महात्मा गाँधी और उनका दलितोत्थान

आलेख ====== मार्च - जून 06
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महात्मा गाँधी और उनका दलितोत्थान
डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव
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महात्मा गाँधी समस्त पूर्वी चिन्तन के प्रतिनिधि विचारक कहे जा सकते हैं। शायद वे विश्व के एकमात्र ऐसे विचारक हैं, जिन्होंने लक्ष्यों और साधनों की पवित्रता को समान-रूप से महत्वपूर्ण माना। गाँधी जी ने एक राष्ट्रनायक के रूप में भारत की आजादी के आन्दोलन का नेतृत्व ही नहीं किया वरन् वे मानवीय मूल्यों की रक्षा का सन्देश देने वाले विश्व के महानतम चिंतक हैं। चिंतक होने के साथ-साथ महात्मा गाँधी राजनीतिज्ञ एवं समाज सुधारक भी थे। यहाँ यह बताना पर्याप्त है कि गाँधी जी की निष्ठा सभी वर्गो के प्रति समान थी, परन्तु किसी को नाराज न करके वह सबको खुश करने की चेष्टा करते रहते थे जो सम्भव ही नहीं था और कभी-कभी सबको खुश करने के लिये व्यक्ति को विवादास्पद एवं इतिहास में संदेहास्पद स्थिति में रहना पड़ता है। महात्मा गाँधी समाज सुधारक के रूप में भारतीय समाज में जाने जाते हैं और राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रदूत भी, क्योंकि हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में दो ऐसी बाधायें उपस्थित थीं जिनको हल करना तत्कालीन समय में अति कठिन कार्य था। साम्प्रदायिकता और अस्पृश्यता के अन्त का कार्य करते करते हालाँकि आपका जीवन बलिदान हो गया परन्तु उन्होंने इसे एक सीमा अवश्य प्रदान कर दी। गाँधी जी अस्पृश्यता को हिन्दू समाज का कलंक मानते थे और इस बात को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे कि दलित वर्गों को समाज के अन्य वर्गों से पृथक रखते हुये हीन समझा जाये। गाँधी जी के अनुसार-‘‘सामाजिक व्यवस्था, व्यक्ति तथा व्यक्ति के मध्य तथा पुरुष एवं नारी के मध्य समानता पर आधारित होगी। इस प्रकार की व्यवस्था में किसी प्रकार का भेदभाव नही होगा। यह नैतिक राष्ट्रवादी तथा आत्मज्ञानी व्यक्तियों का समाज होगा। यह बाह्य आडम्बरपूर्ण धर्मों के द्वारा अज्ञानी एवं सीधे लोगों पर आरोपित की गयी साम्प्रदायिक कठोरता, धार्मिक दोषारोपण तथा विवेक शून्यता से मुक्त सामाजिक व्यवस्था होगी। इस व्यवस्था में व्यक्ति की सुख सुविधा की भावना तथा सामाजिक विकास की क्षमता को प्रभावित किये बिना, व्यक्तित्व के विकास के लिये पूर्ण अवसर प्रदान किये जायेंगे।’’ स्पष्ट है आने वाले समय में गाँधी जी ने समाज कल्याण के लिये अनेक कार्य किये, इन्हीं कार्यों में एक महान कार्य था हरिजन (दलित) उत्थान। समाज का विकास तभी हो सकता है जब उसके सभी वर्गों का विकास हो। गाँधी ने देखा कि समाज के एक वर्ग (दलित) के साथ अन्य वर्गों (उच्च जातियों) का व्यवहार सही नहीं है। उन्हें अस्पृश्य माना जाता है और उनके साथ अत्याचार होता है। गाँधी ने अस्पृश्यता को मानव समाज का एक कलंक माना और अपने इस लक्ष्य की सिद्धि के लिये रचनात्मक कार्यक्रमों की एक अठारहसूत्री तालिका बनाई जिसमें अस्पृश्यता निवारण को महत्वपूर्ण स्थान देकर उस पर प्रयास भी किये। गाँधी जी ने अस्पृश्यता सम्बन्धी अपने विचारों को हरिजन सेवक तथा यंग इंडिया के माध्यम से व्यक्त किये हैं। पहले उनके विचारों से हम आपका परिचय कराते है-‘हरिजन सेवक’ में एक स्थान पर अस्पृश्यता के बारे में गाँधी जी लिखते हैं-‘अस्पृश्यता का घाव इतना गहरा चला गया है कि इसका जहर हमारी रग-रग में फैल गया है। ब्राह्मण-अब्राह्मण के भेदभाव की ओर अलग-अलग धर्मों के बीच के भेदभाव की जड़ अस्पृश्यता में ही है। अस्पृश्यता का यह जहर क्यों रहना चाहिये ?’ (हरिजन सेवक-23-2-1934)। गाँधी ने यह सार्वजनिक रूप से कहा भी कि हम अछूतों को अपने गले से जब तक नही लगाएंगे-तब तक हम मनुष्य नहीं कहला सकते। आपका मत था कि यदि हिन्दुओं के मन से अस्पृश्यता के विष को निकाल दिया जाये तो इसका भारत की सभी जातियों के आपसी सम्बन्धों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा। ‘हरिजन सेवक’ के 17 नवम्बर 1933 के अंक में आपने लिखा है-‘‘हिन्दुओं का अपने आपको ऊँच और नीच के भेद भाव से मुक्त कर लेना मात्र ही अन्य जातियों के बीच पारस्परिक वैमनस्यता एवं अविश्वास को दूर कर देता है।’’ गान्धी जी मानते थे कि हम सम्पूर्ण भारत एक परिवार की तरह है और सारी मनुष्य जाति एक वृक्ष की शाखायें है। यह सच है कि गाँधी ने सनातनी हिन्दुओं को अस्पृश्यता निवारण की आवश्यकता हेतु हिन्दू धर्म का सहारा लिया। हिन्दू धर्म को मानने वाले के प्रति गाँधी ने कहा कि ‘अस्पृश्यता का मौलिक उद्भव धर्म में नहीं है। अस्पृश्यता दैवी नहीं मानवकृत है। अछूतपन जैसा हम आज मानते हैं, न पूर्व कर्म का फल है, न ईश्वरकृत है, आज का अछूतपन मनुष्यकृत है, सर्व हिन्दूकृत है। यह सच है कि तत्कालीन समय में अस्पृश्यता हिन्दू धर्म में घुसी सड़ांध की तरह थी, जो महान पाप की तरह थी और यह मानसिक रूप से हिन्दू मानस पटल पर अमिट प्रभाव छोड़ रही थी। इसका प्रभाव यह हुआ कि इसने समाज की जड़ों को खोखला कर दिया। स्वाभाविक है कि यदि हमें उचित सम्मान, उचित देखभाल एवं उचित साधन उपलब्ध नहीं है तो ऐसी आजादी मिलने का औचित्य ही क्या है ? गाँधी के मतानुसार ‘अस्पृश्यता के साथ संग्राम एक धार्मिक संग्राम है, यह सम्मान मानव सम्मान की रक्षा तथा हिन्दू धर्म के बहुत ही शक्तिशाली सुधार के लिये आवश्यक है।’ धर्म और सुधार का रिश्ता विवादास्पद होता है किन्तु गाँधी इनमें धर्म को सुधार के आगे गौण मानते हैं और आस्था को तिलांजलि देते हुये कहते है कि यदि लोगों ने (सवर्ण समाज) उनके अस्पृश्यता एवं दलितोत्थान सम्बन्धी कार्यों को नही माना तो वे ऐसे धर्म का परित्याग कर सकते हैं - ‘अगर मुझे पता चला कि हिन्दू धर्म सचमुच अस्पृश्यता का समर्थन करता है, तो हिन्दू धर्म का त्याग करने में मुझे किसी प्रकार की हिचकिचाहट नही होगी, क्योंकि मैं मानता हूँ कि कोई सच्चा धर्म सदाचार और नीतिशास्त्र के बुनियादी सत्यों के विरूद्ध नहीं होता।’’ (हिन्दी नवजीवन-3-11-1927 पृ।-85)
यहाँ तक सब ठीक है कि गाँधी ने अपने पत्रों/भाषणों के माध्यम से अस्पृश्यता निवारण हेतु साथ ही दलितों के उत्थान हेतु महान प्रयास/कार्य किये, परन्तु कुछ कार्य उनकी निष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं और उनका व्यक्तित्व इतिहास में दोयम दर्जे की विचारधारा वाला सिद्ध होने लगता है ? कुछ प्रमुख (बिन्दुओं की ओर) मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा-जैसे पूना पैक्ट (1932), गाँधी की धर्म सम्बन्धी आस्था, अस्पृश्यों के मन्दिर में प्रवेश सम्बन्धी उनके विचार, सहभोजन और विजातीय विवाह, इन सब में गाँधी कही न कहीं अपने कहे हुये विचारों से मुकरते नजर आते हैं। गाँधी ने दलितों पर किये गये अत्याचार को गलत बताया और इसे सनातनी हिन्दुओं की एक चाल बताया जबकि वास्तव में अपने व्यक्तिगत जीवन में गाँधी सच्चे सनातनी थे। एक भाषण में वे स्वीकार भी करते है कि ‘‘मैं अपने आपको हिन्दू धर्म की भावना से ओतप्रोत एक सच्चा हिन्दू मानता हूँ।’’ इसलिये गाँधी के अस्पृश्यता निवारण को सफलता नही मिल पायी क्योंकि वे भगवान और धर्म को एक साथ लेकर चलना चाहते थे और स्वाभाविक है अस्पृश्यता निवारण के इस कार्य में उनका सामाजिक सुधार धर्म के चंगुल में फँस गया। एक स्थान पर उनके अस्पृश्यता सम्बन्धी विचार भी बनावटी (संदेहास्पद) लगते हैं आप लिखते हैं-‘‘छूआछूत, दूर करना एक ऐसा प्रायश्चित है, जो सवर्ण हिन्दुओं को, हिन्दुओं को हिन्दू धर्म के लिये करना चाहिये। शुद्धि अछूतों की नही बल्कि ऊँची कहलाने वाली जातियों की जरूरी है। कोई ऐब ऐसा नहीं है जो खास तौर पर अछूतों के ही अंदर हो। अपने को ऊँचा समझने वाले हम हिन्दुओं का अभियान ही हमें अपने दोषों के प्रति अंधा बना देता है तथा हमारे दलित और पीड़ित भाइयों के दोषों को राई का पहाड़ बनाकर दिखाता है, जिन्हें हम सदियों से दबाये चले आये हैं और आज जिनकी गर्दन पर हम सवार रहते हैं। भिन्न-भिन्न राष्ट्रों की तरह भिन्न-भिन्न धर्म भी इस वक्त कसौटी पर चढ़ाये जा रहे हैं। ईश्वरीय अनुग्रह और प्रकाश का ठेका किसी एक जाति या राष्ट्र का नहीं है। वे बिना किसी भेदभाव के उन सब शब्दों को प्राप्त होते हैं जो ईश्वर की भक्ति और आराधना करते हैं। उस जाति और उस धर्म का नामोनिशान इस दुनिया से मिटे बिना नहीं रहेगा, जो अन्याय, असत्य और हिंसा पर श्रद्धा रखता है। ईश्वर प्रकाश है, अन्धकार नहीं। ईश्वर प्रेम है घृणा नहीं, ईश्वर सत्य है असत्य नहीं। एक ईश्वर महान है। हम उसके बन्दे, उसकी चरण रज हैं। आओ, हम सब नम्र बनें और ईश्वर के छोटे से छोटे प्राणी के भी इस दुनिया में जीने के हक को मान लें। श्री कृष्ण ने फटे-पुराने चिथड़े पहने हुये सुदामा का स्वागत सत्कार किया, जैसे उन्होंने और किसी का नही किया। प्रेम धर्म का मूल है। गोस्वामी तुलसीदास का कथन है - ‘‘दया धर्म का मूल है। पाप मूल अभिमान।’’ (हिन्दी नवजीवन-26-12-1924, पृ. 157)। धर्म और ईश्वर के इस पहरे के कारण गाँधी के अस्पृश्यता निवारण कार्य पर ग्रहण लगना स्वाभाविक था और यह सत्य है कि वे सनातन पोंगापंथियों को असंतुष्ट नहीं करना चाहते थे।
अगस्त 1932 के मैकडोनल्ड अथवा साम्प्रदायिक पंचाट में जिन वर्गों और हितों को अल्पमत में स्वीकार किया गया उनमें दलित वर्ग और पिछड़ी जातियाँ थी। यह महान कार्य अस्पृश्यों के नेता डा0 बाबा साहब अम्बेडकर के सतत प्रयास का भली फूल था, जिसके तहत दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन और निर्वाचित स्थान देने के अतिरिक्त साधारण निर्वाचन में भी उन्हें एक अतिरिक्त मत देने का अधिकार दिया गया था। गाँधी जी ने इसका विरोध किया और तर्क दिया कि इससे हिन्दुओं में स्थाई फूट और हिन्दू समाज में विघटन को प्रोत्साहन मिलेगा तथा अस्पृश्यता की बीमारी सदा के लिये भारत में जड़ें जमा लेंगी। गाँधी ने अनशन किया और अस्पृश्यों के लिये पृथक निर्वाचन क्षेत्र नहीं होने दिया। यहाँ हमारा कहना सिर्फ इतना है कि केवल कोई कार्य करने और भाषण वीर बनने से सम्पन्न नहीं हो जाता उसको अमल में लाने के लिये हमें कानूनी ताकत चाहिये और शक्ति ही (कानून) सफलता का अन्तिम निष्कर्ष होती है।
इसी तरह गाँधी ने अस्पृश्यों को धार्मिक स्थानों, मन्दिरों में प्रवेश के लिये कभी सार्वजनिक रूप से माँग नहीं रखी क्योंकि उन्हें भय शायद यह था कि यदि वह ऐसी माँग करते हैं तो वे सवर्ण हिन्दुओं के द्वारा प्रतिबन्धित कर दिये जायेंगे। इसलिये उन्होंने बीच का मार्ग अपनाकर यह कहा कि मन्दिर प्रवेश के लिये अस्पृश्यों द्वारा आन्दोलन करने के बदले स्पृश्यों को ही अपना एक कत्र्तव्य समझकर यह कार्य करना चाहिये अर्थात् गाँधी अस्पृश्यों के लिये दरवाजा तो खोलते है परन्तु अन्दर आने की बात नही करते हैं। सामाजिक समानता एवं राष्ट्रीय एकात्मकता को बरकरार रखने के लिये कभी भी, किसी भी समाज में विजातीय रोटी-बेटी का व्यवहार उसको आगे ले जाता है। पश्चिम का समाज आज इसलिये हमसे आगे हैं कि वह अपने समाज में सबको समान रूप से समाहित कर लेता है। गाँधी ने इस महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्न को गहराई से नहीं लिया, उन्हीं के शब्दों में-‘‘मुझे लगता है कि सहभोजन और अन्तरजातीय विवाह की अस्पृश्यता निवारण के लिये जरूरी नही है। मेरी वर्णाश्रम पर श्रद्धा है फिर भी मैं मेहतर के साथ खाना खाता हूँ। इतना ही हूँ कि मेरी योजना में अन्तरजातीय विवाह के लिये स्थान नहीं है।’’ (हरिजन (सा.) 23-9-1929, पृ. 11)। इसी तरह धर्म परिवर्तन सम्बन्धी अपनी आस्था में गान्धी कटघरे (सनातन हिन्दुत्व) में खड़े नजर आते हैं। डा0 बाबा साहब के अनुसार-‘‘यदि धर्म हमें समाज में समानता एवं सम्मान नहीं दे सकता है तो दलितों को उस (हिन्दू) धर्म को बदल ही क्यों नही देना चाहिये।’’ यह बात बाबा साहब ने सन् 1935 ई. में कही परन्तु गाँधी जी ने इसका भी विरोध किया, क्योंकि गाँधी जी की धर्म विषयक मान्यता पारलौकिक थी। आपके अनुसार-‘धर्म कोई घर या कोट नहीं है कि जो अपनी इच्छा से बदल दिया जाये। अपनी देह से भी बढ़कर धर्म अपना अविभाज्य हिस्सा है, मानव और उसका स्रष्टा इनका सम्बन्ध जोड़ने वाला धागा धर्म है।’’ (हरिजन, (सा.) 23-9-1929, पृ. 113)।
यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि गाँधी चिंतन और आदर्श नैसर्गिक नियमों और शाश्वत मूल्यों पर आधारित हैं और हम कही भी कतई उनकी नियति पर प्रश्न चिन्ह नही लगा रहे हैं। अपने वास्तविक जीवन में उन्होंने हरिजनोत्थान (दलितोत्थान) एवं अस्पृश्यों के लिये बहुत महत्वपूर्ण कार्य किये परन्तु सामाजिक ढाँचा को बदलने के लिये अकेले गाँधी पर्याप्त नहीं थे क्योंकि गान्धी किसी को नाराज नहीं करना चाहते थे उन्हें सब वर्गों को खुश करके (राजनीतिज्ञता झलकती है) स्वराज्य प्राप्त करने की अपनी इच्छा को प्रदर्शित भी नहीं करना था। हमारी यहाँ व्यक्तिगत सोच यह है कि शायद सनातन हिन्दुओं को धर्म और ईश्वर का झुनझुना देकर एवं दलितों को अस्पृश्यता का शिगूफा देकर वे दोनों लोगों (वर्गों) को खुश करने का प्रयत्न कर रहे थे यानी बीच-बीच में अपने विचारों को मोड़कर मध्य वर्ग अपनाते रहे। दो नावों के बीच पैर रखना अति दुर्लभ कार्य है। खतरे की घण्टी है। हमें सिंगल विचारक चाहिये जिसकी नीति एवं नियत स्पष्ट हो हालांकि ऐसे विचारक को तत्कालीन समाज स्वीकार नही करता (डा0 भीमराव अम्बेडकर) पर देर सबेर सत्य को पहचानने में समाज कोताही नही करता है।
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प्रवक्ता - हिन्दी विभाग
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई-जालौन

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