कविता -- गुरू प्रताप शर्मा ‘आग’ -- असभ्यता के रखवाले


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-गुरू प्रताप शर्मा ‘आग’
असभ्यता के रखवाले



आतंक और अपराधों के, धागों से बुना कफन दोगे,
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
अत्याचारों की बाढ़ से टूट जायें अगर किनारे ही,
हाथों में हथियार थामके उठ खड़े होंगे बेचारे भी,
ये मत सोचो झुके हुए सिर कभी नहीं तन पायेंगे,
बादलों से ही कभी, बरस सकते हैं अंगारे भी।
औलादों को अपनी क्या जलता हुआ गगन दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
रोज रोज है बिखर रहा ये देश क्यों देख नहीं पाते,
गालों पर पड़े तमाचों से भी सबक सीख नहीं पाते,
बढ़ रहे हैं नौनिहालों के पग किस ओर ये देखो तो,
अपनी ही संतानों के बहके कदम रोक नहीं पाते।
उन्हें चाँद के रूप में, क्या सूरज को लगा ग्रहण दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
चारों ओर धमाके होंगे, आतंक में डूबा शहर होगा,
अपने ही भ्रष्ट आचारों का, वह चौथा प्रहर होगा,
अन्यायी राहों की दौलत, काम न उनके आयेगी,
पीने को बस आँसू होंगे या इक जाम जहर होगा।
कहाँ रखेंगे पाँव बेचारे क्या टूटा हुआ वतन दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।
भूख की भीषण लपटों में सहृदयता जल जायेगी,
ये छद्म शांति पिघलेगी हथियारों में ढल जायेगी,
बागी हो जायेंगी कलमें पैरवी करेंगी धमाकों की,
और किताबों के पन्नों से अराजकता उबल आयेगी।
उन शोलों से बचने को, उन्हें लाक्षा भवन दोगे।
आनेवाली पीढ़ी को अपनी, काँटों भरा चमन दोगे।

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अंगरस गौड़ भवन,
घोटुर्ली, उमरेड, नागपुर-441204

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