गंजेड़ी


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली कहानी
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डा0 लखन लाल पाल

- ‘आजा रे! धन में आगी छुब जाय, यौ हौ जलम रोग आय....... ईखें कौन कभऊँ बढ़ानै है, एक दिना मर जैहिन सो सब इतईं डरो रै है, स्वसुर के काए मूँड़ औधाएँ खंगो है।’ उस्मान नै रामसेवक खें चिलम पीबे के लानै रंग चढ़ाओ। रामसेवक सन छील रओ तो, ओनै यहाँ वहाँ दिखो, आस-पास कोऊ नई दिखानो सो ऊ हँरा सें बोलो-‘चच्चा तनक ठहर जा, ईखें यहाँ वहाँ हो जान दै, मैं ठौर पै पहुँच जैहों।’
- ‘भग गंड़िया, लुगाई से इत्तौ डिरात हित ता काहे खें मुड़या लओ।’ उस्मान नै रामसेवक पै बिंग छोड़ो।
- ‘समझे करे चच्चा, वा हल्ला मचाउन लगत, को खुपड़िया खबवा है?’
- ‘ऐ... हैं.... है.... है.... बड़ौ खुपड़िया खबवाबे सें डिरात।’ उस्मान नै रामसेवक खें डपटो-’लुगाई की धुतिया तैं पहर लै रे, और घूँघट काढखें भीतर बैठ जा फिर तुहै कोऊ कहाय ता नीज्जात से पांच पन्हइया घलवाइये। रामसेवक बेबस हँस परो -‘चच्चा तै कौन मान हित, चलौ मैं अभई थोरी देर में आउत।’
रामसेवक ने सन कौ पूरा बखरी के कोने में टिका दओ और अपनी दस बरस की बिटिया रामबाई सें बोलो -‘बिन्नू अम्मा रतिया के घरै गई है, वा आ जावै सो बता दइए कि मैं ल्वहरा के इतै हँसिया खुरपी पिटवाउन गओ। मोखे देर लग जैहे।’ रामबाई लत्ता की पुतरियन से खेलत ती, औने हओ कर दई। रामसेवक खें ओखी हओ कम बजनीली लगी सो ओने फिरसें टटोलो-‘बिन्नू अम्मा खें का बता हित?’ रामबाई पुतरिया कौ सिंगार कर रई ती, वा नाक सुड़क खें बोली-‘कह दैहों दाऊ गांजौ पियन गओ।’
- ‘हैत्तोर नाश हो जाय, तुहै भुमानी परै, तै मोखें जानबूझ खें मरवा डरा हित।’ रामसेवक अपनी बिटिया के नीगर जाखें जोर सें चिल्लानो-‘काए मौड़ी तोखें कम सुनात है का?’
-‘हओ-ऽ... मोए कानन पै नई चिल्ला..... मोई पुतरिया नै काल से खाओ नहियाँ।’ बिटिया की गुस्सा में रामसेवक कौ गुस्सा हिरा गओ। औने बिटिया कै मूंड़ पै हांत फेरो-‘बिन्नू तोई पुतरिया नै काल से काए नई खाओ?’
- ‘पुतरा रोज गाँजो पियन जात, पुतरिया रोज हटकत मानतई नहिंया।’’ मौड़ी के उत्तर सें रामसेवक सन्न रह गओ। या मौड़ी पुतरियन सें येऊ खेल खेलत। गाँजौ तौ महूँ पियत, या मौड़ी सब कछू जानत समझत। ओखे अपने आप पै कछू शरम सी आई। उस्मान चच्चा ओखे काल सौ दिखो। ओखौ मन भओ कि गंजेड़ियन के ईगंर न जावै पै ऊ जादा देर ठहर न पाओ। ओने ई बातन खें अपने तरक (तर्क) से काटो-‘गाँजो पीखें मैं कौन आँय बाँय आय बकत हौं। अपने पइसन कौ तौ बहुत कम पियत। काम बरोबर करतई हौं, फिर काऊ खें का परेशानी? परेशानी है, बिन्नू की अम्मा खे परेशानी है। वा कहत - ‘गाँजौ करेजौ फूँकत, गाँजे पियत वाले की अच्छी खबाई भओ चाहिये। खबाई नई होत ता शरीर दौ कौड़ी कौ हो जात। टीबीयऊ हो जात।’ जेई डर ओखे रात दिन लगो रहत। रामसेवक नै खूब बहाने बनाए। बिटिया खें फुसला पोट खें अपने कोद मिलाओ। रामबाई खुश हो गयी। रामसेवक दरबाजे पै पहुँच खें बोलो -‘बता, बिन्नू, मैं कहाँ जात?’
- ‘गाँज.......... आहाँ, हँसिया पिटवाउन।’ रामबाई अपनी गल्ती पै हँस परी।
- ‘पगलू ...। रामसेवक हँसत भओ दोरे खे निकर गओ।
रामसेवक जल्दी सें जल्दी ठौर पैं पहुचवो चाहत। रस्ता में चैंकत भओ चलो जा रओ तो। ऊसई जेसे रावण सीता खें चुरावे खें जा रओ तो -’इत उत चितई चलत भड़िहाहीं।’ ऊ कारगदेव बब्बा खें सुमरत चलो जा रओ कि बिन्नू की अम्मा सें आमनौ-सामनौ न हो जावै। गैल में ओखें बहुतक आदमी मिले पै ओनै काऊ से राम-राम नई करी। राम-राम करे सें आदमिन कौ ध्यान ओई पै हो सकत तो। रामसेवक हवा की नाई सर्रात चलो जा रओ तो। ओखे नथरन में गाँजे के धुआं की गन्ध घुस रई ती। सामूँ चच्चा बैठो तो, बगल में हलकुट्टा....कछू नौसिखिया-कछू पुराने घाघ। ये येई पियत-पियत जिन्दगी गुजार रए। ज्वानी गाँजे में मिलाखें नैनू की नाई पी गए। नैनू जैसी ज्वानी राख कर डारी। बइरें कहत कि बरगैन नै ई गाँजे के मारें तन्यापौ बुढ़ापौ कछू नईं जानो। कभै ज्वान भए कभै बूढ़े हो गए। बिटिया कौ जलम लेते तौ काऊ कौ घर भर तो। ई कूचड़न सें तौ कइयक घर बरबाद हो गए।
रामसेवक जैसई सुक्का के छियाड़ा दोरे पहुँचो ओनै एक ठिहीं भारी। गंजेड़ियन कौ मुख्य संकेत या ठिहीं आय। सुक्का नै दौर खें टटवा खोल दओ। सामू मड़इया में चार-पाँच आदमी बैठे ते। चच्चा नै गाँजे की पुरिया अपनी जेब से निकारी और पुरिया खोल खें गाँजे की पत्ती हांत में धरी। ऊ पत्ती में थोरौ सौ पानी डार खें उक्ठा सें गद्दी में गाँजे खें रगड़ो। रामसेवक नै बिण्डल से बीड़ी निकार लई और सिलउवा की आगी सें बीड़ी भूँजन लगो।
- ‘काए रे रामसेवक! कैसे निकर आओ? बिन्नू की अम्मा नै आ जान दओ?’ उस्मान चच्चा गाँजौ रगड़त भओ बोलो।
- ‘बढ़ियल!’ रामसेवक हंसो -’तुम सोऊ चच्चा, लगा मढ़ी में आग, महाजन दूरं खड़े। बहाने बना खें आओ.... ओखें पता चल गओ ता आफतई आय धरी।’
-‘इत्तौ न डिरए करे रामसेवक। लुगाई सें डिरात वाले की आदमियन में गिनती नई होत।
-‘लगत आय चच्चा तुम्हें, डिरानै परत, या गिरस्ती ऐसी बनाई है कि आदमी चाह खें नईं निकर पाउत।’ रामसेवक के मूँ पै बिंग की लकीर खिंचत चली गई - ’तुम तौ चच्चा छुले छुलाये बैठे हौ सो तुम्हें हरीरौ-हरीरौ सुहात।’
-’काए के लानै रे! बहू सैकें -मैकें आय चिल्लात। गाँजो पीखें आदमी पूरो मरद बन जात। घंटा दो घंटा सें कम समें नईं लगत।’ सुक्का नै बीच में कूद खें अपनी एक आँख दबाई।
-’तैं सोऊ दादी, कौन्हऊ और के सामूँ न कह दइए।’ रामसेवक नै मुस्कान ढीली -’तुम अपनी संख्या ऐसई आय बढ़ाउत रहत हौ। शुरु-शुरु में मोरहऊ खें ऐसौ लगत तो पै अब पता चलो सब सैकें-मैकें आय। हम तौ येई बात पै आय सीख गए।’ सुक्का की बात कटतई ऊ तिलमिलानो। ओनै जोश में कही-’ता मैं झूठी कहत का?’
-’बिलकुल झूठी कहत दादी।’ रामसेवक ऊ अपनी बात पै अड़ गओ-’ये सब मन के खेल आँय। दिमाग में ओई बात भरी होबै ता पांच दस मिनट सें जादा नई लगत।’
सुक्का अपनी बात पै अड़ गओ। ओनै रामसेवक कौ छिरौटिप्पौ नई लगन दओ। सुक्का कैसऊ मानबे खें तइयार ई नई भओ।
-’दादी बात माने करे।’ हलकुट्टा बीच में टपको-’रामसेवक की बात सोरऊ आना साँसी (सच) है।’
-’हओ भइया, तुमसें को मुड़चढ़याव करै।’ सुक्का सिर्रयाने कुत्ता सौ खिरझयानो
-’मैं मानत हौ तुम्हाई सब जनन की बात।’
-’नईं हम या बात जबरजत्ती नुहै कभवाउत तोसें दादी, हकीकत आय।’ हलकुट्टा नै ओखे शक खें कुचरो।
-’मैं मान तौ गओ। अब मोय पछाऊँ काए परै हौं।’ सुक्का नै अपनी हार कबूली।
-’चच्चा गाँजे खें अच्छी तरां रगड़त जा..... तैं ये बातें का सुनत? अब नई जई के आँगू अपनी चल पाहै का?’ सुक्का नै अपनी गुस्सा चच्चा पै उतारी।
उस्मान चच्चा अब दूनी ताकत से गाँजो रगड़न लगो। गाँजे की पत्ती गद्दी में सिमट खें गोली बन गई। हरीरी गोली। चच्चा नई चाहत तो कि सुक्का ओखी कौन्हऊ गल्ती पकरै और उल्टी सूधी बातें करें। सुक्का हमेशा कहात कि गाँजे की पत्ती रगड़वो और लुगाई बरोबर होत। गाँजे खें जितनई रगड़त उतनईं मजा आउत। उस्मान चच्चा तौ जलम के रड़ुआ (क्वारे) हते सो उन्नै गाँजौ रगड़बो सीख पाओ। चच्चा तौ येई में सब कछू समझ लेत। रामसेवक नै भुंजी बिड़ी की पुछई टोर खें एक कोद फैकी और शेष चच्चा खें पकरा दई। अब चच्चा ने गाँजे की गोली के संगै भुंजी बिड़ी रगड़ी। गाँजे की गोली मिट गई। वा भुरका सी होकें चच्चा की सबरी गद्दी पै नाचन लगी। छूट गए ते ओखे बंधना, जैसे अलग-थलग की ओखी अब नियति हो गई होबै। सुक्का नै डिजान कढ़ी चिलम खें उल्टी करखें दूसरे हाँत की गद्दी पै जोर सें ठौंकी। चिलम के भीतर कौ ककरा गद्दी में धर रओ। सुक्का नै ककरा खें मसीड़ खें एक कोद धरो......... चिलम में एक जोर की फूँक मारी। चिलम में चिपकी राख बाहर उड़ गई। झार पोंछ खें ओनै चिलम में फिर ककरा डार दओ और चिलम चच्चा खें पकरा दई। चच्चा ने चिलम में गाँजे कौ भुरका भरो, कछू भुरका गद्दी में रहो सो ओनै चिलम में भरे भुरका खें उक्ठा सें दबाओ। ठौर खाली हो गओ। अब बचो भुरका चिलम में पूरौ समा गओ। चिलम के मूँ पै धरत वाली लत्तियां रामसेवक नै चच्चा खें पकराई चच्चा नै लत्तिया चिलम के मूँ पै धरखे चिलम सुक्का कोद बढ़ाई। सुक्का बोलो -’चच्चा तुम्हई शुरू करौ।’ रामसेवक नै चिलम के चैड़े मूँ पै हल्की-हल्की लकड़ियन की राख धरी और दियासलाई सें आगी छुबाई। चच्चा नै चिलम अपने ओंठन पै धर खें कस लगाओ। सींक बुझ गई। सुक्का गुस्सयानो-’भग फुकना तोसें कछू नई होनै।’ चच्चा नै चिलम ओंठन से निकाल लई-’आगी छुबाऊ तब तौ मैं कस लगाऊँ। ई देर आगी छुबतई चिलम से एक लफ निकरी। चच्चा नै चिलम हलकुट्टा कोद बढा दई। हलकुट्टा नै चिलम पकर खें उंगरिया से अधजलो भुरका दबाओ।
- ‘ए रे बेशाहूर। पन्हइया तौ उतार लै।’ सुक्का नै हलकुट्टा खें डपटो। हलकुट्टा नै चिलम खें मूँड़ से लगाखें अपनी गल्ती मानी। पन्हइया उतार खें एक लम्बौ सूँटा मारो। चिलम जैसें चिग्घार उठी होवै। पहलूँ तरइयां सी छिटकी फिर एक लफ के संगै आगी कौ गोला दिखान लगो। कर्रौ सूंटा लगाखें चिलम आँगू बढ़ाई। हलकुटा धुआं पेट में लील गओ।
-‘गाँजौ साजौ है।’ ऊ रुँधे गरे सें बोलो। पेट कौ गाढ़ौ धुंआ मूँ और नाक सें चिमनी की नाई निकर परो।
चिलम गेर खें चच्चा के पास आ गई। चिलम चुक आई ती। चच्चा नै ऐलान करो-’पूरी हो गई।’
-’दूसरीयऊ धर लेव, कौन मोल बिकात है।’ येई जमात के एक खुर्राट गजेड़ी ने मस्का लगाओ।
-’अब का कहाँय खे, दुकानदार तोरौ बाप लगत है जुन सैत-मैंत में दै दै है। ओनै तोला पै दो रुपइया बढ़ा दए।’ नशा कऊ कौ नई भओ तो। जैसें थोरौ खाना खाए सें भूक और बढ जात ऊसई उनकी टकटकी बढ गई। सुक्का नै अपनी खलेती थतोली। खलेती में गाँजे की पत्ती छुट्टा डरी ती सो निकार खें चच्चा के हांत पै धर दई। चच्चा ने रगड़बे सें साफ नहियां कर दई। ‘अब चहाँ जेखऊ रगड़ौ, मोई तो गद्दी कल्लान लगी। रगड़ो ऊपर सें सुक्का की बूचियाई बातें सुनौ।’ चच्चा खे नशा कौ हल्कौ-हल्कौ शरूर हतो। सुक्का मुस्क्या परो। रामसेवक नै पत्ती अपने हाँत में लै लई। हलकुट्टा खें धुकर-पुकर मची। अगर ई देर और बैठ गए ता दिन डूब जैहे और ढोर बछेरू भूके बंधे रैहै। आज ओऊ चारौ काटन नई गई। हलकुट्टा से रहो न गओ, ऊ उठ बैठो -’चच्चा करबी काटन जानै है, ढोर कसाई के खूंटन बंधे है। मोखे अग्या दै देव।’ सबकी नशा सें लाल आंखी हलकुट्टा पै जम गई। हलकुट्टा सकपकानो। सबकौ का रुख है ऊ समझन लगो। ’समाज छोड़ खें नई जाओ जात हलकुट्टा, समझ लैत।’ सुक्का गाँजे कोद हांत करखें बोलो-’यौ कैखें लानै आय?’
-’अरे तुम सब जने तौ हौं।’ हलकुट्टा नै अपनौ पांव निनोरो-’हम तुम तो बोलत हैं, मांग खें खा लेत... पशु बिचारे बिना मूँ के आँय, वे केसैं माँग है?’
हलकुट्टा निपक आओ। ओनै खेत की सूध लगाई और घुड़चाल चलत भओ खेत पै पहँुच गओ।
-’यौ तौ ढीलौ है।’ सुक्का कौ इशारो पीठ पाछँू हलकुट्टा कोद हतो। -’ऐखी लुगाई तौ बाँयफेल है। स्वसुर पै लुगाई नई संभरत।’ हलकुट्टा ने सुक्का की बात काट दई ती सो वा भड़ास अब सुक्का नै निकारी। गुस्सा में साँसियाऊ बात कभ जात। अपनौ पानी पनवारौ ऐसई थोरी आदमी लिबवा लैहै। अबकी पूरी चरचा में हलकुट्टा छाओ रहो। या चरचा चिलम के संगै सिमटी रही। हरई हंरा चरचा चिलम के धुआं में और गाढ़ी हो गई। दूसरी देर की चिलम खतम होय सें सब बाड़े से निकर आए और अपने छूटे काम, धंदन में लग गए।
रामसेवक नै करबी कौ बडौ सौ गट्ठा दोरे में पटक दओ। बिन्नू की अम्मा नै गट्ठा कौ दूसरो छोर पकरबा खें बखरी में मशीन के इतै धरवा दओ। बिन्नू नै अपनौ हंसिया मांगो। रामसेवक नै गट्ठा में खुसे हंसिया खुरपी सब निकार दए। चिलम पिएं के बाद रामसेवक तुरतईं हँसिया खुरपी उठाखें वहीं कौ वहीं खेतन कोद चलो गओ तो। एक गट्ठा करबी काटखें घरै डार दई। ओनै अपनौ दिन भरे कौ काम कर दओ।
बिन्नू की अम्मा की जिद और चैकसी के आंगू रामसेवक लड़खड़ा गओ। ओऊ नै सोचो कि नशा करबो कौन साजी बात है। नशा तौ जीवन कौ भओ चाहिए। सुन्दर और हिस्ट-पुस्ट शरीर खें जानबूझखें बिगाड़वो कौन अच्छी बात आय। शरीर की कीमत तौ असाद रोगी जानत जुन पल-पल जियत, छिन-छिन जिनगी कौ मजा लैबो चाहत। जेखें यौ जान खें जादा पीरा होत कि ऊ कछूअई दिनन कौ पाहुनो है। ऊ छिन-छिन जीबो चाहत पै ओई छिन ओखी घांटी की फांस बन जात। शरीर कौ मोल कोऊ बता सकत? सपने...... आँगू चलखें यौ करिहौ, ऊ करिहौं, येई ललक में पूरी जिनगी निकार देत। मरे आदमी खें दिखखें जरूर थोरौ बहुत झटका लगत कि एक दिना सबखें....। जादातर ये झटका बहुत थोरे समै के होत। रामसेवक नै अपनौ पक्को मन बना लओ तो कि गाँजो पीबो बिलकुल छोड़ दैहो। येई संकलप करखें ओनै एक पन्दरिया निकार दई। इतने समै के बीच में ओखें गाँजे की बिलकुल सुरत नई लगी। रामसेवक सें अब ओखी लुगाई खुश रहन लगी। आदमी अगर पक्कौ मन बना लेबैं ता कछू कर सकत, ओखे लानै कोऊ चीज असंभव नहियाँ।
रामसेवक के दमभाई अचम्भौ करन लगे कि यौ तौ अब छैरियऊ नई दावत। दमभाई रामसेवक पै गिधवा कैसी आँखीं गड़ायें ते। बिन्नू की अम्मा दिन भर हार खेत में संगै रहन लगी। शाम-सुबेरे चैकसी, सौ बिचारौ सुतिया गांसन गैस गओ। हार खेत में कई देर ओखे कान में ठिही सुनानी पै ओने बिलकुल ध्यान नई दओ, ऊ गरयाल बैल की नाई कंधा डारें अपनौ काम करत रहो।
सबेरे सें पता नई काए रामसेवक कौ पेट कुसकरन लगो। दो देर ऊ हगयाओ तऊ दरद बरोबर बढ़त गओ। बिन्नू की अम्मा नै ओखै पेट और पांवन की नसें तेल लगाखें खूब सूंटी और पिड़रीन में दीवलियां लगाखें कस खें बाँध दई। बिन्नू और बिन्नू की अम्मा दोऊ खेत कोद चली गई। वा अकेली हती सो ओनै बिन्नू खें आज इस्कूल नईं जान दओ। घंटा भर में रामसेवक कौ पेट कछू धिमानो सो ऊ उठखें बाहर निकल आओ। कब लौ खटोली पै परी रहतो, परो-परो ऊब गओ तो, अब तरे खें मूँड डारैं चौंतरा पै बैठ गओ।
-’का हो गओ रामसेवक?’ रामसेवक नै अपनी मुड़ी आवाज कोद खे उठाई। हलकुट्टा हंसत भओ ओखे ढिंगै बैठ गओ।
-’पेट पिरात यार।’ रामसेवक अनमनौ बोलो।
-’एक दम ठौंक लै, सो सब ठीक हो जैहै।’ हलकुट्टा हँरई सें मुस्क्यानो।-’धुंआ पेट में जैहै सो सब गैस पास हो जैहै.... धड़ाम-धड़ाम पाद हित।’
-’नई यार, अब गांजौ तौ मैं छू नईं सकत। मोखें गांजे सें घिरना हो गई।’
-’पिऐं खें कहत का, दबाई के रूप में एक चिलम।’
-’मैं डाकधर से गोली ल्याहों।’
-’दम के आंगू डाकधर कहां लगत? कहूँ नई।’ हलकुट्टा नै रामसेवक के मूं कोद दिखो-’तोरे दुख के लानै आय कहत रे.... फिर कभऊँ कहाँव तौ मू पै थूक दइए।’
खुदयाँय-खुदयाँय तौ पतिव्रता छिनार हो जात, यौ तौ रामसेवक आय। रामसेवक की तपस्या ऊसई डगमगानी जैसें विश्वामित्र की डगमगा गई ती। यहां न तौ मेनका हती, न उरबशी। इन्द्र, मेनका उरबशी सब कछू हलकुट्टा हतो। इन्द्र खें तौ राज जाबे कौ खटका हतो, हलकुट्टा खें काये कौ खटका? कोऊ नुकसान नई हतो ओखै, फिरऊं ग्वांच की नाई चिपक खें रह गओ हलकुट्टा। पन्दरा दिना से गाँजौ नई पिओ तो ओनै.... रोज पियत वाले के हिसाब से विलाद दिनन को अन्तर हो गओ। दबाई के रूप में गाँजों पीबे में रामसेवक खें कोऊ बुराई नई दिखानी, दूसरी बात मैदान ऊ साफ हतो। ओनै सोची कि अब कौन रोज आय पीनै, पेट ठीक हो जैहे सो बन्द कर दैहों।
उस्मान चच्चा के घर में दम भाई, इकट्ठे हते। दो चिलम दम लग चुकी ती, तीसरी की तइयारी शुरू हो गई। रामसेवक दो चिलम गाँजौ पीखें जंगया सौ गओ। पन्दरा दिना बाद दम लगाई ती.... आज की चिलम कौ धुंआ ओखें बहुत साजौ लगो। सबरैनन की आँखी लाल हो गई। उस्मान चच्चा और सुक्का मनई मन मुस्क्याने -’जैने न चखी गाँजे की कली, ऊ लड़का सें लड़की भली। आई समझ में रामसेवक?’ उसारे में ठहाके गूंज गए। रामसेवक ऊ ने उनकौ संग दओ पै ऊ जादा देर उनके संगै न टिक पाओ। एक लरका कुची मांगन आ गओ। बिन्नू की अम्मा हार से लौट आई ती। रामसेवक खें दरौंधों सौ लगो। ओखौ नशा छूमन्तर हो गओ। ऊ वहां से लइयाँ-पइयाँ भागो। दम भाईयन नै बहुत रोको, बहादुर-बनाबे की खूब कोशिश करी, पै बहादुर के गोड़े उठ गए।
-’बड़ौ गाँड़ू है।’ सुक्का हिकारत सें बोलो।
-‘दूसरन खें कहन लगत कि ओखी बइयर ऐसी है, ऊसी है, अपनी खें नई कहत।’ चच्चा हंसो-’सारे खें बहू भीतर बैंड़ खें मार है।’
बिन्नू की अम्मा रामसेवक खें दोरे के चैतरा पै बैठी मिली। रामसेवक नै तारौ खोलो। वह ऐसो लगो जैसे बिन्नू की अम्मा कौ चैनल बदल गओ होय। राम सेवक भीतर जाखें खटोली पै लोट गओ। अजीब तरां कौ सन्नाटौ हतो। रामसेवक खें पूरौ विसवास हो गओ कि बिन्नू की अम्मा ओखी सब करतूत जान गई। इतने जल्दी ईकौ विसवास टूट गओ? टूटै काये न, जब ओनै टूटें कौ काम ई कर धरो। रामसेवक जो सोचत तो, ठीक ओखै उल्टौ हतो। बिन्नू की अम्मा हंरई हंरा- चलखें ओखे नीगर आई-’पेट अभऊँ पिरात का?’
-’आ हाँ, अब तौ ठीक है।’ रामसेवक नै जल्दी-जल्दी उत्तर बनाओ।
-’बायरी चीजें कम खए करौ, पेट बायरी चीजें खाए सें पिरात।’ बिन्नू की अम्मा नै पेट पै हाँत धरो।
कहत कि दुनिया रंग बिरंगी होत, येऊ कहत कि इतै लोग भांत भांत के है। चालबाज की चाले चालबाज पकर पाउत। सीरौ मानुष हर बात पै विसवास कर लेत, चहां बात झूठी होवै और चहां सांची। कोऊ येई में सटै लै जात। पै एक सी धार बालेन के संगै ऐसौ नई हो पाउत। वे खोद-खोद पानी पियत। लला जैहौ कहां। धरती तौ गोल मटोल है, चहां जित्ते भगौ पकरे जैहौं। सोचे से पहलूं भीतर की बात निकार लई जैहै। पै सीधे-सादे विचारे ठगे जात। कछू गैर जाने ठगे जात और कछू जानत भए अपने आप खें ठगवाउत रहत। बिन्नू की अम्मा बीच में ठाड़ी ती। खसम की बातन सें वा टिघल जात येई से निरनै करे में कठिन पर जात। बिन्नू की अम्मा शांत हो गई। आदमी खें रखाबै कि अपनौ काम दंद दिखै।
रामसेवक खें पता नईं काए खाँसी उठन लगी। औगुन करत वाली एकऊ चीजें नई खाई ओनै। अब रोज कौ रोज शरील टूटन लगो। अतरया चैथया खें बुखार ऊ आउन लगो। स्यात परहया हतो। रम्मी दादा सें ओनै परहया की दबाई हांत में बंधवा लई पे कोऊ आराम नई भओ। बुखार खांसी सें ओखौ बुरओ हाल हो गओ। एक दिना खाँसी में ओखें खून आ गओ, गाढ़ौ करिया फिर लाल सेमल जैसौ। ओनै अन्दाज लगाओ कि स्यात गरमी सें आय आ गओ। अब रामसेवक ठंडी चीजें खान लगो। दूसरे दिना की खून की उल्टी से ऊ हरदया गओ। फिरऊ ओनै घरै नई बताओ काए कि बिन्नू की अम्मा तौ घबड़ाई जैहै।
जब सें गाँव के डाकधर ने ओखें सरकारी अस्पताल में जांच कराबे की सलाह दई तब सें ओखी आँखी नईं लगी। डाकधर कह रओ तो कि खून आ गओ है टी0बी0यऊ हो सकत। ई रोग कौ नाव सुने सें रामसेवक अलां झलां हो गओ। किहै बतावै अपने मन की बात? कहूँ सांसऊँ तौ नई हो गई टी0बी0। अगर टी0बी0 हो गई ता लरका....।
रामसेवक ताँगा पै बैठ गओ। सरकारी अस्पताल गाँव सें दो कोस दूर कस्बा में है। रोड खराब है सो दौंची आये पै ऊ अपनौ शरील कर्रौ कर लेत। ‘टी0बी0 हो नईं सकत। हमाए पुरखन खें यौ रोग हतोऊ नईं, मोखें कैसें हो जै है? कई डिरवाउत कि कोऊ खें हो सकत। किरपला के परिवार में कोऊ खे नई हती टी0बी0 पै किरपला खें हो गई। एकई साल जियो।’ ओखे विचारन नै करौंटा लओ -’ऊ टी0बी0 से नुहै मरो तो, ओखें तो कौन्हऊ नै मूंठ बैठार दई ती। मूंठ कर्री हती सो कोऊ गुनियन ने ठीक नई कर पाओ।’ जैसई दौंची लगत ऊसई ओखे मन में विचार घुमड़ जात-’सुरेन्द्र कहत हतो कि किरपला टी0वी0 सें मरो, मूँठ-सूँठ सब झूठ होत। अनपढ़ आदमी ई रोगन खें देवी-देवता, भूत-परीत के मूड़े थोप देत। वैसे मोखें टी0बी0 हो नई सकत, काए कि मैं नेम सें बहुत रहत। पहलूँ राजा आदमीयन खें होत हती। नैम-टैम वाले कौ टी0बी0 का करत? मछरिया खात वाले से टी0बी0 दो हांत दूर रहत, मैं आठें रोज मछरिया खात। चोदी टी0बी0 भगी-भगी फिर है। गाँजौ पिए से टी0बी0 नई होत। डाकधर कहत तो कि येई से जादा होत। डाकधर खे का स्वाद? वे तौ सब रोग अटकर सें बताउत।’ रामसेवक तांगा कौ बैलेन्स बनाउत भओ आँगू खें सरको। -’गाँव के डाकधर नै टी0बी0 के जुन लच्छन बताए हैं वे सब तौ मोखें हैं। तौ का बात सही है?’ रामसेवक के करेजे में कूंड सौ खिंच गओ-’बिन्नू स्यानी होत जा रई, लरका अभै खुटियाँ देत। सब कच्चै कुड़वारौ धरो, कहां जैहै यौ कुड़वारौ। लरका डलवा के ढाँके लाक हैं। कए बिन्नू की अम्मा से-पाल पाहै? मौड़ी कौ ब्याव......’ ओखौ मूँ बिगर गओ, आंखिन से अँसुआ झरन लगे। मौड़ी बिना बाप की हो जैहै। मोय न रहे सें बिदा में मौड़ी दाऊ-दाऊ चिल्लैहै, पै दाऊ कहाँ मिल है ओखें। मौड़ी खें आदमी पालकी पै ऐसई पटक दैहै। कैखें गरे से लिपट खें रो है। बिन्नू की अम्मा जानै कैसौ करिहै ब्याव? मोय न रहे पै आदमी न जानै कैसो घर-वर बता दैहै। बिन्नू की अम्मा खें इत्ती समझ नहियाँ, वा कहाव मौड़ी खे खराब घर में पटक देवै। मौड़ी जलम भर बाप खें रोहै। बिन्नू लाड़ में पली, तनकई दुख होहै ता मौड़ी...।’ रामसेवक नै तौलिया से अँसुआ पोंछ लए। जब रामसेवक की तबियत ठीक रहत ती तब ऊ बजार से सौदा निगत-निगत ल्याउत रहो, कभऊँ तांगा पै नई बैठै। तांगा अपनी बंधी चाल से चल रओ तो। रामसेवक के दिगाम में एकई चीज घुमड़ रई ती। जाँच.... जाँच। जाँच में का निकर है? ईशुर से बिनती करत जा रओ तो कि सब ठीक निकरै। कभऊ ओखो चेहरा खिल जातो, कभऊँ मुरझया जातो। समुन्दर कैसी लहरें ओखें मूँ पै आ जा रई ती। ई लहरन के बीच में ओखे कानन में बैण्ड बाजे की धुन सुना रई ती। पूरे घर में चैल-पैल मची। कोऊ कछू मांग रओ, कोऊ कछू। रामसेवक कछू उठा रओ और कछू दै रओ। बाभन चिल्लानो, जैखें कन्यादान करनै होवै ऊ जल्दी मड़वा तरें आ जावै, भांवरन की स्यात निकरी जात। रामसेवक नई धोती पहरन लगो। बिन्नू लाल साड़ी में लिपटी बहुतई साजी लग रई। ओखे अंसुआ ढड़क परे। रामसेवक के अंसुआ दिखखें तांगा वाले की आँखी गीली हो गई। तांगा वाले नै रामसेवक खें समझाओ -’चिन्ता न कर रामसेवक, सब ठीक हो जै है। अब तौ ऐसी-ऐसी दबाई चल गई कि आदमी मरो भर न होवै, डाकधर जिवा लेत। पै गाँजे में आगी छुबन दै, तैं ऐखें न कभऊँ छुइए।

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