बाल साहित्य दशा और दिशा


आलेख / जुलाई-अक्टूबर 08
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कृष्ण कुमार यादव


बच्चे राष्ट्र की आत्मा हैं क्योंकि इन्हीं पर अतीत को सहेज कर रखने की जिम्मेदारी है, इन्हीं में राष्ट्र का वर्तमान रुख करवटें ले रहा है और इन्हीं में भविष्य के अदृश्य बीज बोकर राष्ट्र को पल्लवित और पुष्पित किया जा सकता है। बच्चों के समग्र विकास में बाल साहित्य की सदैव से प्रमुख भूमिका रही है। बाल साहित्य बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। बाल साहित्य की विषयवस्तु बालक भी हो सकता है और वह विस्तृत परिवेश भी जिसके साथ बाल जीवन विकसित होता है। वस्तुतः एक तरफ बाल साहित्य जहाँ मनोरंजन के पल मुहैया कराता है वहीं बाल-मनोविज्ञान व बाल-मनोभाव के समावेश द्वारा सामाजिक सृजन के दायरे भी खोलता है। बाल साहित्य बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्यों, आचार-विचार और व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने में अपनी भूमिका निभाता आया है। सोहन लाल द्विवेदी जी ने अपनी कविता ‘‘बड़ों का संग’’ में बाल प्रवृत्ति पर लिखा है-‘‘खेलोगे तुम अगर फूल से तो सुगंध फैलाओगे। खेलोगे तुम अगर धूल से तो गन्दे हो जाओगे। कौवे से यदि साथ करोगे, तो बोलोगे कड़ुए बोल। कोयल से यदि साथ करोगे, तो दोगे तुम मिश्री घोल। जैसा भी रंग रंगना चाहो, घोलो वैसा ही ले रंग। अगर बड़े तुम बनना चाहो तो फिर रहो बड़ों के संग।’’
बाल साहित्य का इतिहास बहुत पुराना रहा है। प्राचीन काल में बच्चों के लिए अलग से साहित्य रचना की परम्परा नहीं रही वरन् तमाम ग्रन्थों में ही बालोपयोगी प्रसंग समाहित किये जाते रहे। वेद, पुराण, आरण्यक, रामायण, महाभारत, बौद्ध व जैन ग्रन्थों में कहानियों और जीवन प्रसंगों का भण्डार है। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का निरूपण करने वाले महाकवि सूरदास हिन्दी के प्रथम बाल काव्य साहित्यकार थे। उन्होंने जिस सरल व रोचक ढंग से बाल-लीलाओं का वर्णन किया, वह आज भी बाल काव्य लेखन को नई दिशा प्रदान करने में सक्षम है। इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियों को सर्वाधिक प्राचीन सुव्यवस्थित बाल कहानी साहित्य माना जाता है। पंचतंत्र की कहानियाँ व्यावहारिक जीवन में सफल होने के गुणों को कहानियों के माध्यम से रुचिकर ढंग से बताती हैं। आज की बाल रचनायें उसी घटनात्मकता की देन हैं, जो इन प्राचीन साहित्यिक ग्रन्थों में वर्णित हैं। इन ग्रन्थों में नैतिक शिक्षा पर आधारित रचनायें सामयिक बाल साहित्य की गौरव निधि हैं। इन कथा-कहानियों व कविताओं के माध्यम से बच्चों में दिव्य और दुर्लभ गुणों का विकास हुआ है। आधुनिक काल में हिन्दी में बाल साहित्य विधा की शुरूआत भारतेन्दु हरिश्चन्द द्वारा 1882 में प्रकाशित ’बाल दर्पण’ से मानी जाती रही है, पर इसका विधिवत आरम्भ 1915 में प्रकाशित ‘शिशु’ और 1917 में प्रकाशित ‘बाल सखा’ पत्रिका से हुआ।
बच्चों का साहित्य संसार बड़ा ही विस्तृत है। बाल साहित्य में कवितायं, कहानियाँ, नाटक, एकांकी, उपन्यास, जीवनी, ज्ञान विज्ञान सम्बन्धी लेख, यात्रा संस्मरण इत्यादि सभी शामिल हैं। बस फर्क यह है कि जहाँ बड़ों के साहित्य में बड़ों की भाषा तथा बड़ों की भावभूमि व परिवेश का समावेश होता है, वहीं बाल साहित्य की भाषा सरल, रोचक व मनोरंजक होती है। बाल साहित्य का सृजन करते समय बाल-साहित्यकार को बच्चों की जिन्दगी में प्रवेश करना होता है। बाल साहित्य बच्चों की उम्र के साथ व उनकी मानसिकता के अनुरूप होता है, वहीं यह कभी बोझिल नहीं होता है और बच्चे स्वतः अध्ययन के प्रति प्रेरित होते हैं। वस्तुतः बच्चों में स्वस्थ अध्ययन की आदत डालने का भी यह एक नायाब तरीका है। अध्ययन करना मात्र एक बौद्धिक अनुभव ही नहीं है अपितु इससे भावनात्मक अनुभवों की भी प्राप्ति होती है। अध्ययन करते समय प्रसन्नता, हास्य, रुचि, उत्साह और महत्वाकांक्षा का भी विकास होता है, जो बाल-मन के उन्नयन हेतु जरूरी है।
बाल साहित्य में सर्वाधिक प्रचलित विधा काव्य है क्योंकि कविता बच्चों को सहज रूप में प्रभावित कर उनके दिलो-दिमाग में उतर जाती है। विभिन्न आयु वर्गों की मानसिकता के हिसाब से बाल कवितायें लिखी जाती रही हैं। जहाँ पाँच वर्ष तक के बच्चों हेतु लिखी गयी कविताओं में तुकबन्दी व लयात्मकता पर जोर दिया जाता है, वहीं पाँच से बारह वर्ष तक के बच्चों हेतु लिखी गयी कविताओं में उनके परिवेश व वातावरण को भी सामान्य ज्ञान के नजरिये से उकेरा जाता है जबकि बारह से सोलह वर्ष के बच्चों हेतु लिखी कविताओं में उनकी आशाओं, आकांक्षाओं व उमंगों को प्रेरित किया जाता है। बाल साहित्य की एक अन्य प्रचलित विधा कहानी है। बाल कहानियों में जटिल से जटिल विषयों को रोचक व मनोरंजक घटनाक्रम के माध्यम से सहज भाषा में उकेरा जाता है। ऐसे में बाल-मन इन घटनाओं के माध्यम से तथ्यों को भलीभाँति समझ लेता है और उनका चंचल मन घटनाक्रम से बंधकर एकाग्रता की दिशा में अग्रसर होता है। बाल सुलभ मनोवृत्तियों के अनुरूप पशु-पक्षियों इत्यादि को पात्र बनाकर इन कहानियों के माध्यम से बच्चों को सत्य, अहिंसा, प्रेम, एकता, परोपकार, ईमानदार, दयालु, साहसी, पराक्रमी मधुर वचन, धैर्य, विश्व-बंधुत्व, पारस्परिक सद्भाव इत्यादि सामाजिक-नैतिक आदर्शों की तरफ और राष्ट्रभक्त बनने की ओर उन्मुख किया जाता है। ’पंचतंत्र की कहानियाँ’ इसका सबसे प्रबल उदाहरण है।
बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं, अतः जरूरत है उनकी जिज्ञासा को स्वस्थ रूप में हल किया जाये। जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी के लोदे को खूबसूरत आकार देता है, उसी प्रकार बाल साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपित करता है। आज बाल साहित्य पर यह आरोप लगाया जाता है कि बाल साहित्य नाम से जो कुछ छपा रहा है उसमें मौलिकता और सार्थकता का अभाव है। यही नहीं ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों को बाल साहित्य की समझ ही नहीं और वे जो कुछ छापते हैं लोग उसे ही बाल साहित्य समझ कर उसका अनुसरण करने लग जाते हैं, जिससे बाल साहित्य की स्तरीयता प्रभावित होती है। इन पत्रिकाओं में बाल साहित्य आधारित दूरदर्शी सोच का अभाव है। आलोचना के नाम पर भी बाल साहित्य में मात्र पुस्तकों की समीक्षायें लिखी जा रही हैं। यही कारण है कि बाल साहित्यकार को रचनाओं में मनोरंजकता का पुट देते हुए यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि उनमें किसी अंधविश्वास, कुसंस्कार, कुरीति व अभद्रता को प्रश्रय न मिले। यदि बच्चों पर किसी भी रूप में प्रतिबन्ध लगाया गया तो वे अधकचरे साहित्य और अधकचरे ज्ञान की तरफ आकर्षित होंगे, जो उनके विकास और अन्ततः स्वस्थ समाज के विकास में बाधक होगा। बच्चों को प्राप्त शिक्षा, संस्कार और सामाजिक मूल्य ही कल के राष्ट्र का निर्माण करेंगे। इस कार्य में बाल साहित्य की प्रभावी भूमिका है, क्योंकि इसके माध्यम से ही बच्चों में तमाम अभिरुचियाँ और आदर्श पल्लवित व पुष्पित होते हैं। बच्चों में यदि अच्छा साहित्य पढ़ने की आरम्भ से आदत डाली जाये तो वे तमाम कुप्रवृत्तियों से बच जायेंगे। यहाँ जरूरत है कि बाल साहित्य की आड़ में व्यावसायिक हितों को लेकर सतही मनोरंजन उपलब्ध कराने वाली पुस्तकों से सावधान रहा जाये। नैतिक शिक्षा के नाम पर ढपोरशंखी बातें पढ़ाने की बजाय सामाजिक व व्यावहारिक मूल्यों का ज्ञान कराया जाये। बच्चों के विकास में साहित्य और विज्ञान का बराबर महत्व है। विज्ञान जहाँ व्यक्ति को आत्म केन्द्रित और भौतिकवादी बनाता है वहीं साहित्य उसे सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों से संस्कारित करता है। ऐसे में अन्धविश्वास और पलायनवादी दृष्टिकोण पर आधारित साहित्य की बजाय उद्देश्यमूलक बाल साहित्य के सृजन की आवश्यकता है।
बाल साहित्य के क्षेत्र में यह सवाल तेजी से उठने लगता है कि आज बच्चों की ग्राह्य क्षमता, मानसिकता और परिवेश में जिस तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं, उनके अनुरूप बाल साहित्य नहीं रचा जा रहा है। इसका एक कारण बाल साहित्य विधा के प्रति सरकार की उदासीन सोच भी है। बाल साहित्य को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की जरूरत है और स्नातक-परास्नातक कक्षाओं में संकलित लेखकों-रचनाकारों के सम्पूर्ण कृतित्व की चर्चा में बाल साहित्य को भी जोड़ने की जरूरत है। हालात यह हैं कि प्रश्न-पत्रों में शायद ही कभी बाल साहित्य को लेकर प्रश्न पूछा गया हो। यही कारण है कि बड़े-बड़े आलोचक आज भी बाल साहित्य का नाम आते ही मुंह बिचका लेते हैं। दूसरी तरफ बाल साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने और उनमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा कायम करने हेतु बाल साहित्य के नाम पर कुछ बड़े पुरस्कार भी आरम्भ करने की जरूरत है। भूण्डलीकरण और उपभोक्तावाद के इस दौर में बच्चों के खिलौने बदल गये हैं। इण्टरनेट व मीडिया ने भी बच्चों के संसार को बदलने में अहम् भूमिका निभायी है। नतीजन मोबाइल, टेलीविजन और कम्प्यूटर जैसी आधुनिक तकनीकों पर वे कम उम्र में ही हाथ आजमाने लगे हैं। सर्वसुलभ सुविधाओं, नगरीकरण, विज्ञान के नये प्रयोगों व टेक्टनोलाजी के बढ़ते इस्तेमाल, शिक्षा और ज्ञान के बाजार में नये-नये फार्मूले इत्यादि के चलते बच्चे कम उम्र में ही अनुभव और अभिरुचियों के विस्तृत संसार से परिचित हो जाते हैं। नयी-नयी बातों को सीखने की ललक और नये एडवेन्चर उन्हें दिनों-दिन एडवांस बना रहे हैं। उनकी दृष्टि प्रश्नात्मक है तो हृदय उद्गारात्मक। ऐसे में जरूरत है कि बच्चों को राजा-रानी, परियों और भूतों की कपोल-कल्पित कहानियों से परे यथार्थवादी बाल साहित्य से परिचित कराया जाये और बाल साहित्य को गुणात्मक ह्नास से बचाया जाये। बच्चों में नयी जानकारियों के साथ नवीन सोच पैदा की जाये, नयी दिशाओं के साथ जीवन के तमाम आयामों से उन्हें रूबरू कराया जाये और बदलती दुनिया के साथ बदलते परिवेश में उन्हें नयी दशा और दिशा दी जाये। बाल-मानसिकता एवं ग्राह्यता के अनुरूप बच्चों को ज्ञान-विज्ञान की आधुनिकतम जीवनोपयोगी जानकारी दी जाये। अभिभावकों की मानसिकता व समस्यायें, संयुक्त परिवारों का विघटन, माता-पिता का कमाऊ होना जैसे तत्त्व भी बच्चों पर प्रभाव डाल रहे हैं। ऐसे में बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्यायें और उनकी मनोभावनायें भी बाल साहित्य में उभरनी चाहिए। इन सब के बीच ही बच्चे एक स्वस्थ व प्रसन्नचित समाज की आकांक्षा कर सकते हैं। कभी अज्ञेय ने बच्चों की दुनिया के बारे में कहा था कि -‘‘भले ही बच्चा दुनिया का सर्वाधिक सम्वेदनशील यंत्र नहीं है, वह चेतनशील प्राणी है और अपने परिवेश का समर्थ सर्जक भी। वह स्वयं स्वतंत्र चेता है, क्रियाशील है एवं अपनी अंतःप्रेरणा से कार्य करने वाला है, जो अधिक स्थायी होता है।’’ निश्चिततः बाल साहित्य को वक्त के साथ इन सभी चीजों को अपने दायरे में समेट कर उद्देश्यमूलक बनाना होगा। बाल साहित्य को बालकों में जीवन के उच्च मूल्यों व आदर्शों के प्रति निष्ठा जगाने, राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप संस्कार रोपित करने, जीवन के हर पल में उमंग भरने और बदलते परिवेश के साथ उनमें रचनात्मक कल्पनाशीलता व तद्नुसार सृजन के प्रति प्रेरित करने वाला होना चाहिए। अच्छे बाल साहित्य के लिए जरूरी है कि साहित्यकार न केवल अपने अन्दर के बच्चे को जीवन्त रखे वरन् बच्चों की दुनिया से पूरी तरह तादाम्य् भी बनाये रखे। इसके अभाव में बाल साहित्य मात्र कोरा अभ्यास ही कहा जायेगा।
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भारतीय डाक सेवा,
वरिष्ठ डाक अधीक्षक,
कानपुर नगर मण्डल, कानपुर-208001

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