बेल

कविता ====== मार्च -जून 06

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बेल
सुरेश चन्द्र त्रिपाठी
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पतरी पतरी लम्बी लम्बी भागत जात छनहनी,
मानौ कौनउँ खेल खेल रइ कदुआ बेल सयानी।

पीरे पीरे फूलन बाली ओढ़े हरी चुनरिया,
बखरी के कोने से चढ़के पहुँची जाय अटरिया,
लोट गई धरती माटी पै, लगरओ, लली रिसानी।

खपरैलन पै दौर लगाई, तार पकर के झूली,
छपरा के ऊपर छहरानी, घूरन रस्ता भूली,
बरषा की वुँदियन मैं रुच रुच भींजी और नहानी।

खेल चढ़ी है धाय बिठन पै, झकरन से झगरी है,
मानौ मित्र गरे लिपटानी बिरिया पै लहरी है,
लौकी, खीरा सँग कचरी से लै गइ दाँव न मानी।

फूले फूलन पास जाय भौंरा, तितली, मधुमाखी,
बेलन की तारीफ करन मैं कसर न कौनउँ राखी,
तभईं लँगड़ी दई हवा नें बेसुध डरी उतानी।

फर गये कदुआ ऐसो लगरओ, ढोलक गावैं सोहरे,
कहूँ तुरइयाँ झूमैं लटकीं, बन्दरवारे फहरे,
जो कोउ छुओ संग गलबहियँन सी रेशन लिपटानी।
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911/1, राजेन्द्र नगर, उरई

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