गीत-पी0 एस0 भारती


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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गीत-पी0 एस0 भारती


कारवाँ चलता रहे तो कारवाँ कहलाता है,
रुक गया केवल पड़ाव मात्र ही रह जाता है।

गाँव कस्बे हैं जभी तक उनमें जीवन गीत है,
बहती जो पावन पवन अपने में ही संगीत है,
चलती दरिया धार देती जल हमें निर्झर सदा,
क्योंकि जीवन के लिए चलना ही इसकी रीत है।
हर नया झोंका हवा का प्राण नव भर जाता है।
कारवाँ चलता रहे तो कारवाँ कहलाता है।।

समय संग-संग चले पग जब चेतना से पूर्ण मन हो,
प्राप्त हो पीयूष पावन जब उमंगें भरा तन हो,
गीत की लय झनझनाती उर की तन्त्री भीगती,
शब्द के भावार्थ के पट खोलती गीत आगमन हो।
पथ के कंटक को ही चुनना शिखर पर पहुँचाता है।
कारवाँ चलता रहे तो कारवाँ कहलाता है।।

कामना की भावना के गीतों को गाते रहो,
लक्ष प्राप्ति की लगन की अलख सुलगाते रहो,
चाह शीतल छाँव की आराम की तुम मत करो,
राह अंगारों की चलना है शपथ खाते रहो।
अन्ततः चलती लहर है तब किनारा आता है।
कारवाँ चलता रहे तो कारवाँ कहलाता है।।

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105/5 बी, उमंग,
महानगर-।, बरेली (उ0प्र0)

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