बुन्देली का मानकीकरण


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 कैलाश बिहारी द्विवेदी


बुन्देली भाषी क्षेत्र विस्तृत है। इसके विस्तार के सम्बन्ध में डा0 एम. पी. जैसवाल ने कुछ रोचक तथ्य दिये हैं-
1-बुन्देली का क्षेत्र पश्चिमी हिन्दी के लगभग आधे क्षेत्र में फैला हुआ है।
2-खड़ी बोली, ब्रज और कन्नौजी के सम्मिलित क्षेत्र के बराबर बुन्देली क्षेत्र है।
3-यूरोप के स्विटजरलैण्ड और बैलजियम के सम्मिलित क्षेत्र के बराबर बुन्देली क्षेत्र है।
बुन्देली उत्तर प्रदेश के छः जिलों -झाँसी, ललितपुर, महोबा, उरई (जालौन) हमीरपुर तथा बाँदा और मध्य प्रदेश के लगभग बाईस जिलों-टीकमगढ. छतरपुर, पन्ना, सागर, दमोह, सतना, की नागौद तहसील, जबलपुर की मुड़बारा (कटनी) तहसील छोड़कर नरसिंहपुर, मण्डला, सिवनी, रायसेन, भोपाल, होशंगाबाद, विदिशा, गुना, मुरैना, भिण्ड़, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, सीहौर जिलें का कुछ भाग तथा बालाघाट और छिन्दबाड़ा के कुछ भागों में बोली जाती हैं।
भाषाई क्षेत्रों की सीमा राजनैतिक सीमाओं की तरह बिल्कुल निश्चित तो होती नहीं है। दो भाषाओं या बोलियों के बीच एक संक्रमणशील क्ष्ेत्र होता है। इसमें दोनों बोलियों की झलक रहती है। प्रमुखतः शब्द समूह मिश्रित रहता है। उदाहरणार्थ सतना जिले की बोली को बुन्देली भाषी बघेली कहते हैं और बघेली भाषी बुन्दलहाई बघेली कहते हैं। इस कारण उपर्युक्त जिलों में से ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, गुना आदि दूसरी बोलियों से लगने वाले जिलों की बुन्देली पर निकटवर्ती बोलियों का प्रभाव है।
इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा और मैनपुरी जिलों में भी काफी बुन्देली भाषी हैं। ग्रियर्सन ने सन् 1891 की जनसंख्या के अनुसार इनकी संख्या 313000 लिखी थी। इसके विच्छिन्न रूप म0प्र0 के बैतूल तथा महाराष्ट्र के भण्डारा, अमरावती और चान्दा जिलों में पाये जाते हैं। ग्रियर्सन ने नागपुरी हिन्दी को भी बुन्देली के अन्तर्गत माना है।
बुन्देली की भाषिक इकाई का क्षेत्रफल लगभग 183479 वर्ग किमी0 है। सम्पूर्ण बुन्देली क्षेत्र की बोली को एक नाम न मिल पाने का मुख्य कारण है इसका बुन्देली नाम। यह नाम बुन्देला क्षत्रियों से जुड़ा है। इस कारण जो क्षेत्र बुन्देला राज्यों के बाहर थे, उन्हें अपनी बोली को बुन्देली कहने में ऐतराज रहा। इस मानसिकता के कारण इसके छोटे-छोटे क्षेत्रों की बोली के लिए मरैठी, डँगई, चैरासी की बोली, मालए की बोली, सगरयाऊ, गढ़ा की बोली, खटोला की बोली, लुदयाऊ या रठोंय (जिसको बाद मे ग्रियर्सन ने क्रमशः लुधाँती और रठौरा कहा), पवारी, भदौरी, तवरधारी, बनाफरी, लोधी, कुम्हारी, कोष्ठी, चमारी, गावली आदि जातियों या स्थानों के आधार पर नाम चलते रहे। डा0 कृष्णलाल हंश ने ऐसे बहुत सारे नामों का उल्लेख किया है परन्तु वास्तविकता यह है कि मोटे तौर पर इसके दो ही रूप हैं-एक पूर्वी दूसरी पश्चिमी। पूर्वी का क्षेत्र विस्तार पश्चिमी से लगभग दोगुना है। पूर्वी पर नव प्रवर्तन का प्रभाव कम है। जबकि दिल्ली से दक्षिण के सैनिक अभियानों का मार्ग होने तथा वहाँ की उपजाऊ धरती होने के कारण दिल्ली के शासकों की लुब्ध दृष्टि बुन्देली के पश्चिमी क्षेत्र पर सदा लगी रही। इस कारण वह बार-बार आक्रमणों का शिकार होता रहा और उनके अधीन भी रहा। अतएव दिल्ली-मेरठ के आसपास की कौरवी बोली के संघात से उसमें नव प्रवर्तन अधिक हुआ। इस क्षेत्र पर गैर बुन्देली शासन जो स्वतंत्रता पूर्व तक रहा, वह भी नव प्रवर्तन का एक कारण है।
सर्वप्रथम सन् 1894 से 1933 तक ग्रियर्सन ने जब भारतीय भाषाओं का व्यापक सर्वे कराया तब भाषाई तत्वों के आधार पर इस सम्पूर्ण क्षेत्र के उपबोलीगत रूपों में एकसूत्रता की तलाश कर उनके समग्र रूप को बुन्देली के रूप में मान्यता किया।
बोलियों के छोटे या बड़े उपबोली रूपों के विकसित होने के कारण हैं-
(1) घने जंगलों, नदियों, पहाड़ों आदि प्राकृतिक बाधाओं का होना, जिससे बोलीगत आदान-प्रदान स्वतंत्रतापूर्वक और बारम्बार नहीं हो पाता है।
(2) राजनैतिक एक सूत्रता का अभाव।
(3) समाजैतिहासिक प्रभाव आक्रमणकारियों की भाषा के संघात से बोलियों में संकरता पैदा होती है और राजनैतिक उथल-पुथल भरे अशान्त वातावरण में साहित्य सृजन न हो पाने के कारण बोलियों का मानक रूप नहीं उभर पाता है। बुन्देली के साथ ये सभी कारण जुड़े हुए हैं।
इनके प्रभाव से बुन्देली के स्वरूप में जो विविधता है, वह निम्न प्रकार हैं-
(1) बुन्देली भाषी क्षेत्र के कई अन्य बोली क्षेत्रों से घिरे होने के कारण इसका वाक्यगत बलाघात सुर लहर और अंशतः शब्द समूह प्रभावित हुआ है।
(2) हकार प्रयोग की न्यूनाधिकता पायी जाती है।
(3) रकार लोप की प्रवृत्ति और उसकी विभिन्न पद्वतियों से रकार कहीं स्वरीकृत होता है। जैसे-अटारी-अटाई, कहीं अग्रध्यनि में द्वित्व हो जाता है जैसे -करलो, कल्लो, धर दो धद्दो। रकार लोप की न्यूनाधिकता बोलने वालों के बौद्धिक स्तर पर निर्भर करती है।
(4) महाप्रणत्व की न्यूनाधिकता-जैसे बनाफरी और लुघांती के कुछ क्षेत्रों में महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। हकार बहुलता इसी का एक अंग है। बुन्देली के अन्य क्षेत्रों में, सगरयाऊ को छोड़कर अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति है। दूसरी प्रवृत्ति है महाप्राणत्व के शब्दगत अपशरण की। जैसे स्तम्भ-थामों, रकम्भ-खास, वृहद्-भौत।
(5) कृषि सम्बन्धी क्षेत्रीय और अतिक्षेत्रीय शब्दों का प्रचलन पाया जाता है।
(6) सर्वनामों में कुछ अधिक भिन्नता पायी जाती है। जैसे-स्थानवाची सर्वनामों में इतै-उतै, नायँ-मायँ, ह्याँ-हाँ, हिनाँ-हुनाँ, झाँ-भाँ आदि रूप पाये जाते हैं। पुरुषवाची सर्वनामों में उत्तम पुरुष एकवचन में ‘मैं, ‘हम’ बहुवचन में ‘हम औरें’ और ‘हमन’ रूप पाये जाते हैं। मध्यम पुरुष में ‘तूँ, तें’ और तुम तथा बहुवचन में ‘तुम औरें’ और ‘तुमन’ शब्दों का प्रयोग होता है। निश्चयवाची सर्वनामों में दूरवर्ती ‘ऊ,ओ और बा’ तीन रूप प्रचलित हैं। निकटवर्ती में ‘ए, ई और जा’ प्रचलित है।
(7) बहुवचन बनाने के लिए ‘न’ और ‘ओं’ परसगों का प्रयोग होता है। जैसे मोड़ा-मोड़न तथा मोड़ा-मोंड़ों।
(8) बलवाची प्रत्यय ऊ तथा ई का प्रयोग होता है और अधिक बल देने के लिए कहीं-कहीं ‘आ’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-हमइँआ गये ते। इस उदाहरण में हम के साथ ‘ई’ और ‘आ’ का दुहरा बल लगा है। शब्द पर अधिक बल देने की एक और भी पद्वति है जिसे तत्स्थानी बलवाची कहा जा सकता है। जैसे सबरौ-सब्बरौ-बब्बरौई, तनक-तन्नक-तन्नकऊ, निठुँअँइँ-निठ्टुँअँइँ। प्रथम दो उदाहरणों में दुहरा बल लगा है। तीसरे का पहला रूप भी बलयुक्त है। उस पर भी दुहरा बल दिया गया है।
आजकल शिक्षा और संचार माध्यमों के प्रसार तथा यातायात के साधनों में वृद्धि के कारण जनसामान्य में नकली और दिखावटी जीवन जीने की ललक पैदा हो रही है। इससे लोगों के मन में लोक भाषा और संस्कृति के प्रति एक हीन भावना घर करती जा रही है फिर भी सरकार, विश्वविद्यालय और बुद्धिजीवी, जो भविष्यचेता हैं तथा यह जान रहे हैं कि इस ऊहापोह भरे भौतिकवादी युग में लोकभाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, परम्परा आदि सम्पूर्ण लोक-विरासत शीघ्र ही विच्छिन्न होकर एक संक्रमण शून्य अन्तराल पैदा करने वाली है, के प्रयत्न और प्रोत्साहन से लोक साहित्य और संस्कृति पर किये जाने वाले काम को कुछ महत्व मिलने लगा है। अतएव उसके संरक्षण और संवर्धन की प्रेरणा लोगों में पैदा हो रही है। इस कारण आज यह आवश्यक हो गया है कि बुन्देली का एक परिनिष्ठित या मानक रूप स्थापित हो, ताकि बुन्देली साहित्य के संवर्द्धन के लिए एक व्यापक आधार बने।
भाषा के विकास की गति स्वाभाविक होती है। यदि उसकी गति से अधिक छेड़-छाड़ की जाये तो नव स्थापित रूप प्रवाह में तैरते हुए हलके पदार्थ की तरह एक किनारे जा लगता है और प्रवाह स्वाभाविक गति से अनवरत आगे बढ़ता जाता है, संस्कृत के साथ यही हुआ।
अतः बुन्देली के मानक स्वरूप को स्थापित करना एक संवेदनशील प्रश्न है। इसके मानक स्वरूप को स्थापित करने के जिन आवश्यक तत्वों की तलाश हो, वे इसके अपने ही होना चाहिए। इस दृष्टि से टीकमगढ़ नगर से एक सौ मील अर्द्धव्यास के वृत्त में आने वाली बोली को बुन्देली का मानक रूप मानना उचित होगा क्योंकि इस वृत्त क्षेत्र की बोली में बुन्देली के सभी उपबोली रूपों की विशेषतायें घुली-मिली हैं।
विचारार्थ कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
(1) पूर्वी बुन्देली में उत्तम पुरुष एक वचन के लिए ‘हम’ मध्यम पुरुष के लिए ‘तुम’ और ‘तें’ का प्रयोग होता है। पश्चिमी क्षेत्र में ‘में’ (एकवचन) ‘हम’ (बहुवचन) तथा मध्यम पुरुष के लिए एकवचन में ‘तूँ’ और ‘तुम’ तथा बहुतवचन में ‘तुम’ का प्रयोग होता है। प्रस्तावित क्षेत्र में उत्तम पुरुष एकवचन के लिए ‘में’ और ‘हम’ दोनों का प्रयोग होता है। इनके प्रयोग में भिन्नता अहम्, लघुता अथवा विनम्रता-प्रदर्शन जैसी भी स्थिति हो, उस पर निर्भर करती है। अहम् वाली स्थिति में हम का प्रयोग होता है। बहुवचन के लिए ‘हम औरन’ का प्रयोग होता है। लघुता या विनम्रता की स्थिति में एकवचन के लिए ‘मैं’ तथा ‘हम’ दोनों का चलन है। बहुवचन के लिए ‘हमन’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। मध्यम पुरुष में भी बहुवचन बनाने की यही शैली प्रचलित है।
(2) पूर्वी बुन्देली में वर्तमान कालिक सहायक क्रिया के रूप में ‘आय’ तथा पश्चिमी क्षेत्र में ‘है’ का प्रचलन है। प्रस्तावित क्षेत्र में दोनों का प्रचलन है। जैसे-इतै तौ कछू हैई, उतै काय धरो? इस उदाहरण में ‘है’ तथा ‘आय’ दोनों का प्रयोग हुआ है।
(3) बुन्देली के पूर्वी रूप में दूरवर्ती निश्चयवाची सर्वनाम ‘ऊ’ और इसी के विकारी रूप ‘ओ’ तथा निकटवर्ती में ‘ए’ और ‘ई’ का प्रयोग होता है। पश्चिमी में क्रमशः ‘बा’ और ‘जा’ प्रचलित है। प्रस्तावित क्षेत्र में दोनों के प्रयोग वैकल्पिक नहीं बल्कि भिन्न-भिन्न स्थितियों में रूढ़ है। प्रस्तुत उदाहरणों में उपर्युक्त सभी सर्वनामों का प्रयोग हुआ है।
1. ऊ सें कैदो बौई चलो जाये। ओई ने पैलाँ कईती कै हम चले जेंयँ/जेंहे।
2. जा लुगाई महाँ चण्डालन आ है। बा तौ सूदरी है।
3. ई मोड़ा के मारें नाँक में दम है। एई सें तौ हम इयै क्याऊँ लुआ नइँ जात।
इन थोड़े से उदाहरणों से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में किसी सर्वनाम का प्रयोग एकान्तिक नहीं होता है और न विकल्पनीय है।
(4) पूर्वी बुन्देली में कर्मकारक परसर्ग खों, खाँ और खें का वियोगात्मक प्रयोग होता है। जैसे-राम खों, ऊ खाँ आदि। पश्चिमी में ‘ए’ ‘य’ अथवा ‘य’ का श्लिष्ट प्रयोग होता है। जैसे-रामें किताब लैदो, बाय जान दो। वियोगात्मक विभक्ति ‘को’ का भी कहीं-कहीं प्रयोग होता है। प्रस्तावित क्षेत्र में सर्वनामों के साथ ए अथवा ‘ए’ का श्लिष्ट योगात्मक प्रयोग हमें, तुमें, उऐ, उनें, इऐ होता है। यद्यपि अन्य पुरुष सर्वनामों के साथ वियोगात्मक विभकत ‘खो’ का प्रयोग भी होने लगा है। यथा ई खों, ऊ खो, इन खों आदि। परन्तु यह परिनिष्ठित हिन्दी का नव प्रवर्तित प्रभाव है। मानक बुन्देली में यदि ‘खो’ को अपनाया जाये तो अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि यह मध्यवर्ती रूप है और ‘खाँ’ की अपेक्षा श्रुतिमधुर है।
(5) पूर्वी बुन्देली के अधिकांश भागों में बलवाची ‘ई’ का तथा पश्चिी में ‘ऊ’ का प्रयोग होता है। संदर्भित क्षेत्र में दोनों का प्रयोग कुछ रूढ़ स्थितियों में होता है। मानक रूप में ये दोनों अपनाये जा सकते हैं।
(6) यहाँ तक कि बनाफरी क्षेत्र संदर्भित क्षेत्र से थोड़ा दूर है फिर भी मुलक केरे, मुतकेरे, ग्ललन केरे आदि परिमाणवाची विशेषणों पर बल देने के लिए ‘के’ के बजाय ‘केरे’ का इस्तेमाल किया जाता है जो बनाफरी प्रयोग है।
(7) स्थानवाची सर्वनामों में पूरे बुन्देली क्षेत्र में बहुत विविधता है (जिनका उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है)। संदर्भित क्षेत्र में ‘इतै-उतै’, ‘जितै-कितै’, ‘जाँ-काँ’ का प्रयोग होता है। मानक रूप में इन्हीं का प्रयोग होना उचित है। ये यत्र-तत्र आदि से विकसित होने के कारण अध्ािक कुलीन है और संस्कारवान भी। इनका प्रयोग तुलसी, कबीर, लाल तथा अन्य कवियों ने किया है। जैसे-
‘भोजन करत चपल चित, इत उत अवसर पाई।’ - तुलसी
‘इत तें सब कोउ जात है उत तें कोउ न आय।’ - कबीर
‘जित जित घोड़ा पग धरै, उत उत फतै होय।’ - लाल
‘इत जमना उत नर्मदा इत चम्बल उत टोंस।’ - लाल
(8) इसी तरह परिमाणवाची विशेषणों में भी पूरे बुन्देली क्षेत्र में बहुत विविधता है। भौत, मुतके, कुल्ल, बिलात, गल्लन, भारी आदि शब्द प्रचलित हैं। इनमें से मानक बुन्देले के लिए ‘भौत’ शब्द ग्रहण करने योग्य है। क्योंकि यह शब्द ‘प्रभूत’ या ‘बृहद’ का विकसित रूप है। इसका विकास अभिधामूलक है। इसके ‘बृहद्’ से विकसित होने की संभावना अधिक है क्योंकि बहुत के अर्थ में ‘बड़े’ शब्द का प्रयोग आज भी पाया जाता है। जैसे-तुम तो बड़े अच्छे लगत। उतै बड़े मान्स जुटे ते। शेष शब्दों का विकास लक्षणामूलक है। गल्लन की जड़ें तो फारसी गल्लाह शब्द में खोजी जा सकती हैं।
संदर्भित क्षेत्र में बोली को बुन्देली के मानक रूप में स्वीकार करने का औचित्य यह भी है कि ओरछा का राज्य दीर्घजीवी रहा है। इस कारण राजाश्रय में यहाँ की बोली को विकास करने का अवसर मिला। इसमें साहित्य रचा गया। ग्रियर्सन तथा अन्य सभी विद्वानों ने जिस क्षेत्र में बोली को बुन्देली का परिनिष्ठित रूप माना है, प्रस्तावित क्षेत्र उसी का मध्य भाग है। यद्यपि ओरछा राज्य का बहुत विस्तार हुआ था किन्तु कालान्तर में यह बँटता या टूटता रहा। परिणामस्वरूप राजनैतिक वर्चस्व के अनुक छोटे-बड़े केन्द्र स्थापित हो गये। उनमें वर्चस्व भले ही बुन्देली का रहा और राज-काल में वही चलती रही, लेकिन स्थानीय जन-बोलियों के शब्द समूह, ध्वनि, प्रवृत्तियों और सुर लहर के संघात से उसके उपबोली रूप उभर आये किन्तु केन्द्र ओरछा ही रहा। इस कारण यहाँ की बुन्देली किसी जन-बोली के संक्रमण से अछूती रही है।
एक प्रश्न यह भी विचारणीय है कि ग्रियर्सन ने इटावा, मैनपुरी से छिंदवाड़ा और नागपुर तक फैली हुई जिस बोली को एक रूप में पहचाना उसको बुन्देली नाम ही क्यों दिया? इस प्रश्न का उत्तर यह हो सकता है कि ओरछा के बुन्देला राजाओं की छत्रछाया में जो बोली फल-फूल रही थी, उसी का पूरे क्षेत्र में स्थानीय रंग लिए हुए विस्तार था। तात्पर्य यह कि प्रश्नान्तर्गत क्षेत्र की बोली को ही बुन्देली की मूल प्रकृति के रूप में उसी प्रकार स्वीकार किया जाना चाहिए जिस प्रकार आचार्य वररुचि ने मध्यदेशीय या शौरसैनी प्राकृत को सभी प्राकृतों की मूल प्रकृति माना है।इससे एक लाभ यह भी है कि समस्त क्षेत्रों के बुन्देली भाषियों को इसमें अपनी बोली की झलक मिलेगी।
एक दृष्टिकोण यह भी है कि बुन्देली व्याकरण में बुन्देली शब्दों के साथ ही परिनिष्ठित हिन्दी और संस्कृत के शब्दों को जड़ कर मणिकांचन शैली को अपनाया जाये। इस शैली को अपनाने से बुन्देली का मानक रूप तो उभरता दिखेगा और उसकी सुबोधता का क्षेत्र भी व्यापक होगा, परन्तु बुन्देली की अभिव्यक्ति क्षमता के हास होने की संभावना भी इस प्रयोग में है। अतः इस प्रयोग में सावधानी आवश्यक है। साहित्यिक हिन्दी परिनिष्ठीकरण के चक्कर में बहुत कुछ अपनी विरासत खो बैठी है।
इस प्रकार का प्रयोग अनुवाद कार्यो में किया जा सकता है क्योंकि पुरानी भाषा, विदेशी भाषा या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की प्रवृत्तियों और शब्दों के अर्थ परिवृत्त (माहौल) में अन्तर हो सकता है, जिसे पाटने के लिए हिन्दी, संस्कृत या अति आवश्यक होने पर अन्य भाषाओं के शब्दों का बुन्देली में प्रयोग करना अनुचित और आपत्ति करने योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

पुरानी नजाई,
टीकमगढ़ (म0प्र0) पिन- 472001

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