सुरसती बुआ

कहानी मार्च - जून 06
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सुरसती बुआ
डा0 विद्या विन्दु सिंह
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सुरसती बुआ देखने में सामान्य स्त्री जैसी थीं। दाँत थोड़े बड़े, रंग साँवला, आँखें छोटी। पर उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था कि उन्हें असंदर नहीं कहा जा सकता था। कद काठी लंबी थी।
वह चबूतरे पर बैठी थीं। गाँव में कई औरतें उनके सामने हाथ जोड़े बैठी थीं। वे रह-रहकर काँप रही थीं। जालपा माई उनके सिर आ गयी थीं। लल्लन बहू उनके पैर पर गिर कर घिघिया उठीं - माई ! हमरे छोटकी क एक बेटवा दैद्या। माता ! तुहार चैरा लीपब। तुहैं हरदी क धार, पियरी, कराही चढ़ाइब।
सुरसती बुआ जोर-जोर से झूमने लगी थीं। झूमते-झूमते हुंकार कर उठी-नइहरे क बरम आय बा, उहै रोके है रास्ता।
लल्लन बहू अँचरा पसार कर बोली - ‘‘उपाय बतावा महतारी ! जौन कहा तौन करी। उनका काँपना और बढ़ गया। अब वे कमर से लेकर सिर तक का हिस्सा वृत्ताकार घुमा रही थीं। उनकी आँखों में खून उतर आया था। वे किसी को डांट रही थीं - छोड़ दे इसे, छोड़ दे इसे। नहीं तो मैं तेरा खून पी जाऊँगी। जा ! जहाँ से आया है वहीं लौट जा। यहाँ मेरा चैरा है। इस सिवान में आगे कदम मत रखना। फिर जोर-जोर से हँसने लगी - खून चाहिये तुझे खून, अच्छा ले, चख ले। पर फिर इधर घूमकर मत देखना। कहकर उन्हाने सरपत से अपनी उँगली चीर ली और खून की बूँद वहीं धरती पर गिरा दी।
छोटकी की ओर करूणा की दृष्टि से देखकर बोलीं - जा अब गोद भरेगी। वह तुझे छोड़ गया। सभी स्त्रियाँ फिर से सुरसती बुआ के चरण छूने लगी थी। अब वे सँभल रही थीं। कुछ स्त्रियाँ निराश हो रही थीं। आज तो हम अपने बारे में कुछ पूछ-कह ही नहीं पाये। अब जाने कब माई फिर उनके सिर आये ?
मैं अपने बचपन से सुरसती बुआ को देखती आ रही थी। तब से जब वे पुष्ट देहयष्टि वाली युवती थीं। अब तो वे वृद्धा हो गयी थीं।

मैंने अपनी दादी से सुना था कि सुरसती बुआ ब्याह कर ससुराल गयीं तो कुछ ही सालों बाद लौटकर मायके आ गयीं। माँ-बाप साल भर के अंतर में ही मर गये। छोटा भाई अनाथ हो गया। उसे साथ ले गयीं। खेती-बारी, गाय-भैंस गाँव वालों के भरोसे छोड़ गयीं थीं। साल भर तो जल्दी-जल्दी आकर देखती रहीं।
एक बार आयीं तो देखा कि गाय-भैसें दुबरा (दुबली) गयीं हैं, और जिन्हें उनको सौंपकर आयीं थीं, उनका परिवार चिकना गया है। बरदौरी में माछी भिनक रही है। गाय भैसें उन्हें देखकर ऐसे रम्भाने लगीं जैसे ससुराल से लौटी बेटी माँ को देखकर विह्वल होकर रो पड़े।
वे गाय भैसों से गले लगकर रोती रहीं। बरदौरी में गोबर साफ किया। गाय भैसों को ले जाकर तालाब में नहलाया। सानी भूसा किया।
फिर अपने पिता के हाथ के लगाये बाग में गयीं। लगा जैसे पेड़ उदास हों। वह उनसे लिपट-लिपटकर रोती रहीं।
भाई को वापस साथ ले आयीं थीं। बाग में जब उन्हें ध्यान आया कि भाई भूखा होगा और थका भी, तब वह जल्दी-जल्दी घर लौटीं।
रसोई में गयीं तो देखा कि सभी हँडिया (घड़े) खाली हैं। दाल, चावल, आटा घर में कुछ नहीं। तेल, घी की मटकियाँ भी खाली हैं। उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह तो सब कुछ भरा छोड़कर गयीं थीं। घर की चाभी वह इसलिये दे गयीं थीं कि घर में दिया-बत्ती, घर की सफाई होती रहेगी। गाय-भैंसे जो दूध देंगी, उसे जमाकर, मथकर, मक्खन खर (गरम) करके वे रख देंगे। मट्ठा दूध वे लोग खा लेंगे।
पर यहाँ तो देख रही थीं कि सारा सामान ही साफ हो गया है। घर में लग रहा था कि महीनों से झाडू नहीं लगी है।
उन लोगों ने छोटी सी बच्ची के हाथ चाभी भेज दी। उन्होंने जब उसकी माँ के बारे में पूछा तो वह बोली - उन्होंने कहा है कि बता देना माई बीमार है। सुरसती की समझ में आ गया, बीमारी का कारण। कैसे मुँह दिखाने का साहस करें। अबकी सुरसती बुआ अचानक आ गयी थीं।

‘अवधू’ यही नाम था छोटे भाई का, मुँह लटकाये गाँव से लौट रहा था। वह पुरवा भर में घूम कर आया था। किसी ने भी उसे कुछ खाने को नहीं पूछा था। सुरसती बुआ उसे बिठाकर डलिया लेकर खेत में गयीं। जाड़े के दिन थे। सोचा - मटर तोड़ लाऊँ और घुघरी बना दूँ। पर मटर का डाँठ जानवर खा गये थे। थोड़ा डाँठ जो बचा था उसकी फलियाँ तोड़ी जा चुकी थीं।
वे किसी तरह गुस्से पर काबू करके उनके घर गयीं। उनको देखते ही जैसे सबको साँप सूँघ गया।
वह कुछ बोलतीं उसके पहले ही उनकी काकी बोली उठीं - हमरे घरे तौ एक ओर से सब बोखार मा परा रहा, आजै सब उठा है। सुरसती बुआ ने दबी जुबान में कहा - न घर में आटा, दाल, तेल है और न खेत में मटरफली, अवधू भुखान है, का बनाई ? थोड़ा दूध दै द्या तौ उहै पिलाइ देई।
काकी कहरती हुई बोली - तोहार गैया भैंसी तो दूधौ देब बंद कइ दिही हैं। हमरी गइया क दूध लरिकनों क ना पूर परत है। थोड़ा आटा, दाल, चाउर देवाय देइत है, लिहे जा बनाय ल्या। उन्होंने अपनी बहू को आवाज लगाई।
सुरसती बुआ के सिर से पैर तक आग लग गयी। खून का घूँट पीकर रह गयीं। काकी की बहू रानी आवाज सुनकर भी नहीं आयीं थीं। वह उल्टे पाँव लौट पड़ीं।
बाहर निकलते ही पतरकी नटिनियाँ मिली - बुआ पाँय लागी। कहकर चरण छुआ और हाल-चाल पूछने को हुई तो उनका तमतमाया चेहरा देखकर सहम गयी। क्या बात है बुआ, कब आयीं ? उसकी संवेदना से वे विह्वल हो उठीं। उनकी आँखों में आँसू आ गये।
कुछ नाय भौजी ! अवधू भुखान है, घर मा कुछ नाय है, वही के लिये दूध लैवे आय रहे मुला .....
पतरकी सब समझ गयी। बोली - बुआ ! हम तो ठहरे नट बहुँचरिया। हमरे घर क त तू पानी न पीबू। मुला अवधू बबुआ तौ हमरी छेरी क दूध पी सकत हैं। चला आपन बरतन द्या हम वही मे दुहि के भेजित है।
उसने अपने लड़के को आवाज दी। अरे मिठुआ ! डलिया में छीमी (मटर फली) धारी है उठाइ कै बुआ के हियाँ पहुँचाइ दे। बुआ हमरे तो खेत-बारी नाय है, मुला कौनो चीज खाये क कमी नाय है। आज ठाकुर बाबा किहाँ से छीमी पायो है। आजु तू खाय ला, हम काल्हि लाय के खाय लेबै।
सुरसती बुआ के लाख मना करने पर भी वह उनके बरतन में दूध दुहकर दे आयी। मटरफली लाकर छील दिया। आलू भी अपने घर से लाकर छीलकर धोकर रख दिया। बुआ ने घुघरी बनाकर अवधू को खिलाया। पतरकी को दिया और खुद भी खाकर तृप्त होकर बोलीं - भौजी आज मालूम परा कि जाति, गोत, सगा सब कहै के हैं जो आपन दुःख-सुख समझै उहै आपन है।
पतरकी से उन्हाने गाँव का हाल-चाल पूछा। सब बताने के बाद पतरकी दबी जबान से बोली बुआ तोहार काका एक दिन कहत रहे कि हमैं अधिया पै दै देयँ तबै हम कराउब उनकै खेती बारी। हमरे यतना जाँगर फालतू नाय है कि अपनौ सम्भारी और मुफत माँ दुसरेव के। बुआ कुछ नहीं बोलीं। उनके माता पिता थे तो गाँव में ही एक जून का दूध चार पाँच घरों में बेच देते थे। और एक जून का घर वाले दूध-दही-मट्ठा खाते, घी बनाते, काम भर का रखकर, घी बेच भी लेते थे।

खेती भी बहुत ज्यादा नहीं तो इतनी तो थी ही कि साल भर आराम से खाकर बचा हुआ बेंच लेते। कपड़ा लत्ता, नमक-मसाला खरीदने से जो बच जाता उसे गाढ़े समय के लिये एक हँड़िया में रखकर जमीन के अंदर गाड़ देते थे। उसके ऊपर ऐसा लीप देते थे कि कोई पता नहीं लगा सकता था। खुद भी जगह पहचानने में भूल न हो इसलिये उसी के ऊपर छोटी चकिया रख दी जाती थी।
सुरसती बुआ की शादी में वह हँड़िया खोदकर उसमें से कुछ धन निकाल लिया गया था। और अबधू के लिये रखकर उसी तरह बंद करके लाल कपड़े से उसका मुँह बाँध दिया गया था और उसे गाड़ दिया गया था।
उसी दिन सुरसती बुआ की माँ ने बेटी को वह जगह दिखा दी थी। और कहा था बेटी अवधू अभी छोटा है। हमारे बुढ़ापे की औलाद है। हमें कुछ हो जाय तो उसका हिस्सा उसे सौंप देना। माँ ने यह भी कहा था कि किसी को यह बात बताना नहीं। अवधू को भी नहीं, अभी बच्चा है, किसी को बता देगा।
सुरसती बुआ, माता पिता दोनों के अंतिम क्षणों में आ नहीं सकी थीं। दोनो बार ही मृत्यु के बाद पहुँची।
अवधू अकेला बिलख रहा था उसने दीदी की गोद में सिर रखकर रोते हुये कहा था - माई कहतीं रहीं, दीदी से कह दिह्या चकिया देखि लेइहैं। कहते-कहते उनकी बोली बंद होइ गयी। जब अवधू बता रहा था उस समय काकी वहीं बैठी थीं। सुरसती पिता और फिर माँ के अकस्मात् चले जाने से इतनी विह्वल थीं कि उसे तुरन्त जाकर चकिया देखने की सुधि नहीं रही थी।
माँ का दाह करने लोग दिलासीगंज (सरयू नदी के तट पर एक स्थान) से लौटे तो रात हो गयी थी। दुःख से बेहाल भाई-बहन की रोते-रोते आँख लग गयी थी।
अचानक कुछ खटका हुआ तो सुरसती बुआ उठकर चारो ओर देखने लगीं। कोठरी में ताला लगा था। वे फिर आकर लेट गयीं। पूरा बदन यात्रा की थकान और दुःख से पोर-पोर दुख रहा था। सवेरे हल्ला सुनकर और अपने दरवाजे पर खटपट सुनकर उठीं। कोई उनका और अवधू का नाम लेकर बुलाते हुये दरवाजा खटखटा रहा था।
उन्होने बदहवास घबराती हुई उठकर किवाड़ खोले तो देखा दरवाजे पर भीड़ लगी है। उनकी चकिया वाली कोठरी की दीवार में सेंध कटी है। चकिया अलग पड़ी है। हँडिया का पता नहीं है।
सुरसती बुआ सिर थामकर बैठ गयीं। भाई का दुर्भाग्य उन्हें झकझोर गया था। मन पश्चाताप से भर गया था। वह माँ के विश्वास की रक्षा नहीं कर सकीं थीं।
भाई की संपत्ति जो बची है मैं उसे अधिया पर नहीं दूँगी। जमाना कितना खराब है। किसी के मन में पाप का डर रह नहीं गया है। अधिया पर दे दें तो धीरे-धीरे लोग पूरा हड़पने की कोशिश करेंगे।
पतरकी से अधिया पर देने की बात सुनकर और आज काका के परिवार का व्यवहार तथा अपना घर खाली देखकर उनके मन में अचानक सेंध की घटना कौंध गयी। काकी ही तो थीं उस समय जब अवधू उससे माँ की कही बात बता रहा था। अचानक उनके मन में जैसे रहस्य का पर्दा उठ गया। मैं भी कैसी मूर्ख हूँ। उन्हीं लोगों पर विश्वास करके उनके हाथ में घर-द्वार खेती-बारी गाय-गोरू सौंप गयी थी। हे भगवान ! मेरी मति मारी गयी थी। अच्छा हुआ आज उन्हीं लोगों ने चेता दिया। वरना बार-बार वह छली जाती रहतीं, अपनों के सम्बन्धों के नाम पर।

उसने पतरकी भौजी के जाते ही घर, खेत-पात और जानवरों की व्यवस्था शुरू की। चार दिन में घर चमक गया। गौशाला और गाय-भैंसे साफ सुथरी हो गयीं। लगा कि उनमें जीवन का संचार हो गया है। खेती-बारी का काम हरवाहे को बुलाकर साथ में लगकर पूरा किया। राशन पानी ठीक किया। अभी कुछ और काम बाकी था। और तभी ससुराल से देवर आ गया उन्हें ले जाने के लिये।
वह अवधू को छोड़कर जाना नहीं चाह रही थी। और उसे लेकर जाने पर यहाँ की व्यवस्था फिर पूर्ववत् बिगड़ जायेगी। वह रहेगा तो गाय भैंसों को चारा लाकर देगा। घर में दिया बत्ती कर लेगा। पर अभी वह अपना खाना बना नहीं पाता था। खायेगा कहाँ?
काकी के यहाँ अब सौंपने का उनका मन नहीं था। देवर को उन्होंने समझा बुझाकर विदा कर दिया था कि मैं पाँच छः दिन बाद अवधू को लेकर आ जाऊँगी। देवर मुँह लटकाये लौट गया।
वहाँ भी अभी वह अकेली बहू थीं। सास जी बहू के आने के बाद से चूल्हा चैकी से एकदम फुरसत पा गयीं थीं। बहू जाकर अपना मायका सम्भाले और वे घर बाहर खटें यह उन्हें नागवार गुजर रहा था।
छोटे बेटे को अकेले लौटा देखा और बहू का संदेश सुना तो एकदम आग-बबूला हो गयीं। हम बेटवा क बियाह किये हैं आपन घर सम्भारे बदे कि उनके नैहर सम्भारै कि खातिर। और आटी-पाटी लेकर पड़ गयीं।
बड़ा बेटा घर आया तो माँ को लेटा देखकर चिंतित हो गया। हाल-चाल पूछा तो छोटे भाई और माँ ने नमक मिर्च लगाकर बहू के न आने की बात कह डाली और कहा कि बहू ने कहा है कि मायके की गृहस्थी सम्भाल लूँगी तभी आऊँगी।
माँ ने बेटे को उकसाना शुरू किया। जाने का देखे तोहार बाप जवन ई रिश्ता मंजूर कर लिहिन। न सूरत न सीरत, कंगाले की बिटिया दान दहेज ना मिला त सोचेन की चला कामकाजी होई। मुला अब वै नैहर सम्भरिहैं त हमरे बूता नाय बा इहाँ खटै कै। चार पाँच दिन माँ न आवैं त हम दूसर वियाह करि लेब तुहार। हमार मामा अपनी पोती क रिश्ता करै के खातिर इहाँ गोड़ घिसि डारिन, मुला तोहरे बाप के आगे हमार एकौ ना चली। ऊ बिटिया कै रूप देखा तौ तोहार आँख चैधियाय जाय। हमारा मामा धन-दौलत से घर पाट दिहे होतिन। ओकर बियाह ना भय बा। आठ दिन तक उनके राहि देखब न आयीं तौ हम बियाह कै लेब। इस समय सुरसती के सुसर सिंगापुर चले गये थे। सास के वही मामा वहाँ रहते थे। आये थे तौ पैसों का लालच दिलाया। ससुर नहीं जाना चाह रहे थे। पर सास ने उन्हें जबरन भेज दिया। वे अभी एक साल तक तो आने से रहे इसी बीच सास यह गुल खिला देना चाहती थी। उसे अकस्मात् एक मौका ऐसा मिल गया था जिससे वह चूकना नहीं चाहती थीं।

सुरसती बुआ को देखते ही उसे अपने मामा की पोती याद आ जाती। साथ ही मामा की सिंगापुर की कमाई हुई भारी-भरकम दहेज की रकम भी। मामा से गुपचुप उसने बात भी कर ली हो तो कोई ताज्जुब नहीं है।
शायद सुरसती बुआ के माँ-बाप के मरने के बाद ही उसके मन में यह योजना कुलबुलाने लगी थीं। सुरसती बुआ के पिता उनके ससुर के रिश्ते में भी थे और दोनों गहरे मित्र भी थे। इसीलिये लाख विरोध के बाद भी ससुर जी ने यह सम्बन्ध मान लिया था। वे सुरसती को अपनी बेटी की तरह मानते थे। और उनका यह दुलार ही सुरसती की सास की आँखों में काँटा बनकर कसकता था।
सुरसती बुआ के पति कुछ नहीं बोल सके। माता-पिता का दबदबा उस समय इतना था कि अपनी पत्नी और विवाह के बारे में मुँह खोलना बेशरमी मानी जाती थी।
उनके देवर को लौटकर गये आठ दिन बीत गये और बुआ वापस नहीं लौट सकीं। रात-दिन की मेहनत और मानसिक चिन्ताओं के कारण उन्हें बुखार आ गया। अपनी परवाह उन्हें उतनी नहीं थी।
पर अवधू को भी दूसरे दिन बुखार ने आ घेरा। उसे शीतला माई निकल आयीं। अपना बुखार झटककर वे उठ खड़ी हुई और भाई की सेवा में जुट गयीं। वे शीतला माई के लिये सवेरे नीम का चैरा लीपैं, हल्दी, लवंग, गुड़ का ढरकावन चढावैं। शीतलहा (चेचक का रोगी) के खटिया तरे लीपैं। नीम की टहनी से बयार करैं। रोज बिछौना, कपड़ा की सफाई करैं, घर में छौंक बघार दाल में हल्दी तलना-भूजना सब बंद हो गया।
अवधू कुछ खा ही नहीं पाता था। अपने लिये बनाने का न उन्हें समय था न इच्छा। वह रात दिन देवी माई का सुमिरन करती थीं - हे माई ! दया करा, जान बख्शा। वे जैसे भक्ति के उन्माद में खोई रहने लगीं। करुण स्वर में देवी गीत (पचरा) गाने लगीं।
माँ ने उनकी पुकार सुन ली। आठवें दिन अवधू ने आँखें खोलीं। देवी ढार पर थीं। सुरसती बुआ की तपस्या सफल हुई। देवी को पानी छुवाया, पूजा की और उसी दिन उनको भी देवी निकल आयीं। उन्हें कौन देखता ? अवधू इतना कमजोर था कि स्वयं को संभाल नहीं सकता था।
पतरकी भौजी के लड़के को अपनी ससुराल भेजा कि जाकर यहाँ का हाल पता दे आओ।
वह गया। दरवाजे पर ही उसकी सास मिलीं। सुनते ही कि चेचक निकली हैं और वहाँ से सन्देश लेकर आदमी आया है, वह विफर पड़ीं - हाय राम ! घर माँ देवी निसरी है और उहाँ से सनेसा लैके मनई पठवा है। देवी ! हमरे पशु-परानी कै रक्षा किहू। जो हमार अनभल चेतै, ओकरे साथ तू विचार किह्या मइया।

उन्होंने कलुवा को दाना-पानी को कौन कहै, बैठने को भी नहीं कहा। कलुवा सूखा मुँह लिये भूखा-प्यासा लौट आया और आकर जब सारी बात बताया तो सुरसती बुआ का मन एकदम खट्टा हो गया। वह चारपायी पर पड़ी थीं। पतरकी भौजी ही उनकी सेवा कर रही थीं।
अवधू को भी अपने घर से तो नहीं, यहीं पकाकर इनके घर खिला देती।
अपने पट्टीदारों ने झाँककर देखा भी नहीं था। जबकि सब जानते थे कि सुरसती अपनी बिरादरी के बाहर के हाथ का छुआ नहीं खाती-पीती। वे बचपन से ही देवी की भक्त थीं।
‘मड़हा’ नदी के उस पर जालपा देवी का टीला था। वहाँ जाकर वे जो मनौती मान देती थीं, वह पूरी हो जाती थी। वहाँ हर सोमवार को वे दर्शन करने और लवंग-जल चढ़ाने जरूर जाती थीं। गर्मियों, जाड़ों में आसान था जाना, क्योंकि एक जगह से नदी सँकरी और उथली थी। वहाँ से घुटने-घुटने तो कभी-कभी कमर तक और कभी-कभी कन्धो तक पानी में चलकर वे जाती थीं।
माँ डाटती थी कि बीमार हो जायेगी या किसी दिन फिसलकर गिरेगी तो क्या होगा। भगवान न करें कभी पैर ऊँचे-नीचे गड्ढे में पड़ जाय तो तैरना भी नहीं जानती है। पर सुरसती बुआ हँस देती थीं। बड़े विश्वास के साथ - अरे माई जेकर दर्शन करै जाइत है, ऊ बचाये न, तू काहें फिकिर करत है।
लेकिन बरसात में जब मड़हा नदी बढ़ती हैं तो लगता है कि सरजू का चैड़ा पाट हो गया है और बाढ़ आने पर तो जालपा माई का चैरा या टीला भी डूब जाता था।
सुरसती इस पार खड़ी होकर अनुमान करती कि कहाँ माई का चैरा होगा और मन ही मन आतंकित होतीं कि कहीं नदी उस टीले को बहा न ले जाय। है तो माटी का ही न, पर वह तुरन्त कान पर हाथ रखकर जालपा माई से माफी माँगती-अरे
मइया ! माफी द्या, रामराम, ऊ कौनों ऐसन-वैसन चैरा थोड़े ही है, माई का चैरा है ऊ कैसे गलि-बहि सकत है भला ?
ऐसे दिनों में जब वह चैरे तक नहीं जा सकती थीं, तो बेचैन रहती थीं।
उनकी माँ ने एक दिन कहा - बिटिया इतना काहे परेशान रहत हौ। अरे माई कहाँ नाहीं है ? नीमी क पेड़ में देवी क वास है। तू वहीं के चैरा बनाय ल्या। जालपा माई यहीं में समाय जैहें।
सुरसती बुआ ने ऐसा ही कर लिया। दरवाजे की नीम के नीचे नदी से मिट्टी लाकर चैरा बना लिया।
दूसरे दिन वहाँ भी लवंग, फूल, ढरकावन चढ़ने लगा और नदी तीरे के चैरे पर भी। जाने लायक रास्ता न रह जाय तो इस पार से ही उसी ओर मुँह करके वह पूजा चढ़ाने लगीं। (अगले अंक में समाप्य)
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पूर्व उप निदेशक-हिन्दी संस्थान, लखनऊ
45, गोखले बिहार मार्ग, लखनऊ 01

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