विस्मयकारी हर्ष का अनुभव ---- डॉ0 दिनेशचन्द्र द्विवेदी



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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मुखर स्वर ---- विस्मयकारी हर्ष का अनुभव
डॉ0 दिनेशचन्द्र द्विवेदी



अक्टूबर 2009 का ‘स्पन्दन’ अंक देखने का अवसर मिला। डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर द्वारा सम्पादित चतुर्मासिक पत्रिका का यह अंक डॉ0 लखनलाल पाल के सम्पादन में लोकार्पित हुआ है। उरई जैसे कम सारस्वत सुविधाओं वाले स्थान से ऐसी पत्रिका का प्रकाशन विस्मयकारी हर्ष प्रदान करने वाला है। आलेख, कहानी, संस्मरण व्यंग्य तथा कविता को स्थान देकर इस पत्रिका ने विस्तृत साहित्यिक धरातल का स्पर्श करना चाहा है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘पोस्टमास्टर’ को स्थान लेकर उच्च साहित्यिक चेतना के प्रति आग्रह प्रदर्शित करती यह पत्रिका समकालीन सरोकारों से लैस डॉ0 सुरेन्द्र नायक की ‘एहसान’ कहानी के माध्यम से उपभोक्तावादी मानसिकता में छिपे वासनामूलक सूक्ष्म एहसासों को निरूपित करने की चेष्टा है। कथाकार ऐन्द्रिय गंध की प्रतीति करवा सका है किन्तु इससे कहीं अधिक उसने मानवीय संवेदनाओं के अकाल के समकाल में उच्चतर मूल्यों से विलोपित संवेदनाओं के प्रति रुचि प्रदर्शित कर युगीन खण्डित न्यूनताओं को खारिज करने की कोशिश की है। ‘संघर्ष हमारा नारा है’ व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार ने आज की जिन्दगी की आपा-धापी को बिम्बात्मक परिदृश्यों से रेखांकित करके प्रस्तुत किया है। जो अखर रहा है उसे प्रस्तुत करने का प्रभावशाली प्रकार व्यंग्य है। रसोई गैस आज के जीवन की अनिवार्यता बन गई है। इसे प्राप्त करना उतना ही कठिन हो गया है। जितना कभी द्रोणचल पर्वत से संजीवनी बूटी लाना। यह व्यंग्य सामाजिक, प्रशासनिक तथा घरेलू विसंगतियों पर तिहरी चोट पहुँचाता है। अमित मनोज की ‘सच’ कहानी में एक शहीद पर प्रशासनिक और राजनीतिक कारगुजारियों के विक्षोभकारी परिदृश्य हैं। लगता है कि हर घटना, परिदृश्य तथा जीवन-पथ पर साहित्यकार की नजदीकी नजर है।
इस अंक की रूपनारायण सोनकर की ‘दूध का दाम’ कहानी अपने कलेवर में पत्रिका की सामर्थ्य से बड़ी कहानी में एक उपन्यास का वस्तु-विन्यास धारण किए हुए है। मिसेज सी-जार्ज जोजेफ की दैहिक बनावट को वासनात्मक लिखावट में प्रस्तुत किया गया है। नपुसक पति की असमर्थता का दाह किसी नारी को कितना तड़पाता है इसका जीवन्त चित्रण है। एक बच्चे को गोद लिया जाना फिर नाटकीय ढंग से एक बच्चा और एक बच्ची का जन्म होना। ये बच्चे बड़े होकर कथानक को दूरदर्शन के धारावाहिकों जैसा रूप प्रदान करने लगे। फिर गोद लिया बेटा सी-जार्ज जोजेफ के नपुसक संदेश से माँ मिसेस जोजेफ की जान बचाने के लिए नाटकीय प्रकार से शहीद होने की चेष्टा करता है। कथानक की आवश्यकता न होते हुए भी जोजेफ सन्तान पीटर के बैक-ओपेन प्रसंग को फूहड़ता से जोड़ा गया है। घटना पर घटना जोड़ने वाले की प्रवृत्ति से कथाकार जज की वासना को कथानक के साथ जोड़कर उसके आदेश पर दीवान सिंह द्वारा लारेन्स को सूट करवा देता है। कहानीकार के पास शब्दशक्ति, कल्पनाशक्ति तथा कथा-विन्यास को रूपायित करने की शक्ति दिखती है किन्तु कम पन्नों एवं कम समय में समाज की प्रत्येक विकृति को चित्रांकित करने का उसका प्रयास कहानी को विचित्र, फूहड़ तथा बेढब बना देता है।
‘धुँआ उठने लगा है’ के0पी0 मीणा के संस्मरण में आदिवासी जिन्दगी को निहारने की प्रशंसनीय चेष्टा की गयी है। ऐसी सामग्री पत्रिका को बहुआयामी तथा जनवादी बनाती है। मानव श्रम को क्षरित, सीमित तथा समाप्त करने का दर्द भरा सत्य ‘करघों से रिक्शों के हैंडिल तक’ आलेख में विवक्षित है। इस प्रकार के आलेख यान्त्रिक युग की अपेक्षा मानव-श्रम-युग की महत्ता को महत्व देकर वस्तुतः ओस की बूँदों पर पड़ रही सबेरे के सूरज की रोशनी को बनाये रखने की कोशिश को बरकरार रखना चाहते हैं। इस अंक का ‘काव्य प्रसून’ सोच और संवेदना के पक्ष की प्रभावशाली प्रस्तुति कर सका है। एतदर्थ इन कविर्मनीषियों को साधुवाद। सम्पादक और रचनाकारों को बधाई।

221 ‘स्वस्तिप्रस्थ’ सुशीलनगर
उरई (जालौन) मो0 9506030433

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