ग़ज़ल-माधव अग्रवाल


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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ग़ज़ल-माधव अग्रवाल


(1)
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हर तस्वीर अधूरी सी लगती है,
तेरे बिन जिन्दगी अधूरी सी लगती है।
लूट गया सभी कुछ राह चलते हुए नेकिओं की,
हर चाल जिन्दगी की विसात पे शह सी लगती है।
हवाओं ने बुझा दिये वो जलते चिराग,
अंधेरों से कुछ साँठ-गाँठ सी लगती है।
मौसम बेवफ़ा आज कुछ इस तरह,
यादें भी झपकी लिए सी लगती है।
आँखें रोई हैं आज कुछ इस कदर,
लाल आखें भी नशीली सी लगती है।

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(2)

अनाथ बच्चे की मानिन्द जिन्दगी रोती रही,
हर खुशी गम के साये में तड़पती रही।
कुछ चंद लम्हात ही उनसे मिल सके,
आँधियों की पतवार से किश्ती खेती रही।
कुछ मजबूरियाँ कुछ दुश्वारियाँ थीं,
जिन्दगी नियति की लिपि को बाँचती रही।
कुछ तो अर्थ था उन आँसुओं का,
थमी जिन्दगी खड़ी सोचती रही।
शिकारी ने नोंचे थे पंख इस कदर,
बंद पिंजरे में आत्मा फड़फड़ाती रही।

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धरमपुर, बुलन्दशहर-202393

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

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