स्पंदन को आपकी देखरेख चाहिए है अभी ---- सुधांशु चौधरी



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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मुखर स्वर ---- स्पंदन को आपकी देखरेख चाहिए है अभी
सुधांशु चौधरी



स्पंदन देखी, हमेशा की तरह कवरपेज ने मन को लुभाया। चित्रांकन में हस्तनिर्मित पेंटिंग देखकर मन प्रसन्न हुआ। वैसे आपको मेल करने का कोई इरादा नहीं था, पहले भी नहीं की हैं, क्योंकि साहित्य के बारे में बहुत गहरी या कहें कि समझ नहीं है। हमारे एक मित्र ने स्पंदन से परिचित करवाया था, उसके नाम और छोटे से आकार में भी कलेवर की विस्तृत रूपरेखा ने मन को प्रसन्नता से भर दिया था। इस समय साहित्य के क्षेत्र में एक-दो पत्रिकाएं ही ऐसी निकल रहीं हैं जो अपने आपको भौंड़ेपन से दूर रखकर पाठकों को समुचित पठनीय सामग्री उपलब्ध करवा रहीं हैं। मैं स्पंदन को उनमें से एक मानता रहा हूं। इस विश्वास को स्पंदन का पूर्णांक 11 देखकर बड़ी ठेस लगी।
स्पंदन के कवर की प्रसन्नता से खुश होकर आगे देखना और पढ़ना शुरू किया तो एक दो रचनाओं के बाद होश उड़ने शुरू हो गये। लगा ही नहीं कि मैं स्पंदन को पढ़ रहा हूं। यह हालत सभी रचनाओं को पढ़ने से नहीं बल्कि दूध का कर्ज जैसी कहानी को देखकर हुई। यह पत्र विशेष रूप से उसी के लिए मेल करना पड़ा है। लखनलाल जी, आप इसे कहानी कैसे कह सकते हैं? यह नहीं देखिए कि लेखक दलित है तो उसकी सभी रचनाओं में दलित अस्मिता की चर्चा ही होगी। दलित के नाम पर वहां भौंड़ापन ही दिखाया गया है। उस कहानी के लेखक को भी मैंने पत्र लिखो है, आप भी पूछिएगा कि किस समाज में ऐसा होता है जो लेखन ने इस कहानी में दिखाया है? कहीं ये लेखक की अपनी कहानी तो नहीं है? मैं उन्हीं की तरह तो नहीं लिख पाता हूं किन्तु यह निवेदन उनसे कर सकता हूं कि वे लेखन कार्य बन्द कर दें।
बाकी कहानियों में, कविताओं में सब कुछ ठीक-ठाक रहा। हमेशा की तरह कुछ रचनाओं ने मन को छुआ, कुछ ने निराश किया। कुमारेन्द्र जी आपका सम्पादन कहीं से भी कमजोर नहीं है। मैं आपसे न मिलने के बाद भी आपकी बहुत इज्जत करता हूं साथ ही आपके कुशल सम्पादन का प्रशंसक भी हूं। डॉ0 लखनलाल जी की लेखनी भी सुंदर है किन्तु लेखन और सम्पादन दो अलग-अलग चीजें हैं, इन्हें एकसाथ जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। एक निवेदन कुमारेन्द्र जी आपसे करना है कि बहुत जरूरी न हो तब तक स्पंदन को आप किसी और से सम्पादित न करवायें। यदि ऐसा करवाना अत्यावश्यक होता भी हो तो उसमें अन्तिम सहमति आपकी ही होनी चाहिए। इस बार का अंक देखकर आसानी से कहा जा सकता है कि इसका सम्पादन आपके द्वारा नहीं किया गया है। स्पंदन अभी अपनी बाल्यावस्था में है, उसको अभी आपकी देखरेख की आवश्यकता है।
आशा है कि आप मेरी इन बातों का बुरा नहीं मानेंगे। इसके साथ ही अपेक्षा की जा सकती है कि अगला अंक और शेष आगामी अंक आपके उत्कृष्ट सम्पादन में हमेशा की भांति पढ़ने को मिलेंगे। शुभकामनाओं सहित

सुधांशु चौधरी, कोलकाता
कोलकाता से आई ई-मेल से प्राप्त प्रतिक्रिया

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