फूल और बच्चा ---- कुँवर प्रेमिल



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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लघुकथा --- फूल और बच्चा
कुँवर प्रेमिल


एक बड़ी सी कोठी थी। उसमें एक बड़ा सा अहाता था। अहाते में एक छोटा किन्तु सुन्दर सा बगीचा था। बगीचे में रंग-बिरंगे फूल थे। बेहद सुन्दर-सुन्दर अनगिनत फूल कोई दूर से टिमटिमाते तारे जैसा तो कोई गोल-मटोल सूरज जैसा। उज्ज्वल-उज्ज्वल प्यारे चाँद जैसा तो कोई चमकते जुगनू जैसा। कहीं-कहीं तो फूलों की आतिशबाजी हो रही थी मानो फूलों का एक मेला सा भर गया था। वहाँ फूलों को तोड़ना तो अलग उन्हें छूने की भी सख्त मुमानियत थी। उन्हें चारों तरफ से एक काँटेदार बाड़ द्वारा घेर दिया गया था, ऊपर से एक चौकीदार भी सुरक्षा हेतु नियुक्त कर दिया गया था।
कोठी वाले फूलों की सुरक्षा से खुश थे। कोई परिन्दा भी वहाँ पर नहीं मार सकता था। सब कुछ पूरे नियंत्रण में था। एक दिन चौकीदार की आँखें दोपहरी में क्या झपकी कि गज़ब हो गया। उसका फायदा उठाकर एक सुन्दर सा गोल-मटोल बच्चा उस बगीचे में आ घुसा। फूल जो एक अरसे से अनमने थे, उदास-उदास ऊँघते रहते थे, बच्चे को देखकर एकदम चैतन्य हो गये। उनके अधरों पर मुस्कुराहट तैरने लगी। वे सब अधीर हो चले बालक को अपनी ओर आता देखकर आनन्द से झूमने लगे।
सहमा-सहमा सा बच्चा आगे बढ़ने लगा, उसे चौकीदार का भय सता रहा था। पूरी सतर्कता से वह एक-एक कदम आगे बढ़ा रहा था। ज्यों-ज्यों बालक फूलों के पास पहुँचने लगा, त्यों-त्यों फूलों के दिल खुशियों से धड़कने लगे। वे इशारा करने लगे, बच्चा फूूलों का स्नेह निमंत्रण पाकर उनके पास दौड़कर जा पहुँचा।
बच्चा फूलों को छू-छूकर देखने लगा। उन्हें बेतहाशा चूमने लगा। बच्चा और फूल आलिंगनबद्ध होकर एकरस हो गये थे। बच्चा और फूल, फूल और बच्चा एक दूसरे को पाकर खुशियों से भर गये थे। अब फूल तोड़कर बच्चा अपनी जेबें भरने लगा। फूल उसे और फूल तोड़ने के लिए उकसाने लगे। वे झुक झुककर स्वयं उसकी ओर खिंचे चले आने लगे। एक दूसरे को पाकर दोनों फूले नहीं समा रहे थे। तभी मानो एक तूफान आ गया। बच्चा, चौकीदार द्वारा देख लिया गया।
‘‘औ....ऐ...निखट्टू....बड़ा आया फूल तोड़ने वाला। मुझे नौकरी से निकलवायेगा क्या ...चल भाग...फूट यहाँ से।’’ चौकीदार बच्चे पर बुरी तरह गुस्सिया रहा था। बच्चा घबराया, फूल भी घबराये। छोटे फूल ने बड़े फूल से कहा -‘‘दादा! कहीं ये बागड़बिल्ला इस मामूम को सचमुच मार ही न बैठे।’’
‘‘तब तो बहुत बुरा होगा....बच्चा भूलकर भी हमारी ओर फिर कभी नहीं आयेगा।’’ छोटा फूल चिंचित हुआ जा रहा था। चौकीदार ने बच्चे के कान गरम किये तो बड़े फूल का गला भर आया। नन्हा फूल भी रुंआसा हो गया। बड़े फूल ने कहा-‘‘नन्हे, ये आदमी इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि बच्चे ही फूलों के सच्चे कद्रदान हैं। बच्चे फूलों के साथ नहीं खेलेगे तो उनके फूलों जैसे मन कैसे होंगे। बच्चे फूलों से ही तो हँसना सीखते हैं, गुनगुनाते हैं, अपनी कल्पना के महल खड़े करते हैं। काश! हमें बच्चों के साथ ही रहने दिया जाता तो कितना अच्छा होता।’’
‘‘दादा देखो तो उस बदमाश चौकीदार ने बच्चे को एक चाँटा भी जड़ दिया है। उसके गाल पर पाँचों अंगुलियाँ उछल आई हैं। यह तो पूरा कसाई निकला।’’ कहते-कहते नन्हा फूल भय से पीला पड़ गया। वह कँपकँपाकर डाल से नीचे गिर गया। नन्हे पुष्प को शाखा से गिरते देख एक-एक कर सारे फूल अपनी शाखाओं से टूटकर नीचे जा गिरे। वे सब जमीन पर पड़े-पड़े अंतिम साँसें ले रहे थे। वह बच्चा चौकीदार द्वारा बाहर खदेड़ दिया गया था।
उधर मार खाकर भी वह बच्चा खुश था, उसकी जेब में रंग-बिरंगे फूल जो भरे थे।


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