कविता -- देवेन्द्र कुमार मिश्रा == नीचे-ऊपर वाले


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-देवेन्द्र कुमार मिश्रा
नीचे-ऊपर वाले


ऊँचाई से हर चीज
छोटी दिखाई देती है
और नीचे से हर ऊपरी चीज
आश्चर्य से भरपूर।
ऊँचाई वाला हमेशा ऊँचाई
पर ही बना रहना चाहता है
वह नीचे वाले को देखता है
दया या हिकारत की दृष्टि से,
नीचे वाला ऊपर जाना चाहता है
ऊँचाई उसकी मंजिल है,
ऊँचाई पर बैठा उसका आदर्श।
नीचे वाला जब ऊपर उठता है
तो ऊपरवाला उसे आसानी से
ऊपर नहीं आने देता
प्रयास करता है हरसंभव उसे गिराने का
उसे अपनी सत्ता डोलती नजर आती है
वह नहीं चाहता अपना प्रतिद्वन्द्वी
हर नीचे वाला ऊपर आने लगेगा
या कोशिश करेगा
तो ऊपरवाले की क्या रह जायेगी
उसे आदर्श, भगवान कौन मानेगा
कौन उसकी सेवा अर्चना करेगा।
नीचे विद्रोह न हो सो कभी-कभार
ऊपरवाला कुछ सिक्के उछाल देता है नीचे
नीचे वाले सिक्के को झपटने पाने के
चक्कर में आपस में उलझे रहते हैं
और शुक्रिया अदा करते हैं ऊपर वाले का
कभी कोई साहस करके, संकटों को पार
करके पहुँच जाता है ऊपर।
नीचे वालों को आस
बँधती है कुछ।
किन्तु ऊपर पहँुचते ही
उसे सभी नीचे वाले
बौने लगते हैं
वह अपने को नीचे
की जमात से हटाकर
ऊपर वालों की जमात में
शामिल कर लेता है
अब वह स्वीकार ही नहीं करता
कि वह कभी नीचे था
उसे तो लगता है कि वह हमेशा से
ऊपर ही था।
ऊँचाई बनाये रखने के लिए
वह नीचे वालों को उलझाकर
रखता है धर्म-जाति-भाषा
रोटी, कपड़ा, मकान के चक्रव्यूह में
नीचे वाले आवाज लगाते हैं
ऊपरवाले अनसुनी कर देते हैं
नीचे वाले आवाज उठाते हैं
ऊपरवाले राहत राशि, सामग्री
फेंक देते हैं
नीचे वाले दया-दृष्टि मान
धन्यवाद देते हैं।

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