बुन्देली लोकगीतों में लयात्मक नाद-सौन्दर्य --- डॉ0 वीणा श्रीवास्तव



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली लोकगीतों में लयात्मक नाद-सौन्दर्य
डॉ0 वीणा श्रीवास्तव



नाद ब्रह्म है, ब्रह्म ही जीव है। जीवन में सभी कुछ लय के अन्तर्गत निहित है। बिना लय या गति से सब कुछ निर्जीव है।
विराट प्रकृति लय, ताल, छंद पर नर्तन करती गतिमान है। मनुष्य जीवन संगीतमय हैं। संगीत की इस चतुर्दिक परिव्याप्ति में वाद्य का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि वाद्य की अनुपस्थिति में गायन तथा नृत्य क्रियायें प्रायः पंगु हो जाती हैं। सच तो यह है कि संगीत के इन अवयवों में वाद्य का प्रादुर्भाव हुआ होगा।आदि मानव ने जब बादलों की गम्भीर गड़गड़ाहट, वर्षा की बूंदों की झमझमाहट, तेज हवाओं की सनसनाहट तथा समुद्री लहरों की छपछपाहट आदि सुनी होगी तब ध्वन्यानुकरण पर उसने अपनी तालियों को, लकड़ी अथवा पत्थर के टुकड़ों को बजाया होगा, उस ध्वनि में तन्मय होकर गुनगुनाया होगा तथा प्रसन्न होकर नाचने लगा होगा।
लोक संगीत में लोकवाद्यों की प्राचीनता तथा लोकप्रियता स्वयं सिद्ध है। डमरू देवाधिदेव भगवान शिव की पहचान है। विष्णु शंखधारी हैं। प्रजापति ब्रह्मा ढोल के निर्माता हैं। मुरली कृष्ण की पर्याय है। वाग्देवी वीणापाणि हैं। नारद वीणा, करताल वादक हैं। महाभारत के महासमर का प्रतिदिन आरम्भ तथा अन्त शंख-ध्वनि से किया जाता था फलतः वाद्यों की चिरन्तन धारा अनादिकाल से चली आ रही है और इसका आविष्कार तथा विकास लोक जीवन में ही हुआ है।
लोक जन जीवन सीधा सादा सरल, सहज भाव से एवं निश्चल रूप से गतिमान या प्रवाहित होता रहता है। लोकमन के जीवन से जुड़ी हुई प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति उसके कार्य-विचार यहाँ तक कि प्रकृति भी उसके मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करती रहती है और यह सब किसी न किसी रूप से उसे प्रभावित भी करती है, इसीलिए जब मानव निश्चिन्त होकर कुछ गाता-गुनगुनाता है तो उसके गीतों में स्वतः ही यह सब समाहित हो जाता है। वह कभी मिलन के गीत गाता है, तो कभी विरह के, कभी शृंगार के तो कभी आध्यात्म के, कभी सावन-वर्षा तो कभी बसंत के, कभी उत्सवों के तो कभी त्योहारों के, कभी-झरनों व नदियों की बात तो कभी विन्ध्य पहाड़ियों का शौर्य न जाने कितने ही प्रसंग उसके गीतों की बानगी हुआ करते हैं।
लयात्मकता इन सभी की विशेषता है और इस लय से नाद-सौन्दर्य को द्विगुणित करते हैं लोकवाद्य।
बुन्देलखण्ड अपने लोकगीतों, लोकवाद्यों तथा लोकनृत्यों के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ लोकवाद्यों का प्रयोग लोकगीतों, नृत्यों में संगत देने तथा स्वतंत्र रूप से वादन के लिए किया जाता है। लोकनायक स्वरों को सम बनाने, गीतों को तन्मयता से गाने, गायन के बीच साँस भरने (भाव) तथा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने के लिए लोकवाद्यों का उपयोग करते हैं।
लोकसंगीत सहज एवं प्रकृतितः होता है। इसमें स्वर और ताल प्रधान न होकर लय तथा धुन प्रधान होती है। यह शास्त्रीयता के बन्धन को स्वीकार नहीं करता। यही स्थिति लोकवाद्यों की भी है। लोकजन बाह्याडम्बरहीन बजाने की दृष्टि से उपेक्षित तथा सहज उपलब्ध वस्तुओं से ही बजाने का कार्य ले लेता है। यहाँ तुम्बी से बीन, गोल तुम्बे से इकतारा, बांस, नरकुल से बांसुरी, आम की गुठली से पपीहा, ताड़ या बरगद के पत्तों से पिपहरी आदि बना लिये जाते हैं। यहाँ तक कि थाली, लोटा, कटोरा, सूप, चालन, चिमटा, घड़ा, मटका, ताली एवं चुटकी आदि सभी वाद्य के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं। जहाँ चक्की की घरघराहट तथा चूड़ियों की खनखनाहट के समवेत स्वर में गाती बुन्देली बालाओं की धुनें अन्तर्मन को स्पर्श कर लेती हैं, वहीं ढेकी, ऊखल-मूसल की धमक तथा चूड़ियों की खनक के बीच गाए जाने वाले गीत किसी अन्य वाद्य यंत्र की अपेक्षा नहीं रखते हैं। जलाशयों से पानी लाते जाते समय स्त्रियों के पैर की पैंजनी तथा बिछुआ की रुनझुन की ध्वनि ही उनके गीतों में वाद्ययंत्र होते हैं।
पुत्र जन्मोत्सव की खुशी का इज़हार वे थाली बजाकर कर लेती हैं। ग्र्रामीणजन बैलों के गले में बँधी घंटी, घुँघरू तथा उनके खुरों की टपटपाहट की लय, ढेकली चलाने वाले पानी की सरसराहट तथा ढेकली की चरचराहट, तेल या रस पेरने वाले कोल्हू की मचमचाहट, नाविक के पतवार की छपछपाहट तथा धोबी के कपड़े धोने से उत्पन्न ध्वनि की लय पर मस्ती से गीत गाते देखे सुने जाते हैं। इसके अतिरिक्त बुन्देली लोकवाद्यों में मुख्य रूप से ढोलक, ढप, ढाक, ढपली, मृदंग, अलगोजा, रमतूला, तुरही, शहनाई, बाँसुरी, मंजीरा, झाँझ, करताल, लोटा, चिमटा, एकतारा, केंकडिया, तम्बूरा एवं सारंगी आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ तो स्वतंत्र वाद्य के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं और अधिकतर लोकगीतों, लोकगाथाओं एवं लोकनृत्यों के साथ संगत के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इन सभी के साथ प्रयुक्त संगत वाद्यों का नाद-सौन्दर्य लोकगीतों आदि में चार चाँद लगा देता है।
बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में गीतों के अनुरूप काल, स्थान एवं जाति के अनुसार भी वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। कुछ तो वाद्य ऐसे हैं जिनका प्रयोग स्थान विशेष तथा समय विशेष पर ही किया जाता है। उदाहरण के तौर पर ‘गोटें’ (लोकगीत का एक प्रकार) प्रत्येक समय, काल तथा स्थान पर नहीं गाई जातीं। यह भादौं महीने की चौथ को देव-चबूतरे पर ‘ढाक-वाद्य’ के साथ पूजा के समय ही गाई जाती हैं।
कहना न होगा कि बुन्देली लोक जीवन में हमें वाद्यों के मुख्य दो स्वरूप मिलते हैं-प्रथम मनुष्य की क्रियायें वाद्य का स्वरूप धारण कर लेती हैं जैसे ढेकली चलाने से उत्पन्न ध्वनि या चकिया की घरर-घरर की ध्वनि। इन क्रियागत ध्वनियों को हम क्रिया-वाद्य का नाम दे सकते हैं। दूसरे प्रकार के वाद्यों को हम वाद्यों के स्वरूप से ही सामने लाते हैं, उदाहरण के लिए ढोलक, ढाक, मंजीरा आदि।
प्रत्येक क्रिया-वाद्य का अपना एक स्वर होता है जिसको आधार स्वर मानकर बुन्देली जन अनायास गीत गाने लगते हैं। इन सरल एवं सहज ग्रामीणजन को तो स्वर और लय का ज्ञान ही नहीं होता परन्तु प्रकृति एवं पीढ़ियाँ इनके मानस, हृदय एवं संस्कारों में कब प्रवेश कर जाती हैं पता ही नहीं चलता। चक्की चलाते समय, बैलों की चाल पर उनके गले में बँधी घंटी की लय पर, धोबी के कपड़े धोने की आवाज की लय आदि पर बुन्देली जन लोकगीत गाते हैं। जब इसे ग्रामीणजन नियमित लय में बाँध लेते हैं तब इन लोकगीतों का लयात्मक नाद-सौन्दर्य देखते ही बनता है।
‘चक्की’ का लोकवाद्य के रूप में प्रयोग कितना सार्थक है, इसका उदाहरण एक जनश्रुति के रूप में मुझे मिला है-
बुन्देलखण्ड के पन्ना राज्य के राजा अमान सिंह एक बार भेष बदलकर अपने राज्य में प्रजा के हाल-चाल लेने के उद्देश्य से घूमने निकले। एक महिला अपने घर में चक्की चला रही थी साथ ही गा भी रही थी-‘‘ढुंढवा दियो राजा अमान हमाई खेलत बेंदी गिर गई।’’
राजा ने सुना, उन्हें वह गीत बहुत पसन्द आया। राजा ने उस मकान के बाहर एक चिन्ह बनाया और वापस चले आए। सबेरे उन्होंने अपने सिपाही भेजे और कहा कि जिस मकान पर ऐसा चिन्ह बना हो, उस घर की महिला को ले आओ। सिपाही तुरन्त गए और यह मानकर कि इस महिला ने जरूर कोई अपराध किया है, उसे जबरन पकड़ कर ले आए। महिला आते ही गिड़गिड़ाने लगी, बोली ‘‘मराज, हमसैं का गलती भई जो हमैं पकरवा लओ।’’ राजा बोले, ‘‘बाई हमनैं तुमै पकरवाओ? अरे हमनै तो तुमै बुलाओ तो। खैर! इन सिपाइयन सें तो हम बाद खां निपटैं। और बाई गलती तो तुमसैं भई हय। पैलें जा बताइए तैं रातैं का गा रई ती?’’ ‘‘मराज, हम तो फाग गा रए ते।’’ ‘‘अरे फागैं तो हमने बौत सुनी, फागैं तो ऐसी नई गाई जात। जे कितै की है?’’ ‘‘मराज, जा डिड़खरयाऊ फाग आय। एक दायं आपकै इतैं सैं चैतुआ चैत काटबे हमाए उतै ‘उबौरा’ गाँव गए ते। हमाओ आदमी हतो नईं सो हमनै जाय राख लओ और बई के संगैं हम इतै आ गए। जा फाग हमाए उतई ‘बीजौरबाघाट’ के ओरईं की हय, उतई जाको जनम भओ।’’ महाराज बोले ‘‘तो जा बता, तैं हमाओ नाँव लै के काय गा रई ती।’’ ‘‘आंहां मराज! हम आप खों नाँव लै के काय खां गा रए ते।’’ ‘‘काय हमईं तो राजा अमान सिंह हैं।’’ ‘‘मराज, हमैं का पता, हम तो अपएं आदमी खों नाँव लय रए ते। हमाए आदमी को नाँव ‘अमना’ है हमने बाय थोड़ो नैक सुदार लओ और अपएं आदमी से सैंया, बलमा, राजा कत हईं हैं, सो बोई हम गा रए ते।’’
राजा मन ही मन उसके गाने से प्रसन्न तो थे ही और यह बात वह महिला भी समझ रही थी। राजा बोले, ‘‘तोय सजा तो मिलहै।’’ वह बोली, ‘‘ठीकई है मराज, तो जौन सजा दैनी होय हमें मंजूर हय।’’ राजा बोले, ‘‘जौन फाग तैं रातें गा रई ती, बई फिर सैं सुनाउनै परहै। महिला बोली, ‘‘ठीक है मराज तो हमाईयु एक सर्त है-चकिया मंगाउनी परहै, तबही हम गा सगत।’’ राजा बोले, ‘‘काय, का बिना चकिया के तैं नईं गा सकत?’’ ‘‘आंहां मराज, चकिया तो मँगाउनैइ परहै।’’ राजा ने तुरन्त चक्की व अनाज मँगवाया। एक पिछोरा की आड़ की गई। फिर उसने चक्की के स्वर और लय पर वही फाग राजा को सुनाई। राजा बहुत प्रसन्न हुए बोले, ‘‘बाई हम तुमाए गाबैं से बहुतईं खुस हैं। तुम हमाई प्रजा हो, बताओ तुमाई बैंदी काए की हती, हम बाय ढुँढबाबैं की कोसिस करहैं।’’ महिला सहज हो बोली, ‘‘मराज हमाईं बैंदी तो लाख की हती।’’ राजा बोले, ‘‘ठीक है बाई तुम पन्द्रह दिन बाद आइयो हम तुमाईं बैंदी ढुँढवा दैंहैं।’’
पन्द्रह दिनों बाद राजा ने महिला को स्वयं बुलवाया और कहा, ‘‘बाई! हमनै तुमाई बैंदी ढुँढबाबै की बहुतई कोसिस करी। तुमाईं बा लाख की बैंदी तो मिली नहीं, हमने ‘सवा लाख’ की बनवा दई।’’ और राजा ने सवा तोले सोने की बैंदी जिसमें बीच में ‘हीरा’ जड़ा था तथा हीरे के चारों ओर ‘पन्ना’ की रवार लगी थी, उस महिला को भेंट की।

रीडर एवं विभागाध्यक्ष, संगीत,
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई

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