धिक्कारता हुआ चेहरा --- युगेश शर्मा



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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कहानी --- धिक्कारता हुआ चेहरा
युगेश शर्मा



दो स्थान ऐसे होते हैं जहाँ शोरगुल और आवाजाही को कभी विराम नहीं मिलता, फिर चाहे दिन हो या हो रात। ये दो स्थान हैं -रेल्वे प्लेटफार्म और अस्पताल। जब यह बाहरी शोरगुल इंसान की भीतरी उथल-पुथल के साथ मिल जाता है, तो उसके मन-मस्तिष्क में एक अजीब सी बेचैनी व्यापने लगती है। तब उसको भीतर ही भीतर छटपटाहट की अनुभूति होती है और अंतर्मन में प्रश्नों की बेमौसम बरसात सी होने लगती है।
बॉम्बे हास्पिटल की तीसरी मंजिल के प्रायवेट वार्ड नं0-10 में अनुपम ऐसी ही झंझावातों के बीच फँसा हुआ है। सुबह और शाम के समय तो परिवार के लोगों और मुलाकातियों की आवाजाही लगी रहती है, पर दोपहर बाद के तीन-चार घंटे तो वह लंबे-चौड़े़ प्रायवेट वार्ड में अकेला ही रहता है। नहीं.....नहीं......एकदम ‘अकेला’ कहना तो ठीक न होगा। एक और भी शख्स उस वार्ड में है-अनुपम के बीमार पिता, नामचीन लेखक पंडित हरिचरण ‘प्रचंड’, प्रचंड तो उपनाम है जो उनको साहित्य ने दिया है। मूल नाम तो पंडित हरिचरण चतुर्वेदी है। साहित्य की दुनिया में ख्याति बढ़ी तो ‘चतुर्वेदी’ को अनंत वनवास देकर ‘प्रचंड’ ने उनके नाम के साथ अटूट गठजोड़ कर लिया।
कहने के लिए तो उस प्रायवेट वार्ड में उस वक्त दो इंसान थे पर दूसरे इंसान अर्थात् हरिचरण ‘प्रचंड’ का वहाँ रहना, न रहने के बराबर ही था। पाँच दिन पहिले जब उनको अस्पताल में दाखिल किया गया था, तब से वे लगातार बेहोशी की हालत में पलंग पर हैं। न उनको रात के आगमन से कोई फर्क पड़ता है और न सबेरा होने से। महंगे से महंगा इलाज चल रहा है उनका। दुनिया भर के बड़े डॉक्टर आकर उनको देख चुके हैं पर पलंग पर लेटे उनके शरीर में एक क्षण के लिए भी जीवन के चिन्ह प्रकट नहीं हुए। जब से वे अस्पताल में दाखिल किये गये हैं, तभी से लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम के भरोसे हैं।
देश भर में एक लेखक के बतौर बड़ा नाम है प्रचंडजी का। बिक्री में कीर्तिमान रचने वाली 50 पुस्तकें उनके खाते में हैं। आधा दर्जन कहानियों पर फीचर फिल्में बन चुकी हैं। उनके उपन्यास पर बने पाँच टी0वी0 सीरियल भी खूब चर्चित रहे हैं। लंबी सृजन-यात्रा में उनको मिले सम्मान और पुरस्कारों की तो कोई गिनती ही नहीं।
परिवार के मुखिया प्रचंड जी के स्वास्थ्य की इस हालत को लेकर उनका परिवार दो भागों में बँट गया है। कुछ सदस्यों का कहना है कि इस सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए कि बाबू जी के प्राण अब उनके पार्थिव शरीर में नहीं हैं। लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम की झूठी आस के सहारे बैठे रहना तो खुद को धोखा देना है... शेष सदस्य चमत्कार की उम्मीद लिए जो कुछ चल रहा है, उसको जारी रखने के पक्ष में थे।
अनुपम प्रचंडजी का बड़ा बेटा है। वह एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बड़े ओहदे पर है। छोटा बेटा शहर का रसूखदार बिल्डर है। भवन निर्माण के करोड़ों के ठेके लेता है। तीसरे बेटे की पास के औद्योगिक क्षेत्र में बिजली का सामान बनाने की अच्छी-खासी फैक्ट्री है।
प्रायवेट वार्ड के दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ ने बाहरी और भीतरी शोरगुल में फँसे अनुपम को कुछ उबारा। उसने स्वयं को सम्हालते-सहेजते हुए दरवाजा खोला। बाहर अरुण कुमार था उसकी कंपनी का कानूनी सलाहकार। हरफनमौला, फितरती इंसान। आड़े-तिरछे सरकारी-गैर सरकारी काम कराने में अच्छी महारत हासिल है। उसको रेत से तेल निकालने का हुनर भी खूब आता है। ‘सोर्स’ का पता लगाकर उसका दोहन करने की उसकी कला का तो कोई जवाब नहीं है।
अरुण कुमार आज पहली बार तो वहाँ आया नहीं था। पिछले 5 दिनों में कम से कम तीन बार वह यहाँ आ चुका है। उस दिन अनुपम और अरुण कुमार के बीच बातचीत कंपनी के मामलों से होते हुए हरिचरण ‘प्रचंड’ की हालत पर आ टिकी। अरुण कुमार सहसा बोल पड़ा-‘‘अनुपम जी, आज मैं एक खास मशविरा देना चाहता हूँ आपको। मानो तो बात आगे बढ़ाऊँ।’’
‘‘हाँ-हाँ कहो न। इसमें संकोच करने और मुझसे पूछने जैसी भला कौन सी बात है।’’ अनुपम ने बात को आगे बढ़ाते अपनी सहमति दी।
‘‘बात यह है अनुपम जी कि मेडिकली तो चाहे बाबूजी जिंदा न हों, किन्तु जब तक डॉक्टरों ने लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम पर उनको रखा हुआ है तब तक टेक्नीकली तो वे जीवित हैं ही’’-अरुण कुमार ने सकुचाते हुए अपनी बात कही-‘‘डॉक्टरों द्वारा इस लाइफ सपोर्टिग सिस्टम को हटाने के पहिले आप कुछ कर लें, तो ठीक रहेगा।’’
अनुपम को अरुण कुमार की बात ठीक-ठीक समझ में नहीं आई। पूछ बैठा-‘‘कुछ कर लेने का मतलब मुझे ठीक से समझ में नहीं आया। साफ-साफ कहिये न, आखिर आप चाहते क्या हैं?’’
‘‘देखो मित्र, आपके पिताजी एक मशहूर हस्ती हैं। देश और प्रदेश में उनका बड़ा मान-सम्मान है। उनके लिटररी कन्ट्रीब्यूशन से यहाँ से वहाँ तक कोई अनजान नहीं हैं। आज जो लोग मंत्रियों की कुर्सियों पर बैठे हैं, वे सब किसी न किसी समारोह में बाबूजी को सम्मानित कर चुके हैं। मैं चाहता हूंँ कि आप समय रहते उनके इस सम्मान और उनकी प्रसिद्धि की कीमत वसूल लें। ऐसा मौका आपको दुबारा हाथ लगने वाला नहीं है।’’
‘कीमत....कैसी कीमत!’’ अनुपम आश्चर्य चकित हो पूछ बैठा।
‘‘अरे भाई, आजकल सरकार नामचीन साहित्यकारों और कलाकारों को इलाज के वास्ते लाखों रुपये मदद के रूप में बाँटती है, वह भी उनके परिवार की माली हालत को नज़रअंदाज करके। आपने अखबारों में कुछ महीने पहिले पढ़ा ही होगा कि सरकार ने एक बड़े कलाकार को बड़ी रकम आर्थिक सहायता के बतौर दी है, जबकि उस कलाकार का परिवार करोड़पति से कम हैसियत नहीं रखता। उस कलाकार ने अपनी कला से देश-विदेश में खूब कमाई की थी। अच्छी प्रापर्टी भी वह अपने पीछे छोड़ गया है, वह नामचीन कलाकार।’’
‘‘याने आप यह चाहते हैं कि हमें भी बाबूजी के इलाज के बहाने सरकार से मोटी रकम ऐंठ लेनी चाहिए.....।’’
‘‘हाँ, बिल्कुल सही समझा आपने। मैं बस यही तो चाहता हूँ। आखिर आपका दोस्त हूँ यार! गलत मशविरा थोड़े ही दूँगा।’’
‘‘अरुण कुमार जी, आपका यह मशविरा मेरे गले नहीं उतरा। मैं एक खुद्दार लेखक का बेटा हूँ। मेरी अंतरात्मा ऐसा करने की मुझे अनुमति नहीं देती फिर भगवान का दिया हमारे पास सब कुछ तो है। हम तीनों भाई लंबे समय तक बाबूजी का महंगे से महंगा इलाज कराने में समर्थ हैं।’’
तब तक अस्पताल के कैण्टीन से कॉफी आ चुकी थी। कुछ मिनट तक वातावरण में चुप्पी पसरी रही। अरुण कुमार कॉफी खत्म कर उठ खड़ा हुआ। वह दरबाजे की तरफ बढ़ते हुए अंततः कहने से नहीं चूका-‘‘मेरी बात पर एक बार फिर ठंडे दिमाग से विचार कीजिए मित्र। मैं परसों फिर आऊँगा।’’
अरुण कुमार जाते-जाते अनुपम को असमंजस के भँवर में फँसा गया। एक पराये संजीदा आदमी के हितोपदेश को वह एकदम नकार भी नहीं सका। अनुपम को इस मशविरे में अरुण कुमार का कोई निहित स्वार्थ भी नहीं दिखा।
पैसों का आगमन अच्छे-अच्छों की त्याग-तपस्या को हवा में उड़ाने की ताकत रखता है। अनुपम ने बारी-बारी से अरुण कुमार के सुझाव पर परिवार के सदस्यों की प्रतिक्रिया मालूम की। आधे से ज्यादा सदस्य चाहते थे कि जब सरकार आर्थिक सहायता देती ही है, तो लेने में शर्म या अड़चन कैसी। लेकिन बात थी कि अनुपम के गले उस समय उतर नहीं रही थी।
दूसरे दिन रात के वक्त जब अनुपम डिनर के लिए घर पर था, उसी समय प्रचंडजी के सहपाठी रजनीकांत जी वहाँ आये। प्रचंडजी के बच्चे उन्हें ‘रजनी अंकल’ कहकर पिता जैसा ही मान-सम्मान देते हैं। वे तो प्रचंड परिवार के एक सदस्य की मानिंद हैं, उस परिवार के सुख-दुख के साथी। उनकी बातों को भी परिवार में गंभीरता से सुना-माना जाता है। इन दिनों तो प्रचंड जी की अनुपस्थिति में परिवार में मुखिया जैसी हैसियत रजनीकांत जी को मिली हुई है। कुछ देर प्रचंडजी के स्वास्थ्य के बारे में चर्चा के बाद अनुपम ने अरुण कुमार के सुझाव के बारे में रजनी अंकल को सब कह सुनाया।
रजनीकांत जी तो सुनकर हक्के-बक्के रह गए। अनुपम के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए बोले-‘‘मेरे मित्र के साथ इससे बड़ा क्रूर मजाक तो दूसरा कोई हो नहीं सकता।...मेरा मित्र संघर्षों से जूझते हुए बड़ा लेखक बना है।...शुरू में तीखे तेवर वाली उसकी कहानियों को गिनी-चुनी पत्रिकाएँ ही छापती थीं, प्रकाशक भी उसकी किताबों की पांडुलिपियाँ बेरहमी से लौटा दिया करते थे। लेकिन तब भी उसने न तो अपने स्वाभिमान को बेचा और न ही प्रकाशकों की ओछी शर्तें स्वीकार कीं।’’
रजनीकांत जी के मार्मिक कथन को सुन अनुपम अतीत की स्मृतियों में खो गया। एक प्रकाशक एक बड़े राजनेता पर लिखी गई किताब की भूमिका प्रचंड जी से लिखवाना चाहता था। बड़ी रकम का ऑफर भी दिया था उसने। ऊपर से भारी दबाव भी डलवाया गया था लेकिन उन्होंने भूमिका नहीं लिखी। तब से उस बड़े प्रकाशक ने उनकी किताबें छापना ही बंद कर दिया था। हजारों की रॉयल्टी भी उसने हजम कर ली थी। प्रचंड जी जानते थे कि जिस राजनेता पर वह किताब थी, वह नंबर एक का पापी और भ्रष्ट है। कोई ऐसा दुष्कर्म नहीं था, जो उसने सत्ता में रहते न किया हो।
अनुपम की स्मृतियों में वह वाकया भी ताज़ा हो उठा-जब प्रचंडजी की एक किताब से एक सच्चा किन्तु कुछ बड़े लोगों के लिए अप्रिय बना प्रसंग न हटाने पर उनको साहित्य के एक बड़े सरकारी पुरस्कार से वंचित कर दिया गया था। तब प्रचंड जी ने साफ कह दिया था-‘‘मैं अपनी ही शर्तों पर जीना और अपनी ही शर्तों पर लिखते रहना चाहता हूँ। समझौता करके और सरकार या अन्य किसी के सामने हाथ फैलाकर मैं कभी कुछ नहीं माँगूँगा।’’
अनुपम को यूँ विचारों में खोया-खोया सा देख रजनीकांत जी भी थोड़ी देर के लिए चुप्पी साध गए। जब लगा कि वह सामान्य स्थिति में लौट आया है तो उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा-‘‘हरिचरण चाहता तो अपने लेखन के तेवरों में ठंडापन लाकर तब बहुत कमाई कर सकता था। सच बात तो यह है कि किसी के सामने हाथ फैलाना उसको तनिक भी नहीं भाता था। बेटा, उसी हरिचरण के स्वाभिमानी हाथों को वह अरुणकुमार, सरकार के सामने फैलवाना चाहता है। मैं तो इसके लिए अपनी सहमति कदापि नहीं दूँगा।...हाँ, तुम लोग फैसला लेने के लिए पूरी तरह आज़ाद हो। मैं उसमें कोई दखल नहीं दूँगा।’’
उस समय अनुपम की जबान तो जैसे तालू से ही चिपक कर रह गई थी। उससे कुछ कहते नहीं बन रहा था।
‘‘देखा बेटा’’, रजनीकांत जी ने अपने मन की बात जाहिर करते हुए कहा-‘‘प्रथम तो हरिचरण ने तुम तीनों भाइयों को इस लायक बना दिया है कि उनके इलाज पर तुम लोग भरपूर पैसा खर्च कर सकते हो। आज तुम लोगों के पास जो कुछ भी है वह तुम्हारे बाबूजी की कठिन तपस्या और उनके परिश्रम का ही प्रतिफल है। यदि फिर भी कोई कमी है, तो तुमको हरिचरण की किताबों के प्रकाशकों से पैसा जुटाना चाहिए क्योंकि उन्होंने उसकी बेस्ट सेलर किताबों को बेचकर करोड़ों कमाये हैं।एक लेखक जब अपना खून-पसीना एक करता है तब ही वह कोई अच्छी किताब लिख पाता है। यदि प्रकाशक उनके इलाज के लिए कुछ देंगे भी तो वह तुम्हारे बाबूजी के हक़ का ही होगा, उनके खून-पसीने की वह क्षतिपूर्ति मात्र होगी।’’
‘‘अंकल बात तो आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। प्रकाशकों ने बाबूजी की किताबों की पूरी रॉयल्टी कभी नहीं दी। उनका तो चालाक प्रकाशकों ने भरपूर शोषण ही किया है।’’ अनुपम भी अपने मन की बात कहे बिना न रह सका। वह तो इस शोषण लीला का चश्मदीद गवाह है।
रजनीकांत जी का मन-मस्तिष्क उद्विग्नता से भर उठा। वे बोले-‘‘एक साहित्यकार को जिंदगी भर उसके प्रकाशक और परिवार वाले मनमाना निचोड़ते हैं, लेकिन जब उसकी चलाचली की बेला आती है तो उसको निराश्रित सा बनाकर समाज और सरकार की दया पर छोड़ देते हैं। यह तो वैसा ही निर्मम कृत्य हुआ, जैसा कृत्य बूढ़े नकारा बैल को जंगल में हलाल कर एक स्वार्थी किसान करता है।’’ रजनीकांत जी के तन-मन में गहरी पीड़ा की लहर सी दौड़ गई थी। वे अधिक देर वहाँ नहीं रुक सके और अनुपम को कुछ ज़रूरी हिदायतें दे वहाँ से चल दिये।
अनुपम को तब एक धर्मसंकट ने घेर लिया था। उस वक्त ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं था जो उसको इस धर्मसंकट से उबारने की कूबत रखता हो। उसने अस्पताल में बाबूजी की सेवा-टहल के लिए उस समय मौजूद छोटे भाई से मोबाइल पर दवा आदि के बारे में पूछताछ की और फिर सोने के लिए अपने कमरे में चला गया। उसकी नींद को आज की रात कई बेमुरव्वत प्रश्नों ने घेर लिया था। लाख कोशिशों के बाद भी नींद उसकी आँखों तक नहीं पहुँची। उसकी सारी रात आँखों में ही कट गई।
प्रश्नों का बोझ भी कम जानलेवा नहीं होता। वह अच्छे-खासे बलवानों का हौसला भी पस्त कर डालता है। इस बोझ के नीचे दबे इंसान की सोचने-विचारने की शक्ति तो जैसे गायब ही हो जाती है।
अरुण कुमार वादे के मुताबिक तीसरे दिन लंच से कुछ पहिले ही अस्पताल में अनुपम के पास पहुच गया। वार्ड में प्रचंड जी पूर्ववत लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम पर थे। शरीर में तनिक भी हलचल नहीं थी। तरह-तरह की दवाइयों की गंध से वार्ड भरा हुआ था। अनुपम के चेहरे पर चिंता और अनिर्णय के मिश्रित भाव पसरे हुए थे। रजनी अंकल की खरी-खरी बातों ने उसको भीतर तक झकझोर दिया था।
‘‘बोलिए अनुपम जी, सरकार से मदद लेने के बारे में आपने क्या सोचा?’’ अरुण कुमार ने कुर्सी पर बैठते-बैठते बिना भूमिका के पूछ लिया।
दो मिनट यूँ ही चुप्पी में निकल गये।
अनुपम को जब यह अहसास हुआ कि अरुण कुमार के प्रश्न पर कोई न प्रतिक्रिया तो देनी ही होगी, तो बेमन से बोला-‘‘हम लोग अभी कोई निर्णय नहीं कर पाये हैं...।’’
‘‘आपको कोई ताजमहल का सौदा थोड़े ही करना है मित्र। बाबूजी के इलाज के लिए सरकार से 3-4 लाख रुपयों की आर्थिक सहायता ही माँगनी है, बस...। संकोच और आदर्शवाद को गोली मारो और आने वाली लक्ष्मी का स्वागत करो। मौका भी है और दस्तूर भी।’’
‘‘अरुण जी, यह तो स्वाभिमानी प्रकृति के हमारे बाबूजी के सिद्धांतों के एकदम खिलाफ होगा।’’-अनुपम ने चुप्पी तोड़ी।
‘‘मेरे दोस्त आजकल स्वाभिमान और सिद्धांत केवल कपड़े धोने के साबुन की गुणवत्ता बढ़ाते हैं। इन फालतू की बातों को छोड़ो। मैंने संस्कृति महकमे के लिए आवेदन पत्र टाइप करवा लिया है। सिग्नेचर करो और डॉक्टर का सिफारिशी पत्र नत्थी कर कल दोपहर तक मेरे पास पहुँचा दो। बाकी काम मैं कर लूँगा।’’ अरुण कुमार ने दो टूक शब्दों मे अपनी बात कही और अनुपम को आवेदन पत्र पकड़ा दिया।
अनुपम ने आवेदन-पत्र को अपने हाथों में तत्काल नहीं सहेजा, तो अरुण कुमार को आखिरकार कहना ही पड़ा-‘‘आवेदन-पत्र पर सिग्नेचर करने के बाद आपको आर्थिक सहायता का चैक प्राप्त करने के अलावा कुछ भी नहीं करना पड़ेगा। सरकारी धन रूपी नदी के जल को इस या उस बहाने से अपने खेत में उलीचने के लिए किसी न किसी गोरखधंधे की मदद तो लेनी ही पड़ती है, वह सब मैं कर लूँगा। मित्र, अब इन सबसे परहेज करने वाले पछताते देखे जाते हैं। हम रोज देखते हैं कि जरूरतमंद तो सरकारी मदद की बाट जोहते ही ईश्वर या अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं और बेज़रूरत लोग लाखों की रकम हथिया लेते हैं। ये सब भीतर की बातें हैं, उनके बारे में ज्यादा बताना ठीक भी नहीं। गुठलियाँ गिनने में वैसे रखा भी क्या है।’’ यह कहते-कहते अरुण कुमार के चेहरे पर व्यंग्यात्मक हँसी खिल उठी।
अरुण कुमार के वज़नदार तर्कों और अपने मन में अंकुरित लालच के वशीभूत होकर अनुपम ने आवेदन-पत्र पर एक नजर डाली और उस पर हस्ताक्षर के लिए वह जैसे ही उद्यत हुआ, पेन को पकड़ा हुआ उसका हाथ स्थिर हो गया। जैसे किसी ने उसको जबरन जकड़ लिया हो। उसने अपने हाथ में हल्की सी कँपकपी भी महसूस की। उस समय मन में ऐसा कचोटता सा भाव भी जागा जैसे वह कोई बड़ा अनर्थ करने जा रहा है।
अरुण कुमार की उपस्थिति के अहसास ने अनुपम को इस अप्रत्याशित स्थिति के दौर से जल्दी ही उबार लिया। उसने तन-मन की सारी ताक़त जुटायी और आवेदन-पत्र पर हस्ताक्षर कर अरुण कुमार को सौंप दिया। उसने उसको आश्वस्त भी कर दिया कि डॉक्टर का सिफारिशी पत्र वह उसके घर कल भिजवा देगा।
अरुण कुमार विजयी भाव लिए अस्पताल के वार्ड से बाहर हो गया। कुछ देर बाद डॉक्टर राउण्ड पर आया तो अनुपम ने सारी बात उसके सामने रखी और सिफारिशी पत्र लिख देने की गुजारिश की। डॉक्टर को भला इसमें क्या एतराज हो सकता था। सिफारिशी पत्र तैयार कर उसने वह अनुपम को सौंप दिया।
अनुपम ने जब डॉक्टर को धन्यवाद दिया, तो डॉक्टर अपने मन में छिपी बात को कहने से स्वयं को न रोक सका-‘‘मिस्टर अनुपम, आप इस समय शायद यह सोच रहे होंगे कि यह सिफारिशी पत्र मैंने इतनी आसानी से कैसे लिख दिया। दरअसल बात यह है कि पेशेंट जब अस्पताल में एक्सपायर हो जाता है, तो उसके रिश्तेदारों से इलाज की मोटी रकम वसूल कर पाना कई कारणों से बड़ा कठिन काम हो जाता है, फिर चाहे रिश्तेदार करोड़पति ही क्यों न हों। ऐसे भी मौके आये हैं जब पैसों की वसूली के लिए हमें डेड-बॉडी को सड़क पर रखना पड़ा है। सरकार से या किसी बड़े दानदाता से सहायता मिल जाती है, तो अस्पताल के बिल का पेमेंट आसान हो जाता है।’’
अनुपम ने संकोच भरे शब्दों में पूछा-‘‘डॉक्टर साहब सहायता का यह चैक मिलने में एक हफ्ता तो लग ही जायेगा। आप बाबूजी को लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम पर अब कितने दिन और रख सकते हैं?’’
‘‘देखिये, मेडिकली ही इज आलमोस्ट डेड। हम लोगों ने भ्रमजाल को 8 दिन खींच लिया। अधिक से अधिक 4 दिन हम और खींच सकते हैं, लेकिन प्रकरण की विशेष स्थिति को देखते हुए हम मरीज को एक हफ्ते और सिस्टम पर रख लेंगे। इसमें हमारा भी तो भला है।’’ डॉक्टर रहस्यमय ढंग से हल्का सा मुस्कुराया। डॉक्टर की ऐसी मुस्कुराहटों के सही-सही अर्थ कुछ ही चतुर लोग समझ पाते हैं।
संस्कृति महकमे को आर्थिक सहायता के लिए आवेदन पत्र भेजने के सातवें दिन की शाम के यही कोई पाँच बजे थे। अनुपम चिन्ता में डूबा हुआ था, उसी समय वार्ड के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। दरवाज़ा खोला तो बाहर चपरासी-सा दिखने वाला सरकारी कर्मचारी खड़ा था।
‘‘सर, क्या आप ही श्री अनुपम चतुर्वेदी जी हैं?’’ कर्मचारी ने पूछा।
‘‘हाँ, मैं ही अनुपम चतुर्वेदी हूँ। कहो क्या बात है?’’
‘‘लीजिये, यह लिफाफा। आपके लिए ही है।’’ कह कर चपरासी ने लिफाफा अनुपम को सौंप दिया।
अनुपम ने लिफाफा खोला। भीतर से 3 लाख रुपये के वेयरर चैक के साथ रेवेन्यू स्टैम्प लगी रसीद भी थी। उसने रसीद पर हस्ताक्षर कर वह कर्मचारी को तुरत-फुरत लौटा दी और जाते-जाते उसको 50 रुपये का एक नोट भी थमा दिया। कर्मचारी खुश हो ‘नमस्ते’ कहकर चला गया। अनुपम को लगा उसने आज सफलता का एक बड़ा किला फतह कर लिया है। बिना देर किये मोबाइल पर सूचित कर उसने डॉक्टर को वार्ड में बुलवा लिया।
‘‘बहुत-बहुत बधाई, मिस्टर अनुपम।’’ डॉक्टर भी अपनी प्रसन्नता को छिपा नहीं पा रहा था।
डॉक्टर से प्रसन्न मन हाथ मिलाते हुए अनुपम बोला-‘‘यह तो मिस्टर अरुण कुमार की मेहनत और आपकी मेहरबानी का नतीजा है डॉक्टर साहब।...आपके सारे बिल्स का भुगतान कल कर दिया जायेगा।...मैं समझता हूँ आपका भुगतान एक-सवा लाख का होगा।’’
‘‘हाँ, इतना ही होगा। बोलिए, अब क्या करना है?’’
‘‘मैं परिवार के लोगों को अभी यहाँ बुलवा लेता हूँ। आप आधे घंटे बाद बाबूजी के पलंग से लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम हटवा दीजिये। उनके पार्थिव शरीर को अब इस सिस्टम पर रखने का कोई औचित्य शेष नहीं रह गया है। अच्छा हुआ सहायता का यह चैक हमारे अनुमान के मुताबिक सात दिन में मिल गया।’’
‘‘ठीक है, मैं एक सीरियस पेशेट को देखकर अभी 20-25 मिनट में लौटता हूँ। तब तक आप अपने फैमिली मेम्बर्स को यहाँ बुलवा लीजिए।’’
लेखक हरिचरण ‘प्रचंड’ का सारा परिवार प्रायवेट वार्ड नम्बर 10 में इकट्ठा था। ऐसा लग नहीं रहा था, जैसे एक जिंदगी के साथ मौत के मिलन की अन्तिम बेला आ गई है। डॉक्टर ने प्रचंड जी के पलंग से लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम खुद हटा दिया। तत्क्षण प्रचंड जी के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई। पिछले 15 दिनों की तरह ही वह पार्थिव शरीर तब भी निस्तेज पलंग पर पड़ा था।
अनुपम ने गौर से अपने पिता के चेहरे को देखा। वह एकदम चौंक पड़ा। स्वाभिमानी लेखक हरिचरण ‘प्रचंड’ के चेहरे पर उस क्षण गुस्से से भरे धिक्कार के ऐसे प्रखर भाव प्रगट हुए जैसे वे वहाँ उपस्थित सब लोगों से कह रहे हों-‘तुम लालचियों ने मेरी खुद्दारी और प्रसिद्धि की कीमत आखिर वसूल ही ली....लानत है तुम सब पर....दूर हटो मेरे पार्थिव शरीर के पास से....मुझे अकेला छोड़ दो....बसऽऽऽ ।’
प्रचंडजी का चेहरा फिर वैसा ही निस्तेज लगा, जैसा वह पिछले 15 दिनों से था।

‘व्यंकटेश कीर्ति’, 11, सौम्या एन्क्लेव एक्सटेंशन,
सियाराम कालोनी, चूनाभट्टी,
राजा भोज मार्ग, भोपाल-462016

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