बुन्देली बाल लोक साहित्य में मामुलिया --- डॉ0 हरीमोहन पुरवार



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली बाल लोक साहित्य में मामुलिया
डॉ0 हरीमोहन पुरवार



ज्येष्ठ की तपती दोपहर और उसके बाद असाढ की उमसभरी सड़ी गर्मी, परिवार, समाज के वातावरण को कुछ ऐसा गरमा देती है कि सब कुछ उजड़ा सा हो जाता है और फिर श्रावण में वर्षा की फुहार से सभी का मन-मयूर नृत्य करने लगता है। वर्षा आई और बुन्देलखण्ड की पथरीली भूमि में हँसी-खुशी की एक ऐसी सरिता प्रवाहित होती है जिसकी निर्मल शान्त धारा में परिवार एवं समाज रसमय मधुर एवं प्रेम से सराबोर हो, निर्मल, स्वच्छ वातावरण का सृजन करती है। इसी निर्मल स्वच्छ वातावरण के सृजन में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता बुन्देली ललनाओं का सुप्रिय खेल ‘मामुलिया’ प्रारम्भ हो जाता है।
‘मामुलिया’ के इस खेल में बालिकायें बेर अथवा बबूल की एक कँटीली टहनी लेती हैं और उसे किसी लीप-पोत कर स्वच्छ पवित्र किये हुए स्थान पर रखती है। इस कँटीली टहनी से ही ‘मामुलिया’ की स्थापना होती है और उस समय सभी बालिकायें समवेत् स्वर में गाती हैं-
‘‘छिटक मोरी मामुलिया
मामुलिया के दो दो फूल, छिटक मोरी मामुलिया।
कहाँ लगा दऊं मामुलिया, छिटक मोरी मामुलिया।
अंगना लगा दऊं मामुलिया, छिटक मोरी मामुलिया।’’
कँटीली टहनी की स्थापना के बाद उसका अलंकरण किया जाता है। उस टहनी पर जितने भी काँटे होते हैं उन सब पर तरह-तरह के फूल लगाये जाते हैं और देखते ही देखते उस कँटीली टहनी का कँटीलापन समाप्त हो जाता है और वहाँ मन मोहने वाले विभिन्न प्रकार के पुष्पों की अलौकिक छटा बिखर जाती है। मामुलिया के अंलकरण के समय सभी बालिकायें फूल सजाते गाती हैं-
‘‘ल्याइयो ल्याइयो रतन जड़े फूल, सजइयो मोरी मामुलिया
ल्याइयो गेंदा हजारी के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो चम्पा चमेली के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो घिया तुरैया के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो सदा सुहागन के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।’’
जब मामुलिया सज जाती है फिर रोरी अक्षत चन्दन से उसका पूजन किया जाता है। सभी बालिकायें बारी-बारी से जल छिड़क कर, प्रसाद चढ़ाकर पूजन करती हैं और मिलकर गाती हैं-
‘‘चीकनी मामुलिया के चीकने पतौआ
बरा तरें लागली अथैया
कै बारी भौजी, बरा तरें लागी अथैया
मीठी कचरिया के मीठे जो बीजा
मीठे ससुर जू के बोल
कै बारी भौजी, मीठे ससुर जी के बोल
करई कचरिया के करए जो बीजा
करये सासू के बोल
कै बारी भौजी, करये सासू के बोल।’’
पूजन के पश्चात फिर मामुलिया की परिक्रमा करते हुए बालिकायें गाती हैं-
‘‘चली चकौटी चली मकौटी, चंदन चौका करियो लाल
ऊ चौका में बैठे बीरन भइया, पागड़िया लटकावैं लाल
उन पागड़ियन के फूल मुरत हैं, बीनत हैं भौजइयां लाल
झिलमिल झिलमिल दिया बरत है, परखत है भौजइयां लाल
एक रुपइया खोंटो कड़ गओ, मार भगाई भौजइयां लाल।’’
और परिक्रमा करते हुए मामुलिया को हाथ में उठाकर फिर नृत्य प्रारम्भ हो जाता है और लोकवाणी का प्रस्फुटन बालिकाओं की बोली में मुखरित हो उठता है-
‘‘मामुल दाई मामुल दाई
दूध भात ने खायें
बतुरी के धोखे
बिनौरा चबायें।’’
मामुलिया नृत्य के समय कई गीत गाये जाते हैं। एक बानगी इस प्रकार भी है -
‘‘नानों पीसों उड़ उड़ जाय
मोटो पीसों कोऊ न खाय
नई तिली कै तेल, तिलनियां लो लो लो
नये हंडा कौ भात, बननियां लो लो लो।’’
मामुलिया के खेल की समाप्ति के बाद उसे तालाब, पोखर अथवा नदी में विसर्जित करने के लिए सब लड़कियाँ जाती हैं और जल में प्रवाहित करते समय गाती हैं-
‘‘जरै ई छाबी तला कौ पानी रे
मोरी मामुलिया उजर गई।’’
इन पंक्तियों में भारतीय वेदान्त का सार तत्त्व निहित है। जीवन जल के समान है जिसमें नहाकर मामुलिया रूपी आत्मा और अधिक निखर उठती है। मामुलिया विसर्जन के पश्चात सभी लड़कियाँ अपने-अपने घरों को बापस लौटते हुए गाती जाती हैं-
‘‘चंदा के आसपास, गौओं की रास
चंदा के आसपास, मुतियन की रास
बिटिया खेले सब सब रात
चंदा राम राम लेव
सूरज राम राम लेव
हम घरैं चलें।’’
और ये लड़कियाँ आपस में विदाई के समय भी ठिठोली करते हुए गाती हैं-
‘‘चूँ चूँ चिरइयां, बन की बिलैया
ताते ताते माड़े, सीरे सीरे घैला
सो जाओ री चिरैंया
उठो उठो री चिरैंया
तुमाये दद्दा लड़ुआ ल्याये।’’
मामुलिया देखने में बड़ा सहज और साधारण सा खेल दिखता है परन्तु इस खेल का मनोविज्ञान अति सुन्दर है। इस खेल के माध्यम से लड़कियों को जो शिक्षा दी जाती है वह लड़कियों के जीवन को सुखी बनाने एवं समाज में आनन्द की सरिता बहाने का कार्य करती है।
परिवार में, समाज में नित, निरन्तर नयी नयी कठिनाईयाँ, मुश्किलें, परेशानियाँ, उलझने आदि आती रहती हैं। इन सबको काँटों की संज्ञा यदि दे दी जाये तो हम पाते हैं कि मामुलिया में प्रत्येक काँटे को पुष्प द्वारा सजाया जाता है अर्थात् स्त्री अपने व्यवहार, कर्म, आदि से परिवार व समाज की सभी कँटीली समस्याओं को पुष्परूपी समाधानों द्वारा सजाकर, सुखमय, आनन्दमय वातावरण की सृष्टि करती है।
इसी मामुलिया का एक अन्य विश्लेषण भी दर्शनीय है। जब कन्या का विवाह होता है तब उसे यह शिक्षा दी जाती है कि -
‘‘सम्राज्ञी श्चशुरे भव सम्राज्ञी श्रृश्वां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषुं।’’
वधू! तुम घर में सास, ससुर, ननद और देवर सबके हृदय की महारनी बनो। सबको अपने प्रेम, सेवा और सद्व्यवहार से जीत लो।
मामुलिया सजाना, मामुलिया सजाने का भाव मन में होना और सजावट का कृत्य करना, यही प्रेम, सेवा और सद्व्यवहार की शिक्षा प्रदान करता है। मनुस्मृति में यही व्यवस्था दी गई है-
‘‘अन्योन्यस्याव्यभीचारा भवेदामरणान्तिकः।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्री पुसंयो परः।।
अर्थात् स्त्री पुरुष मरणपर्यन्त धर्म, अर्थ आदि में परस्पर अभिन्न होकर रहे। यह स्त्री-पुरुष का श्रेष्ठ धर्म संक्षेप में जानना चाहिए और यही मामुलिया का स्वरूप है। मामुलिया का सत्त्व वास्तव में बड़ा ही प्रेरणास्पद है। इसके विषय में कहा जाता है-
‘‘बीन बीन फुलवा लगाई बड़ी रास
उड़ गये फुलवा रै गई बास।’’
मामुलिया मात्र एक खेल ही नहीं है वह तो सम्पूर्ण सामाजिक अनुष्ठान है। तभी तो कहा गया जाता है-
‘‘मौत में मुसकाबो सिखाबै
सिसकावै सैं छुटकारो गुआवै
जौ मामुलिया कौ अनुस्टान।’’
मामुलिया का भौतिक स्वरूप भी दर्शनीय है। आजकल शहरों के बड़े बड़े ड्राईगरूमों में ‘मामुलिया’ एक सजावट का साधन बनी दिखलाई पड़ती है परन्तु बुन्देली भावनाओं के अनुरूप मानव का प्रकृति के साथ तारतम्य के अनुपम कड़ी के रूप में मामुलिया की प्रतिष्ठा आज भी माननीय है। फूलों को कोटों के ऊपर सजाने की विश्वप्रसिद्ध जापानी कला ‘इकेबाना’ शायद इसी मामुलिया का परिमार्जित स्वरूप है।
इन्हीं सब बातों से मामुलिया का खेल सभी खेलों में सिरमौर हो जाता है। बुन्देली कवि माध्ाौशुक्ल मनोज सागर ने तो यहाँ तक कहा है-
‘‘मामुलिया तोरे आज हिमालय की चिट्टानें दिरकीं
देश की आजादी ने जिन पै खून की बूँदैं छिरकीं
देश की जनता चली बरसने, बदरा वन के मामुलिया
दुश्मन के सिर पै ओरे बन, टपक चली मोरी मामुलिया
मामुलिया तोरे आ गये लिबौआ, ढुड़क चली मोरी मामुलिया।’’
और मामुलिया केवल बालिकाओं के मनोरंजन का साधन ही नहीं बनती बल्कि वह तो समस्त मानव-समाज के लिए प्रेरणा का कारण बनती है।

निदेशक बुन्देलखण्ड संग्रहालय,
बलदाऊ चौक, उरई जालौन

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