे। सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आएँ। खन्दक की बात झूठ हैं। चले जाओ। खन्दक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खुड़के। देर मत करो।’’
‘हुकुम तो यह है कि यही ........’’
‘‘ऐसी तैसी हुकुम की ! मेरा हुकुम-जमादार लहना सिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ।’’
‘‘पर यहाँ तो तुम आठ ही हो।’’
‘‘आठ नहीं, दस लाख। एक-एक अकालिया सिक्ख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।’’
लौटकर खाई के मुहाने पर लहना सिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खन्दक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार-सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी पर रखने वाले थे ........

बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठाकर लहना सिंह ने साहब की कोहनी पर तानकर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी लहना सिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा। और साहब ‘आँख ! मीन गौट्ट।’’ कहते हुये, चित हो गये। लहना सिंह ने तीनों गोले बीनकर खन्दक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफ और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।
साहब की मूर्छा हटी। लहना सिंह हटकर बोला-‘क्यों लपटन साहब ! मिजाज कैसा है ? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिक्ख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नीलगायें होती है और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आये ? हमारे लपटन साहब बिना डैम के पांच लफ्ज़ भी नहीं बोल सकते थे।’
लहना ने पतलून की जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानों जाड़े से बचने के लिये दोनों हाथ जेबों में डाले।
लहना सिंह कहता गया-‘चालाक तो बड़े हो, पर माझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा हैं उसे चकमा देने के लिये चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुये एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव में आया था। औरतों के बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चैधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पण्डित हैं। वेद पढ़-पढ़कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नही मारते। हिन्दुस्तान में आ जायेंगे तो गौ हत्या बन्द कर देंगे। मण्डी के बनियों को बहकाता था कि डाकखाने से रुपया निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है। डाकबाबू पील्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्ला जी की दाढ़ी मूँड़ दी थी और गाँव से बाहर निकलकर कहा था कि जो मेरे गांव में अब पैर रखा तो ..........

साहब की जेब से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिनी के दो फायरों ने साहब की कपाल क्रिया कर दी। धड़ाका सुनकर सब दौड़ आये।
बोधा चिल्लाया-‘क्या है ?’
लहना सिंह ने उसे यह कहकर सुला दिया कि एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया ‘और, औरों से सब हाल कह दिया। सब बन्दूकें लेकर तैयार हो गये। लहना ने साफा फाड़कर घाव के दोनों ओर पट्टियां बाँधी। घाव मांस में ही था। पट्ठियों के कसने से लहू निकलना बन्द हो गया।
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिक्खों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे से रोका, दूसरे को रोका, पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक तककर मार रहा था-वह खड़ा था, और सब लेटे हुये थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुस आते थे। थोड़े से मिनटों में वे ........
अचानक आवाज आई-‘‘वाह गुरूजी दी फतह ! वाह गुरूजी दा खालसा !!’’ धड़ाधड़ बन्दूकों से फ़ायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन चक्की के दो पाटों के बीच में आ गये। पीछे से सूबेदार हजारा सिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहना सिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।
एक किलकारी और-अकाली सिक्खाँ दी फौज आई ! वाह गुरूजी दी
फतह ! वाह गुरूजी दा खालसा !! सत्श्री अकाल पुरुख !!! और लड़ाई खतम हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गये। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आर-पार निकल गई। लहना सिंह की पसली में एक गोली लगी, उसने घाव को खन्दक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कसकर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव-भारी घाव-लगा है।

लड़ाई के समय चाँद निकल आया था-ऐसा चाँद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियों का दिया हुआ ‘क्षयी’ नाम सार्थक होता है और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में ‘दन्तवीणोपदेशाचार्य’ कहलाती। वजीरा सिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन-भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहना सिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर वे उसकी तुरत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मर जाते।
इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाइ्र वालों ने सुन ली थी। उन्होंने टेलीफोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं जो कोई डेढ़ घण्टे के अन्दर-अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नजदीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जायेंगे, इसलिये मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गये और दूसरी में लाशें रखी गई। सूबेदार ने लहना सिंह की जांघ में पट्टी बँधवानी चाही, पर उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायेगा। बोधा सिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा-‘‘तुम्हें बोधा की कसम हैं, और सूबेदारनीजी की सौगन्ध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।’’
‘‘और तुम ?’’
‘‘मेरे लिये वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुर्दो के लिये भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ ? वजीरा सिंह मेरे पास है ही।’’
‘‘अच्छा, पर’’
‘‘बोधा गाड़ी पर लेट गया। भला ! आप भी चढ़ जाओ। सुनिये तो, सूबेदारनी होराँ को चिट्टी लिखो, तो मेरा मत्था टेकना लिख देना और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था, वह मैंने कर दिया।
गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा-‘‘तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं। लिखना कैसा ? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना, उसने क्या कहा था ?’
‘‘अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना। गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया।-‘‘वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।

(5)

मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म-भर की घटनायें एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं, समय की धुन्ध बिलकुल उन पर से हट जाती हैं।
लहना सिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दही वाले के यहाँ, सब्जी वाले के यहाँ, हर कहीं उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता हैं, तेरी कुड़माई हो गई ! तब ‘धत्’ कहकर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा-‘‘हाँ, कल हो गई, देखते नहीं, यह रेशम के फूलों वाला सालू ?’’ सुनते ही लहना सिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?
‘‘वजीरा सिंह, पानी पिला दो।’’
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पच्चीस वर्ष बीत गये। आज लहना सिंह नं. 77 रैफल्स में जमादार हो गया। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमे की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेण्ट के अफसर की चिट्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है, फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारा सिंह की चिट्ठी कि मैं और बोधा सिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुये हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहना सिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।
जब चलने लगे तब सूबेदार बेड़े में से निकलकर आया। बोला-‘‘लहना ! सूबेदारनी तुझको जानती हैं, बुलाती हैं। जा, मिल आ।’’
लहना सिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती हैं ? कब से ? रेजिमेण्ट के क्वार्टरों में कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाजे पर जाकर ‘मत्था
टेकना !’ कहा। असीस सुनी। लहना सिंह चुप।
‘मुझे पहचाना ?’
‘‘नहीं।’’
‘‘तेरी कुड़माई हो गई-धत्-कल हो गई-देखते नहीं, रेशमी बूटों वाला सालू-अमृतसर में-’’
भावों की टकराहट से मूछाँ खुली। करवट बदली, पसली का घाव बह निकला।
‘वजीरा पानी पिला।’ ‘उसने कहा था।’

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स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है-‘‘मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गये। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमक-हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदार जी के साथ चली जाती ? एक बेटा है। फौज में भरती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नहीं जिया।’’ सूबेदारनी रोने लगी। ‘‘अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग्य ! तुम्हें याद है, एक दिन टाँग वाले का घोड़ा दही वाले की दूकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे। आप घोड़ों की लातों में चले गये थे और मुझे उठाकर दूकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ।’’
रोती-रोती सूबेरदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आँसू पोछता बाहर आया।
‘वजीरा सिंह, पानी पिला’-उसने कहा था।’
लहना का सिर गोद में रखे वजीरा सिंह बैठा है। जब माँगता है, तब पानी पिला देता है। आध-घण्टा तक लहना चुप रहा, फिर बोला-‘‘कौन ! कीरत सिंह ?’’
वजीरा ने कुछ समझकर कहा-‘‘हाँ।’’
‘‘भइया, मुझें और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।’’
वजीरा ने वैसा किया।
‘‘हाँ अब ठीक है। पानी पिला दे। बस अबके हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यही बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था, उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।’’
वजीरा सिंह के आंसू टप-टप टपक रहे थे।

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कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा-फ्रांस और बेल्जियम, 68वीं सूची-मैदान में घावों से मरा-नं. 77 सिक्ख राइफल्स जमादार लहना सिंह।

(कहानी विविधा, सं - डाॅ। देवी शंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन से साभार)

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