नौनीं लगे बुन्देली -- पुस्तक समीक्षा

अक्टूबर 10-फरवरी 11 == बुन्देलखण्ड विशेष ---- वर्ष-5 ---- अंक-3

पुस्तक समीक्षा

नौंनी लगे बुन्देली (बुन्देली हायकु संग्रह)


कवि- राजीव रामदेव राना लिधौरी


प्रकाशन - प्र0 लेखक संघ, टीकमगढ़ म0प्र0


समीक्षक - एन0डी0 सोनी


प्रकाशन वर्ष - मार्च 2010


मूल्य 80 रु0 पेज 88



साहित्य में काव्य हमेशा से आकर्षण का केन्द्र रहा है। गद्य साहित्य जहाँ किसी बात का विस्तृत विवेचन करता है वहीं कविता संक्षेप में सारगर्भित बात को सौन्दर्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करती है। काव्य-साहित्य के विकास में हिन्दी में भी अनेक प्रकार के छन्दों का प्रयोग हुआ है। वर्तमान समय में आदमी के व्यस्त जीवन में जहाँ समय का अभाव है वहीं क्लिष्ट और गूढ़ छन्दों को सुनने समझने की शक्ति का ह्रास हुआ है। इस समय आम आदमी सरल और आम बोलचाल की भाषा में छोटे छन्दों की कविता को अधिक पसंद करता है। यही कारण है कि रुबाइयों और क्षणिकाओं को सुनना और पढ़ना लोगों को ज्यादा भाता है। पाठकों की इसी प्रवृत्ति को समझते हुए श्री राजीव नामदेव ने लघुतम छन्द हाइकु में कविता करने का प्रयोग शुरू किया। इस जापानी छन्द में उन्होंने बुन्देली भाषा में पहला हाइकु संग्रह नौनी लगे बुन्देलीप्रस्तुत किया है।



हाइकु संग्रह नौनी लगे बुन्देलीमें सौ हाइकु बुन्देली में लिखे गये हैं। जिसमें मानव जीवन के विभिन्न विषयों पर उन्होंने कलम चलाई है। संग्रह को पढ़ने से ऐसा नहीं लगता कि यह उनका पहला प्रयोग होगा। बुन्देली में ऐसा विशिष्ट संग्रह लिखकर उन्होंने जहाँ बुन्देली कवियों में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है वहीं लोगों को एक नई राह भी सुझाई है। मुझे लगता है कि संग्रह को पढ़कर अन्य कवि भी हाइकु लेखन में अग्रसर हो सकते हैं।



संग्रह की शुरूआत कवि ने वंदना खण्ड द्वारा ईश प्रार्थना से की है। शुद्ध बुन्देली ढंग से श्री गणेश जी को प्रणाम करता हुआ हाइकु है-



गनेश जू खौं/दण्डवत परनाम/हों पूरे काम।। यह बहुत सीधी और सरल अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार चिंतन खण्ड में आज के समाज के लिए सबसे आवश्यक बात को कवि कितने सहज ढंग से कह देता है अवलोकन करें-



पुरा परोस/हिलमिल रइयौ/गम्म खइयौ।।



मानव जीवन में मधुरतम रस शृंगार पर कवि ने अपनी कलम का जादू बिखेरा है। प्रकृति के शृंगार की छटा देखें-



बसंत आऔ/मउआ गदराऔ/आम बौराऔ।।



इसी बसंत से प्रभावित प्रेमी अपने हृदय का हाल प्रकट करता है-



कछु बचो न/बे अखियाँ मिलाकें/सब लैं गईं।।



श्री राजीव जी ने जहाँ बुन्देलखण्ड के फलों फसलों और खेलों का सजीव चित्रण कर उनकी विशेषताओं का को उजागर किया है वहीं देश प्रेम और राजनीति की पोलों पर कलम चलाना नहीं भूले। नेताओं के चरित्र की विशेषताओं पर हाइकु दृष्टव्य हैं-



कोरो पाखण्ड/नेतन कौ चरित्र/गिरदौला सौ।।



तथा



बखत परै/गदबद हैं देत/आज के नेता।।



हाइकु संग्रह में नामदेव जी ने एक अन्यखण्ड रखा है जिसमें जीवन के अनेक पहलुओं पर हाइकु लिखे हैं जिनकी झलकियाँ वास्तव में अपने आप में अनूठी हैं। गरीबी और अमीरी की दो विपरीत झलकियाँ देखें-



कैसे जी रये/चून तक नइयाँ/आँसू पी रय।।



एवं



जब मिलत/खाबे कौं परें-परें/काय खौं करें।।



प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे बहुत से हाइकु हैं जिन्हें पढ़कर मन पसन्द हो जाता है और खड़ी बोली से भी नौंनी बुन्देली लगने लगती है। संग्रह पढ़कर ही इसका आनन्द उठाया जा सकता है। कविता के इतने छोटे छंद में बुन्देली कहावतों का सफल प्रयोग करके कवि ने अपने काव्य कौशल का अच्छा परिचय दिया है। कुछ ऐसे हाइकु हैं जिनमें यदि बुन्देली के शब्दों को परिवर्तित कर दिया जाता है तो उसकी सुन्दरता में वांछनीय वृद्धि हो जाती है। आशा है भविष्य में लेखन में कवि के मन में उद्वेलित भावनाओं का प्रस्फुटन निश्चय ही अधिक प्रभावपूर्ण होगा जिसकी क्षमता नामदेव जी में है। जैसे-जैसे उनकी बुन्देली शब्द सम्पदा में वृद्धि होगी, उनके हाइकु लेखन में उत्तरोत्तर निखार आयेगा।



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महामंत्री,


श्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद, टीकमगढ़ (म0प्र0)

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