बचपन की मीठी यादें

संस्मरण / जुलाई-अक्टूबर 08
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निर्मल कौर संधू




वो भी कितने अच्छे दिन थे, जब हमारा बचपन था। उन दिनों बाबू जी जोधपुर जंकशन में गार्ड की पदवी पर थे। मैं कक्षा चार में थी। नई क्लासें शुरू होने वाली थी। मैं माँ से रोज नई क्लास की किताबे मंगवाने को कहती। कई बच्चे किताबें कापियाँ ले भी आए थे। आखिर नई क्लासों की पढ़ाई शुरू हो गई। हम छै भाई बहन थे, चार बहनें व दो भाई। सभी सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। जब मैं नई किताबें लेने की जिद करने लगी तो माँ ने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि ‘आज तेरे बाबू जी किताबें जरूर लेकर आएंगे, क्योंकि परसो वो बीकानेर ट्रेन लेकर गए हैं। वहाँ किताबों वाला दुकानदार तेरे बाबू जी का दोस्त है।’ माँ बाबू जी वाली टेªन आज कितने बजे आएगी’, मैंने माँ से पूछा।
माँ ने कहा ‘रात को ग्यारह बजे स्टेशन टेªन आकर रुकती है, तेरे बाबू जी को स्टेशन मास्टर के रूम में जाकर रजिस्टर पर साइन करके घर आते-आते साढ़े ग्यारह बजेंगे ही। तुम सो जाना और सुबह नई किताबें स्कूल ले जाना।’ मुझे बहुत खुशी हुई। मैं पढ़ने की बहुत शौकीन थी। सदा क्लास में फस्र्ट आती थी। सभी लोग यानी बहिनें भाई सो गये थे मगर मेरी आँखों में नींद नहीं थी। बार-बार करवटें बदलती आखिर माँ ने डाँटा ‘सोती क्यों नहीं, सुबह स्कूल नहीं जाना क्या? देर से सोकर जल्दी कैसे उठोगी।’ मैं चुपचाप आँखे मूँदकर सोने का प्रयास करने लगी मगर असफल रही। कुछ देर बाद मुझे माँ के हल्के हल्के खर्राटे सुनाई पड़ते और कुछ ही देर बाद माँ उठकर घड़ी देखने लग जाती। माँ की आँख फिर लग गई पर अभी दरवाजे पर थाप सुनाई दी। माँ उठी पर मैंने जल्दी से दरवाजे के बीचोबीच में लगा सांकल खोला व पूछा, ‘बाबूजी मेरी किताबें लाए?’ ‘हाँ सबकी लाया हूँ। जाओ सो जाओ सुबह लेना।’ आखिर मैं सो गई। सुबह जल्दी ही आँख फिर खुल गई। तब माँ सिगड़ी सुलगा रही थी। मैं धीरे से उठी और किताबें ढूँढने लगी। मेरी नजर एक बड़े से बंडल पर पड़ी। मैंने कैंची से किताबों पर बंधा सुतली का धागा काट डाला और जल्दी-जल्दी चैथी क्लास की किताबें अलग करने लगी। मुझे उन कोरे कागज पर लिखे सवाल, कविता, इतिहास, भूगोल, हिन्दी किताबों की महक बहुत भा रही थी जो आज भी महसूस करती हूँ। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी किताबें व कापियाँ समेटी और माँ ने बाबू जी की पुरानी पैंट में से मजबूत मजबूत कपड़ा निकाल कर हम बहनों के जो बस्ते घर में सिले थे, उस बस्ते में अपनी किताबें कापियाँ सजा कर डाल दीं।
इस बात को आज भी याद करके एक मीठी सिरहन पूरे तन पर दौड़ जाती है। इसी तरह अपने बचपन की एक बात को तो जब भी याद करती हूँ तो हँसे बिना नहीं रह पाती। मुझे याद है उन दिनों सन् 1955 में जब पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी का दिन होता तो हमें हर एक बच्चे को चार-चार लड्डू स्कूल से मिलते थे। एक बार हम सभी भाई बहन अपने अपने लड्डू घर ले आए। मैं मीठा खाने की बहुत शौकीन थी। सभी ने लड्डू लाकर माँ को दिये मगर मैंने घर में, गुसलखाने में घुसकर चारों बड़े-बड़े लड्डू खा लिये तब कमरे में आई। माँ ने पूछा ‘तेरे लड्डू कहाँ है बेटी? सभी दो-दो लड्डू खा रहे हैं।’ मैने फट से जबाव दिया ‘तभी तो मैंने चारों खा लिए हैं।’ लेकिन एक घंटे बाद मेरा पेट खराब हो गया था। अब तो सभी ने मेरा जो मजाक बनाया कि बस पूछो नहीं।
इसके कुछ दिन की ही बात थी मैंने स्कूल में जाने से पहले माँ से आँख चुरा कर आम के अचार की बर्नी से जल्दी जल्दी हाथ से ही एक खाली रोटी के डिब्बे में अचार भर लिया और जल्दी से बस्ते में छुपा लिया। जब मैं स्कूल पहुँची तो सभी बच्चे हँसने लगे। मैंने जल्दी से कंधे से बस्ता उतारा और देखा अचार का तेल नुचड़ नुचड़ कर मेरे बस्ते और पीछे से कमीज को तेल से भिगा चुका है। असल में वो अचार मैं अपने साथ पढ़ने वाली एक चपरासी की बेटी ‘नारंगी’ को देने के लिए लायी थी। हुआ यह था कि इस बात के एक दिन पहले मैंने जब अपना परांठा अचार के साथ उसे खाने को दिया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा। मैंने उसे अचार देने का वादा किया था। उस दिन माँ से डाँट तो पड़ी थी पर आज ये डाँट मीठी डाँट लगती है।
मुझे बचपन से ही गाने व नाचने का बड़ा शौक था। जब भी किसी के घर शादी, ब्याह या उत्सव आदि होता तो राजस्थान में कई दिनों पहले ही गीत गाए जाते हैं। मैंने उस समय की सभी हिट फिल्मों के गीत याद कर लिए थे। मैं शादी वाले घर में माँ से छुपकर जाती और कह आती कि मैं खूब नाचूँगी और गाऊँगी भी लेकिन आप मेरी माँ को कह आना कि निर्मल को जरूर साथ लाना। किसी कार्यक्रम में जाने, नाचने, गाने पर माँ हमें कह देती है अभी तुम लोगों के पढ़ाई करने के दिन हैं, गीत गाने के नहीं। मैं मन मार कर रह जाती पर गीत गाने की इसी लगन ने मुझे गीतकार और कहानीकार बना दिया। बहुत साल पहले बाबूजी और फिर माँ भी सितारों में शामिल हों गईं पर आज भी बचपन की यादें, माँ-बाबूजी का प्यार, मीठी डाँट, नसीहतें सभी कुछ आँखों को नम कर जातीं हैं।



224 बसन्त एवेन्यू,
अमृतसर-143001 (पंजाब)

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