आत्म संतुष्टि


अलग कोना / जुलाई-अक्टूबर 08
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रूपाली दास ‘तिस्ता’



भावनात्मक सम्बन्धों से जुड़ा मानव अपनी आत्म संतुष्टि के लिए हमेशा ही प्रयासरत रहा है। हर क्षण वह अपने अह्म, अपने अस्तित्व को ही अधिक महत्व देता है। जीवन की समस्त कठिनाइयों को झेलते हुए वह सारी उम्र अपने अह्म से ही प्यार करता चलता है और अपने सुख, शांति व संतुष्टि को ही सर्वोपरि रखता है।
एक पिता अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर समाज में एक योग्य व्यक्ति बनाता है। अपनी जमा पूंजी खर्च कर या उधार लेकर भी अपनी बेटी का विवाह अच्छे घर में करने की कोशिश करता है। ऐसा वे इसीलिए नहीं करते कि वे बच्चों पर उपकार करते हैं वरन् इसीलिए करते हैं कि उन्हें सुख-शान्ति चाहिए। जब समाज उनके बच्चे को इज्जतदार की श्रेणी में खड़ा करेगा, लोग उन्हें प्यार करेंगे तो पिता का सीना गर्व से ऊँचा हो जायेगा। बेटी जब ससुराल में सुख एवं समृद्धि में रहेगी, उसे कोई दुःख कष्ट नहीं होगा तो पिता के अहम् को सन्तुष्टि मिलेगी। वहीं जब पिता के सामने बेटा अनपढ़ रह जाये और समाज में समुचित धन, इज्जत प्यार ना पाकर तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाये और बेटी भी बदचलन निकले या ससुराल में दुःख भरा जीवन जीने के लिए विवश हो तो पिता भी दुःखी व बेचैन हो जाता है। पिता अपने बेटे-बेटियों से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ होता है। फलतः उसे भावनात्मक असन्तुष्टि मिलती है, और कोई पिता जानबूझ कर भी दुःखदायी स्थिति की कल्पना नहीं करता। इसलिए वे दिन रात कड़ी मेहनत कर सारे कर्तव्यों को निभाने का प्रयास करते हैं। जिससे उनकी सुख, शान्ति और संतुष्टि की पूर्ति हो।
पति-पत्नी, माँ-बेटा, प्रेमी-प्रेमिका चाहे कोई भी वे परस्पर इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि वे आपस में भावनात्मक सम्बन्धों से जुड़े हैं। फलतः वे एक दूसरे को तकलीफ में नहीं देख सकते, न ही उनके आँसू देख सकते हैं। अतएव अपनी सुख शान्ति एवं सन्तुष्टि के लिए हम इन भावनात्मक रिश्तों से जुड़ी तमाम दुःख व तकलीफ को अपना समझकर दूर करने की कोशिश करते हैं।
जीवन की परम सच्चाई यह कि हम जो कुछ भी करते हैं मात्र अपने अहम् या आत्म-सन्तुष्टि को प्राप्त करने के लिए। यही आत्म-सन्तुष्टि वह ऊर्जा है जो हर मनुष्य को भावनात्मक रिश्तों से जुड़े रहने को विवश करती है।
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खाद़ी पारा हाउस शोभाकुंज
पोस्ट बोलपूर, जिला-वीरभूम,
पश्चिम बंगाल पिन-731204

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