कविता -- डॉ0 प्रभा दीक्षित -- एक औरत के सपनों का पुल, दिनचर्या


जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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कविता-डॉ0 प्रभा दीक्षित
एक औरत के सपनों का पुल


एक औरत की नींद में होते हैं
बदरंग सपने/अधूरी कामनायें/
मुरझाये फूल/झुलसी लतायें/
और मुट्ठी से खिसकती
उम्र की रेत।
एक औरत
जिसे समझा जाता है/केवल एक देह/
एक कोख/या एक वस्तु मात्र/
सुन्दर बनाने की खातिर
करती है अनथक प्रयत्न
रचती है रिश्तों का आत्मीय संसार
अपने आन्तरिक सौन्दर्य से
पर जहाँ से
सबसे पहले निर्वासित की जाती है
वह खुद ही।
एक औरत
जो टूट-टूट कर जुड़ने की कोशिश में
बिता देती है सारी उम्र
चुभती रहती है
उसकी आँखों में
सपनों की आधी-अधूरी किरचें
जिसमें रह-रह कर झाँकते हैं
उसकी लहुलुहान कामनाओं के बिम्ब
एक जोड़ा हंसों की उडान
कली के पाश में बेसुध भ्रमर
नवजात शिशुओं को दाना चुगाती गौरैया
बहेलियों का जाल लेकर उड़ते
कबूतरों का झुंड।
एक औरत
जो समझी जाती है
पढ़ी लिखी मूर्ख
बच्चा जनने और धन कमाने की मशीन
घरेलू कामों की अवैतनिक मजदूर
जिसके पास कभी नहीं होता
खुद पर सोचने का वक्त
पर जो घर-भर की चिंता में
हर पल रहती है व्यस्त
जिसे जीवन भर नसीब नहीं होती
एक भरपूर नींद
एक प्यार भरा आलिंगन
एक आत्मीय सुरक्षा
पर उसके फटे आँचल से भी
निरन्तर झरता है
मातृत्व का अमृत
स्नेह का दरिया
और बुनियादी परिवर्तन का सात्विक आक्रोश
एक औरत के सपनों की हकीकत
होती है इतनी भयावह
कि वह पहचान नहीं पाती
अपना चेहरा/वक्त के दरपन में
फिर भी वह चलती है
सपनों के उस पुल पर
जिसका कोई
वजूद ही नहीं होता।

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दिनचर्या


देखती हूँ
कैसे छिपाती हैं ये स्त्रियाँ
अपने गैर जिम्मेदार
पतियों की बेवफाई?
कैसे छिपाती हैं?
अपनी हँसी में
छलक-छलक आती
एक मूक रुलाई?
कैसे ढकती हैं
समृद्धता के आवरण में
अपनी उपेक्षा
वंचित प्रेम की वासना का दंश?
कैसे निभाती हैं
दिन पर दिन स्वार्थी होते जाते
बच्चों के अनचाहे कर्तव्य
कैसे घिसी-पिटी दिनचर्या में
समेट लेती हैं
जीवन-भर के
बहुमूल्य उद्देश्य?
कैसे कसैला हो जाता है
उनके जीवन का स्वाद?
कैसे विषैला हो जाता है
उनकी भाषा का संसार?
कितनी यांत्रिक बन जाती है
उनकी जिन्दगी काम के बोझ से
रिश्तों के संवेदन
और प्रेम की ऊष्मा से रहित
थकी हारी पराजित
आक्रोशित बड़बड़ाहट की तरह
उपेक्षित अनसुनी।

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128/222 वाई वन ब्लाक
किदवई नगर, कानपुर-208011

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