बुन्देली कहावतों में सामजिक पक्ष -- आलेख

अक्टूबर 10-फरवरी 11 == बुन्देलखण्ड विशेष ---- वर्ष-5 ---- अंक-3

आलेख--डॉ0 अवधेश चंसौलिया

बुन्देली कहावतों में सामाजिक पक्ष



प्रत्येक देश के विभिन्न समाजों एवं क्षेत्रों की अपनी लोकोक्तियाँ होती हैं। ये कहावतें यों ही नहीं गढ़ ली गयी हैं। इन कहावतों के पीछे सैकड़ों और हजारों वर्षों का अनुभव सन्निहित है। एक ही समय और परिस्थिति में एक ही प्रकार की घटना को बार-बार घटित होते देखकर अनुभवी लोगों ने निष्कर्ष निकाल कर, उसे लय में बाँधकर, कम से कम शब्दों में कवित्व रूप में प्रकट कर कहावत का रूप दिया।



कहावतें हमारी धरोहर हैं। ये कहावतें पुरानी होकर भी उपयोगी हैं, यही कारण है कि कहावतें आज भी प्रचलित है। आधुनिक युग में यद्यपि इनका प्रचलन कुछ कम जरूर हुआ है लेकिन बन्द नहीं हुआ। लोक साहित्य में लोकोक्तियों या कहावतों का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके द्वारा कथन को तीव्रता और गति देकर प्रभावोत्पादक बनाया जाता है। ये चिरकालीन अनुभूत ज्ञान के सूत्र और निधि हैं। समास रूप में चिर-संचित अनुभूत ज्ञान राशि का प्रकाशन इनका प्रधान उद्देश्य है। किसी भी जाति या समाज के सामाजिक अध्ययन की जानकारी में इनका विशेष महत्व है। संस्कृत से लेकर आधुनिक भाषाओं तक इनकी अविच्छिन्न धारा बह रही है।



संस्कृत की एक लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है वह है शठे शाठ्यं समाचरेत।महाकवि राजशेखर ने प्राकृत भाषा में लिखे गये कर्पूर मंजरी में हत्थ कंकण किं दप्पणेण पेक्खीका उल्लेख किया है। यही कहावत हिन्दी में हाथ कंगन को आरसी क्यारूप में जीवित है।



हिन्दी की कहावतों का अभी विधिवत कोई संकलन प्रकाश में नहीं आ पाया है। सन् 18860 में फेनल ने हिन्दी कहावतों के सम्बन्ध में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ डिक्शनी ऑफ हिन्दुस्तानी प्रोबर्ब्स लिखा। इसमें मारवाड़ी, पंजाबी, भोजपुरी एवं मैथिली कहावतों को संकलित किया गया है। जे0एच0 नोबल्स ने कश्मीरी लोकोक्तियों पर, शालिग्राम वैष्णव ने गढ़वाली कहावतों पर अच्छा कार्य किया है। डॉ0 कन्हैयालाल सहलने राजस्थानी कहावतों पर अनुसंधानात्मक दृष्टि डाली है। बुन्देली कहावतों पर अभी कोई विशेष उल्लेखनीय अनुसंधान नहीं हुआ।



बुन्देली कहावतों में जीवन का सार देखने को मिलता है। इन कहावतों के माध्यम से हम बुन्देलखण्ड और उस अंचल में वास करने वालों की जीवन शैली का बखूबी अध्ययन कर सकते हैं। इन कहावतों में उनके विश्वास, आस्थायें, लोकरीति-रिवाज, खान-पान, रहन-सहन, लोक पर्व और उनकी संस्कृति स्पष्टतः झलकती है। बुन्देली कहावतों में बुन्देली लोकजीवन का सत्य पूरी शिद्दत के साथ उद्घाटित होने लगता है। समाज में ऐसे भी लोग होते हैं जो दोहरे चरित्र के होते हैं, उनकी कथनी-करनी में अन्तर होता है, वे दिखावा करते हैं। ऐसे लोगों के लिए कहावत बनी है-गुड खाँय पुअन को नेम करेंअर्थात गुड़ खाते हैं पर गुड़ से बने पुए को नापसंद करते हैं। जो लोग दिखावटी परहेज करते हैं, उनके लिए यह कहावत बिल्कुल चरितार्थ दिखती है। नुक्ताचीनी निकालने वालों के लिए कहा गया है कि चेरी अपने जी से गयी राजा कहै, अलौनी खीरदूसरों में दोष निकालने वाले व्यक्ति की आदत को कानी अपनो टैंट तो निहारत नइयाँ, दूसरे की फुली पर-पर के देखतमें बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति दी गयी है। ऐसे लोग हर समाज में बहुतायत में मिल जाते हैं जो अपने सैकड़ों दोषों को नहीं देखते लेकिन दूसरों के दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। यही बात इस कहावत में सूत्र रूप मे सन्निहित है।



बुन्देलखण्ड अभी भी आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। यहाँ की ऊबड़-खाबड़ जमीन पानी के अभाव में बंजर और अनुपजाऊ है। लगभग 90 प्रतिशत लोग कृषि पर आधारित हैं, इसलिए उनके पास धन का अभाव है। अतः वे मेलों-ठेलों का आनन्द नहीं उठा पाते। ऐसे लोगों पर जिनके पइसा नइयाँ पास, उनको मेला रहे उदासकहावत सही रूप से चरितार्थ और सिद्ध बैठती है। बुन्देलखण्ड में सामंती प्रथा का अभी भी बोलवाला है। लोगों में पड़े-पड़े खाने की आदत है लेकिन इन आलसियों को यदि उनकी शक्तियों का एहसास करा दिया जाये, उन्हें उत्प्रेरित कर दिया जाये तो वे कठिनतम कार्य भी कर सकते हैं। ऐसे लोगों के कारनामे देखकर कहावत बनी गर्रा चलै तो बांजर टोरे। दूसरों के दर्द का अहसास लोगों को नहीं होता जब तक कि उन्हें स्वयं दर्द न हो। ऐसी स्थिति में कहावत बनी जाके पैर न फटी बिंबाई सो क्या जानै पीर पराईदिखावे का प्रेम करने वालों के लिए यह उक्ति ठीक बैठती है। कोरो लाड़ मौसी करै, छनक-छनक कौने भरै।जो लोग भविष्य को ध्यान में रखकर कार्य नहीं करते और केवल तात्कालिकता को देखकर आवेश में निर्णय ले लेते हैं उन्हें बाद में पश्चाताप करना पड़ता है, ऐसी स्थिति में कहावत बनी बादर देख पुतलिया फोर डाली।संयुक्त परिवारों के टूटने पर पारिवारिक प्रेम और सद्भाव में भी कमी आ जाती है। आज यह प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ रही है व्यक्ति अकेला और असहाय हो गया है। पुत्र भी अलग होने पर अपने कर्तव्यों से च्युत हो जाता है तभी तो कहा गया है कि न्यारो पूत पड़ोसी दाखिल।जो व्यक्ति सीधा-साधा होता है उसे कोई महत्व नहीं देता। हर कोई उसका मजाक उड़ाता है। ऐसे लोगों को इंगित कर सीधे को मुँह कुत्ता चाटतलोकोक्ति का आविर्भाव हुआ। आलसी लोग कार्य न करने के लिए किसी न किसी व्यवधान की अपेक्षा करते रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए बुन्देली जानकारों ने एक कहावत गढ़ी आलसी निगइया असगुन की बाट हेरे।एक लोकोक्ति है गधन के मौर बाँध दईइसका तात्पर्य बेबकूफ को ताज पहनाना है। आज की राजनीति में ऐसे उलटे कार्य खूब हो रहे हैं। आज अयोग्य लोग चापलूसी और धन के प्रभाव में ऊँची कुर्सी पर बैठकर मौज कर रहे हैं और सम्मानित हो रहे हैं तथा योग्य लोग मारे-मारे फिर रहे हैं। कुछ ऐसे ठसियल लोग भी हैं जो जबरदस्ती अपने को सम्मानित करा लेते हैं। ऐसे लोग मान न मान मैं तेरा मेहमानवाली कहावत को बखूबी चरितार्थ करते हैं। समाज में ऐसे भी लोग है जो दो पक्षों में लड़ाई कराकर अलग हो जाते हैं। जब ऐसे लोगों को सुधीजनों ने देखा तो एक सूक्ति डार गंज आग महावदे दूर भयेके माध्यम से अपनी बात कही। समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो माँगै तेल गुलगुला करतअर्थात वे स्वयं का खर्च नहीं करते बल्कि दूसरों से माँगकर अपना काम चलाना चाहते हैं। यह उक्ति कंजूसों के लिए ठीक बैठती है। समाज में तरह-तरह के लोग रहते हैं कहा भी गया है तुलसी या संसार में भाँति-भाँति के लोग।ऐसे लोगों में अविवेकी और निरी कल्पनाओं में जीने वाले भी होते हैं। वे बिना किसी कारण या योजना के लड़ाई-दंगा करने लगते हैं। ऐसे लोगों के लिए कितनी अच्छी और अनुभव सिद्ध बात कही गयी है वह है सूत न पौनी कोरी से लठियाव।इस तरह की सैकड़ों नहीं हजारों सूक्तियाँ, कहावतें या लोकोक्तियाँ-जिन्हें हम लोक सुभाषित भी कह सकते हैं-बुन्देली समाज में उल्लिखित अर्थात मौखिक रूप से भरी पड़ी हैं, जिनमें बुंदेली समाज पूर्ण रूप से मुखरित हुआ। इन कहावतों का वाक्चातुर्य अनुभव और वाग्विदग्धता देखते ही बनती है। आवश्यकता है इनके संकलन और अध्ययन की। इनके अध्ययन से हम बुंदेली समाज को और अधिक अच्छी प्रकार से समझ सकेंगे। इन कहावतों में बुन्देली समाज चलचित्र की तरह सुरक्षित है। ये कहावतें सिनेमा की फिल्म (रील) के समान है, जिनमें समाज की सच्ची तस्वीर देखने को मिलती है।



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