बुन्देली साहित्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा - साक्षात्कार

प्रख्यात अनुवादक, समीक्षक एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार डा0 रामशंकर द्विवेदी से स्पंदन के प्रबन्ध सम्पादक डा0 लखनलाल पाल द्वारा बुन्देली साहित्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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साक्षात्कार


लखनलाल पाल-साहित्य की एक परम्परा होती है। बुन्देली साहित्य की भी एक परम्परा है। आने वाली पीढ़ी उस परम्परा को आगे बढ़ाती है। आज के इस दौर की पीढ़ी उस परम्परा को कितना आगे ले जा सकी है?
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रामशंकर द्विवेदी-आपके प्रश्न के दो तीन बिन्दु हैं, एक साहित्य की परम्परा, दूसरी बुन्देली साहित्य की परम्परा और तीसरा बिन्दु है बुन्देली साहित्य की परम्परा और नई पीढ़ी का योगदान। दरअसल यह प्रश्न काव्य भाषा से जुड़ा हुआ प्रश्न है। हिन्दी के मध्यकाल और बहुत कुछ आधुनिक काल तक काव्य भाषा के रूप में ब्रजभाषा का प्रभुत्व रहा है। बुन्देलखण्ड के कवि भी ब्रजभाषा में रचना करते रहे हैं। ब्रजभाषा के सम्बन्ध में एक उक्ति है-’ब्रजभाषा हेतु, ब्रजवास न अनुमानों’ अर्थात ब्रजभाषा की रचना करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि ब्रज क्षेत्र में निवास किया जाये। किसी समय ब्रजभाषा सिखाने के लिए गुजरात में भी एक पाठशाला थी, जिसका नाम था ‘खरतरगच्छ’ की ब्रजभाषा पाठशाला। इसलिए बुन्देली क्षेत्र की काव्य भाषा बहुत दिनों तक ब्रजभाषा ही बनी रही।
बुन्देल क्षेत्र की बोली काव्य परम्परा को खोजने के लिए सागर विश्वविद्यालय के बुन्देली पीठ के तत्वाधान में एक पुस्तक माला लिखी हुई है, उसमें बुन्देली की प्राचीन काव्य परम्परा और बुन्देली की आधुनिक काव्य परम्परा नाम से दो पुस्तकें छपीं। रीमासागर भोपाल तथा जबलपुर और जीवाजी विश्वविद्यालय से बुन्देलीभाषा और साहित्य पर कुछ शोध भी हुए हैं पर ब्रजभाषा की तरह परिनिष्ठित बुन्देली की कोई काव्य परम्परा नहीं मिलती है। जहाँ तक नई पीढ़ी और बुन्देली की बात है तो मंचों पर जरूर बुन्देली के कुछ कवि अपनी रचनायें सुनाया करते हैं लेकिन उनकी रचनाओं में कोई दम नहीं है क्योंकि कोई भी बोली जब काव्य भाषा का रूप धारण करती है तो उसे काव्य भाषा के रूप में ढालना पड़ता है। वैसा विराट प्रयास यहाँ किसी ने नहीं किया क्योंकि उसमें उन्हें कोई आदर मिलने की सम्भावना नहीं थी।
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लखनलाल-बुन्देली बोली (भाषा) और बुन्देलखण्ड पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। फिर भी ऐसा लगता है, जैसे हम वहाँ तक नहीं पहुँच सके हैं, जहाँ तक हमें पहुँचना चाहिए था। इस पर आप क्या कहेंगे?
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द्विवेदी जी-दरअसल बुन्देलखण्ड पर और बुन्देली पर ये दोनों अलग-अलग काम है। बुन्देलखण्ड के इतिहास, भूगोल यहाँ की आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, शिक्षा प्रणाली, राजे महाराजे संस्कृति, बुन्देली कला, पुरातत्व, भवन निर्माण कला, गढ़, किले, मूर्तिकला, पर्यटन स्थल, खजुराहो, देवगढ़ आदि पर हिन्दी और अंग्रेजी में बहुत काम हुआ है। उसका सूचीकरण भी किया गया है। कनिंघम ए0वी0 कीथ और मैक्समूलर तक ने इस क्षेत्र पर काम किया है लेकिन ऐसा कोई ग्रंथ आज तक नहीं निकला है जिसमें इस कार्य का मूल्यांकन किया गया हो। नई पीढ़ी में न तो उनके काम को जानने की जिज्ञासा है और न ही कोई प्रयास है। उनकी प्रवृत्ति तो इतिहास की शुरुआत अपने से करने की है। एक कहावत है ‘चुकरिया में गुड़ फोड़ना’ वे यही करते आ रहे हैं और अपनी पीठ आप ठोंकते जा रहे हैं।
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लखनलाल-बुन्देली का पत्र साहित्य समृद्ध रहा है। बुन्देली राजाओं ने पत्र बुन्देली में लिखे हैं। उस समय की बुन्देली और आज की बुन्देली में अंतर होगा ही। आपकी दृष्टि में यह अन्तर कितना है?
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द्विवेदी जी-जीवन में चिट्ठी-पत्री या अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने के लिए किसी लिखित माध्यम का सहारा लेना यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। बुन्देली में पत्र लिखने की यहाँ कोई समाज से जुड़ी परम्परा नहीं मिलती है। राजकाज चलाने के लिए विभिन्न रजवाड़ों में पत्र व्यवहार हुआ करता था, ऐसा पत्र व्यवहार अठारहवीं शताब्दी से मिलता है। महाराजकुमार डा0 रघुवीर सिंह ने इस संदर्भ में काफी काम किया है। बुन्देलखण्ड से सम्बन्धित उन्होंने दो ग्रन्थ छपवाये हैं। इन दस्तावेजों पर मराठी, उर्दू, फारसी और कहीं-कहीं बुन्देली का प्रभाव मिलता है। ये बुन्देली में लिखे हुए पत्र नहीं हैं। स्योंढ़ा के डा0 सीता किशोर खरे ने अपनी शोधमण्डली द्वारा दो क्षेत्रों की पत्र पाण्डुलिपियों पर काम किया है। ये भी राजे-रजवाड़ों में होने वाले पत्रों के नमूने हैं और इनका क्षेत्र ग्वालियर और दतिया है। इनमें भी बुन्देली के रूप मिलते हैं। ठेठ बुन्देली में ये भी नहीं है। कुछ पत्र झांसी की रानी के भी मिले हैं, जिन पर शिवपुरी के डा0 परशुराम शुक्ल ‘विरही’ ने काम किया था। वह पुस्तक भोपाल से छपी थी। अब वह नहीं मिलती है।
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लखनलाल-सुना गया है कि बुन्देली मे भी रासो काव्य लिखा गया है किन्तु इस सम्बन्ध में बहुत कम लोगों को जानकारी है। ऐसे दुर्लभ ग्रन्थों को प्रकाश में क्यों नहीं लाया गया?
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द्विवेदी जी-सारे ग्रन्थ छपे हुए हैं, झांसी के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी और बुन्देलखण्ड महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डा0 भगवानदास माहुर ने इन्हें छपवाया था। उनका शोधकार्य भी है ’हिन्दी काव्य पर 1857 का प्रभाव’ और उनका शोधग्रंथ पहले अजमेर से छपा था, अब दिल्ली से छप गया है। बात यह है कि नई पीढ़ी को इस संदर्भ में कोई जिज्ञासा नहीं है। वह तो पकी-पकाई खीर चाहती है, हाथ-पैर नहीं चलाना चाहती है और न ही परिश्रम करना चाहती है। इसी जिले के रेंढर के डा0 श्यामबिहारी श्रीवास्तव ने बुन्देली की रासो काव्य परम्परा पर शोध किया और उनका वह शोधग्रंथ प्रकाशित भी है और उपलब्ध भी होता है।
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लखनलाल-आप तो अनुवाद से जुड़े हैं। आपको इस विधा पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है। क्या किसी अन्य भाषाओं का बुन्देली भाषा में अनुवाद हुआ है?
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द्विवेदी जी-देखिये ऐसा है, बुन्देली में मेघदूत का अनुवाद कुण्डेश्वर के पं0 गुणसागर सत्यार्थी ने किया है और उनका यह अनुवाद बहुप्रशंसित है। वैसे बुन्देलखण्ड में तो ब्रजभाषा और खड़ी बोली में बहुत से संस्कृत ग्रन्थों के, अंग्रेजी ग्रन्थों के, फारसी और उर्दू ग्रन्थों के अनुवाद हुए हैं लेकिन बुन्देली में और अनुवाद हुए हों इसकी जानकारी नहीं है।
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लखनलाल-बुन्देली में गद्य की अपेक्षा काव्य अधिक लिखा गया है। वृन्दावन लाल वर्मा जैसे साहित्यकारों ने बुन्देली की अपेक्षा खड़ी बोली को अपनाया है। बुन्देली गद्य ग्रन्थों की कमी का मूल कारण क्या है?
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द्विवेदी जी-दरअसल गद्य भाषा के रूप में किसी बोली का विकास राज्याश्रय अथवा उस बोली से जीविका से जुड़े होने के बाद होता है। दरअसल आज तक गद्य की भाषा शिष्ट भाषा ही मानी जाती रही है क्योंकि उसमें आप जीवन की गम्भीर से गम्भीर बात व्यक्त कर सकते हों, फिर जो भाषा राजकाज चलाने का और शिक्षा का माध्यम हो, गद्य भाषा के रूप में उसी का विकास होता है। यह जरूर है कि मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी, मणिपुरी, गढवाली आदि कुछ भाषाओं के गद्य साहित्य की भी बड़ी पुष्ट परम्परा है। बुन्देली की ओर इस तरह का कोई प्रयास नहीं किया गया।
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लखनलाल-आप ही की बात को पुनः लेते हैं। भोजपुरी, राजस्थानी, मणिपुरी आदि लोक प्रचलित बोलियाँ है, जिन पर आज बहुत कुछ लिखा जा रहा है। उनकी अपनी पत्रिकायें भी हैं, लेकिन बुन्देली का साहित्यकार या तो असमय मर जाता है या पलायन कर जाता है। पत्रिकायें कितनी दोषी हैं?
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द्विवेदी जी-बुन्देलखण्ड में लोक साहित्य को समर्पित जो भी पत्रिकायें निकलती हैं उनकी मूल भाषा, मध्यम भाषा खड़ी बोली है। वे खड़ी बोली में बुन्देलखण्ड के लोक साहित्य, संगीत, कला और लोक जीवन के विविध अंगों पर लेख छापती है, वे बुन्देली भाषा में नहीं निकलती हैं। बुन्देली बोलने वालों की न कोई आवाज है, न ही कोई राजनैतिक संरक्षण है और न ही आज तक केन्द्र सरकार पर कोई दबाव पैदा कर सके हैं। संविधान में जो भाषायें सूचीबद्ध हैं उनमें बुन्देली नहीं है। केवल बुन्देली में लिखने वाला आज तक पुरस्कृत नहीं हुआ है और न बुन्देली के लिए अलग से पुरस्कार है। इसलिए बुन्देलखण्ड जिस पिछड़ेपन को भुगत रहा है उसे बुन्देली भाषा भी भुगत रही है। चूँकि बुन्देलखण्ड अंग्रेजों का क्रान्ति का मुख्य केन्द्र रहा था, इसलिए ब्रिटिश सरकार इसकी उपेक्षा करती रही और हमारी सरकार भी उसी परम्परा पर चल रही है। इसी कारण साहित्यकार और अन्य लोग भी निराश हो जाते हैं।
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लखनलाल-बुन्देली की चर्चा हो और ईसुरी का नाम न हो तो चर्चा अधूरी सी लगती है। बुन्देली और ईसुरी एक दूसरे के पूरक बन गये हैं। इस सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?
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द्विवेदी जी-टीकमगढ़ में वीरेन्द्र केशव परिषद बनी है। बीरसिंह द्वितीय विशाल भारत के सम्पादक, बनारसीदास चतुर्वेदी को अपने यहाँ लाये। बनारसी दास चतुर्वेदी ने वही से मधुकर पाक्षिक पत्र निकालना शुरू किया। अब प्रश्न उठा कि इसमें छापा क्या जाये? तब यह हुआ कि बुन्देलखण्ड के इतिहास संस्कृति, साहित्य, कला, भाषा, नदियाँ, लोकगीत, लोकसंगीत सब पर लिखवाया जाये, तब बुन्देली कवियों की खोज की गयी। इसमें मिले ईसुरी फिर वहीं से ईसुरी की फागों के तीन भाग निकले। जिनका सम्पादन कृष्णानन्द गुप्त ने किया। उस परिषद से अजमेरी जी भी जुड़े हुए थे। अजमेरी जी एक गुणी व्यक्ति थे, वे गाते बहुत अच्छा थे, नकल भी अच्छी उतारते थे साथ ही कई भाषाओं के ज्ञाता थे। अजमेरी जी जहाँ-जहाँ जाते थे ईसुरी की चौकड़याँ सुनाया करते थे। इस तरह ईसुरी का प्रचार-प्रसार हुआ। अब तो ईसुरी की फागों के कई संग्रह निकल गये हैं। ईसुरी से प्रेरित होकर कई लोगों ने उन जैसी फागें लिखीं और फाग परम्परा चल निकली। वैसे ईसुरी मामूली कवि थे। कुछ लोग उनकी तुलना कालिदास से करते है, लेकिन ऐसा नहीं है। ईसुरी जिस गाँव में रहते थे उस गाँव में क्रान्तिकारी भी आते थे। 1857 का विद्रोह भी चल रहा था किन्तु ईसुरी के काव्य में उसकी कोई झलक नहीं थी। हाँ ईसुरी की कुछ उक्तियाँ ऐसी है जो लोक जीवन के निकट हैं और आज भी प्रचलित हैं। उनमें बड़ी व्यंजना शक्ति है।
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लखनलाल-ईसुरी की चैकड़ियाँ होली में गहरा रंग बिखेरती हैं। होली जैसे त्योहार का हुल्लड़ तो ईसुरी की फागों में है। क्या ईसुरी का या उनके साहित्य का प्रभाव किसी अन्य साहित्य या साहित्यकार पर भी पड़ा है?
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द्विवेदी जी-ईसुरी की कविता का प्रभाव महाकवि बच्चन पर पड़ा है और इसका उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक दस द्वार से सप्त सोपान तक में किया है। उन्होंने उसी छन्द में खड़ी बोली में कुछ चौकड़ियाँ भी लिखी हैं। उसका कारण है कि उनका सम्बन्ध बुन्देलखण्ड से रहा है। वे बांदा, झांसी और ललितपुर में आते-जाते रहे हैं।
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लखनलाल-बुन्देलखण्ड के पात्र साहित्यकार को अमर बना देते हैं, वे चाहे वृन्दावन लाल वर्मा हो या सुभद्राकुमारी चौहान या मैत्रेयी पुष्पा। वृन्दावन लाल वर्मा और मैत्रेयी पुष्पा ने यहाँ के पात्रों को लेकर उपन्यास रचे हैं। उनके उपन्यासों में बुन्देली बोली का कितना योगदान रहा?
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द्विवेदी जी-कोई भी कथाकार अपनी कथा रचना के लिए उसी क्षेत्र को चुनता है, जहाँ वह रचा बसा हो। वृन्दावन लाल वर्मा यहाँ के रहने वाले थे इसीलिए उन्होंने बुन्देलखण्ड के इतिहास को लेकर ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। किसी भी क्षेत्र से लिया गया पात्र पहले से गढ़ा हुआ नहीं होता है, उसे लेखक की कल्पना गढ़ती है। रचनाकार उसके व्यक्तित्व को कितना रच सका है यह उसकी प्रतिभा, कल्पना और कला पर निर्भर करता है। वृन्दावन लाल वर्मा ने जीवन्त पात्रों की रचना की है, उनके पात्र अमर हैं। उन पात्रों को उभारने के लिए बुन्देलखण्ड की प्राकृतिक पृष्ठभूमि बड़ी कारगर रही है लेकिन उनके उपन्यासों की आधार भाषा खड़ी बोली है, बुन्देली नहीं है। कहीं-कहीं बुन्देली का बघार उन्होंने लगाया है। इससे यहाँ की माटी की सोंधी गन्ध उनके उपन्यासों में आ गयी है। जहाँ तक मैत्रेयी के बुन्देलखण्ड पर आधारित उपन्यासों की बात है, बुन्देलखण्ड पर आधारित उनके सिर्फ तीन उपन्यास हैं। ‘इदन्नयम’, ‘अल्मा कबूतरी’ और ‘कही ईसुरी फाग’। ‘बेतवा बहती रही’ उनका एक कहानी संग्रह भी है और उनकी आत्मकथा का अंश ’कस्तूरी कुण्डल बसै’ भी बुन्देलखण्ड में बिताये गये जीवन पर आधारित है लेकिन उनके उपन्यासों की भाषा खड़ी बोली है, बुन्देली नहीं है।
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लखनलाल-अन्त में आप बुन्देली भाषा के बारे में और बुन्देली के पाठकों से क्या कहना चाहेंगे?
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द्विवेदी जी-देखिये हम जिस क्षेत्र में रहते हैं, जिसके हवा, पानी से हमारा निर्माण हुआ है, उसके प्रति हमारे हृदय में प्रेम होना चाहिए। बुन्देलखण्ड में लोक साहित्य सम्बन्धी अभी भी पर्याप्त सामग्री बिखरी पड़ी है हमें उसका संकलन, सम्पादन तथा प्रकाशन करना चाहिए। यह तो हुई साहित्य और कला की बात। बुन्देलखण्ड में आम आदमी का, किसानों का, मजदूरों का, गुणी व्यक्तियों का इतना विविधमुखी जीवन है कि उस जीवन को भी शब्दबद्ध किया जाना चाहिए। यहाँ पर लोकगीतों के अलावा लोकमुख में बूढ़े पुराने लोगों के पास वाचिक परम्परा की ऐसी समृद्ध ज्ञान राशि है कि उसे भी एकत्र करना चाहिए। आधुनिकता, टी0वी0, इंटरनेट, भूमण्डलीकरण, विश्व व्यापार, छिछली राजनीति और बाजारवाद का जो भीषण प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ रहा है जो हमारे पारम्परिक जीवन को, पारम्परिक मनोरंजन के स्रोतों को, ऊर्जा के स्रोतों को, जल के स्रोतों को, हमारी संस्कृति को खाये जा रहा है, उससे हमें बचना चाहिए।

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