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पत्री (कुण्डली) --- राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी'



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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लघुकथा --- पत्री (कुण्डली)
राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी'



रमेश के ब्याव कै समय पत्री (कुण्डली) को एनई अच्छी तरह से मिलाबे के बाद ही पंडित जू ने कई ती कि इनके तो सबई गुन मिलत हैं। राम-सीता सी जोड़ी रये। पंडित के जा कैबे भर की देर हती, रमेश को ब्याव कर दओ गओ। कछु दिनन तो नई बहू को पाकै सबई जने खुश रये, फिर नई बहू ने अपनौ असली रूप दिखावों चालू कर दओ। अपने घमंडी एवं लड़ंकू स्वभाव के कारण घर में रोज चैं-चैं मची रत्ती, बहू रमेश से जा घर से अलग रहे के लाने कतती। रमेश जा के लाने राजी न हतो, सो वा तो रमेश से भी रात में लड़त हती। रोजई की किलकिल से रमेश को जी उनई भर गओ हतो। सौ रमेश ने ऊकी छोर-छुट्टी (तलाक) कर दई। अब रोज की दांती से घर को चैन मिल गओ।
एक दिना घर के सब जने दलान में बैठे हते तो दद्दा ने कई की जाने कौन घरी हती जब जा नई बहू अपने इतै आयी हती। इनै तो नकुअन में दम कर दई हती। तो वईं बैठो एक छोटो मोड़ा बोलो-‘‘दद्दा, जब अपुन ने चाचा को ब्याव करो हतो तो अपुन के पंडित कक्का ने जा कई ती कि जा जोड़ी तो राम-सीता सी रये। इनके तो सबई 36 गुण मिलत है फिर जा कैसी पत्री पंडित जू ने मिलाई?’’
दद्दा को जबाब में कछु कतन न बनो।

संपादक-आकांक्षा, नई चर्च के पास,
शिवनगर कालोनी, टीकमगढ़ (म0प्र0)

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फूल और बच्चा ---- कुँवर प्रेमिल



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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लघुकथा --- फूल और बच्चा
कुँवर प्रेमिल


एक बड़ी सी कोठी थी। उसमें एक बड़ा सा अहाता था। अहाते में एक छोटा किन्तु सुन्दर सा बगीचा था। बगीचे में रंग-बिरंगे फूल थे। बेहद सुन्दर-सुन्दर अनगिनत फूल कोई दूर से टिमटिमाते तारे जैसा तो कोई गोल-मटोल सूरज जैसा। उज्ज्वल-उज्ज्वल प्यारे चाँद जैसा तो कोई चमकते जुगनू जैसा। कहीं-कहीं तो फूलों की आतिशबाजी हो रही थी मानो फूलों का एक मेला सा भर गया था। वहाँ फूलों को तोड़ना तो अलग उन्हें छूने की भी सख्त मुमानियत थी। उन्हें चारों तरफ से एक काँटेदार बाड़ द्वारा घेर दिया गया था, ऊपर से एक चौकीदार भी सुरक्षा हेतु नियुक्त कर दिया गया था।
कोठी वाले फूलों की सुरक्षा से खुश थे। कोई परिन्दा भी वहाँ पर नहीं मार सकता था। सब कुछ पूरे नियंत्रण में था। एक दिन चौकीदार की आँखें दोपहरी में क्या झपकी कि गज़ब हो गया। उसका फायदा उठाकर एक सुन्दर सा गोल-मटोल बच्चा उस बगीचे में आ घुसा। फूल जो एक अरसे से अनमने थे, उदास-उदास ऊँघते रहते थे, बच्चे को देखकर एकदम चैतन्य हो गये। उनके अधरों पर मुस्कुराहट तैरने लगी। वे सब अधीर हो चले बालक को अपनी ओर आता देखकर आनन्द से झूमने लगे।
सहमा-सहमा सा बच्चा आगे बढ़ने लगा, उसे चौकीदार का भय सता रहा था। पूरी सतर्कता से वह एक-एक कदम आगे बढ़ा रहा था। ज्यों-ज्यों बालक फूलों के पास पहुँचने लगा, त्यों-त्यों फूलों के दिल खुशियों से धड़कने लगे। वे इशारा करने लगे, बच्चा फूूलों का स्नेह निमंत्रण पाकर उनके पास दौड़कर जा पहुँचा।
बच्चा फूलों को छू-छूकर देखने लगा। उन्हें बेतहाशा चूमने लगा। बच्चा और फूल आलिंगनबद्ध होकर एकरस हो गये थे। बच्चा और फूल, फूल और बच्चा एक दूसरे को पाकर खुशियों से भर गये थे। अब फूल तोड़कर बच्चा अपनी जेबें भरने लगा। फूल उसे और फूल तोड़ने के लिए उकसाने लगे। वे झुक झुककर स्वयं उसकी ओर खिंचे चले आने लगे। एक दूसरे को पाकर दोनों फूले नहीं समा रहे थे। तभी मानो एक तूफान आ गया। बच्चा, चौकीदार द्वारा देख लिया गया।
‘‘औ....ऐ...निखट्टू....बड़ा आया फूल तोड़ने वाला। मुझे नौकरी से निकलवायेगा क्या ...चल भाग...फूट यहाँ से।’’ चौकीदार बच्चे पर बुरी तरह गुस्सिया रहा था। बच्चा घबराया, फूल भी घबराये। छोटे फूल ने बड़े फूल से कहा -‘‘दादा! कहीं ये बागड़बिल्ला इस मामूम को सचमुच मार ही न बैठे।’’
‘‘तब तो बहुत बुरा होगा....बच्चा भूलकर भी हमारी ओर फिर कभी नहीं आयेगा।’’ छोटा फूल चिंचित हुआ जा रहा था। चौकीदार ने बच्चे के कान गरम किये तो बड़े फूल का गला भर आया। नन्हा फूल भी रुंआसा हो गया। बड़े फूल ने कहा-‘‘नन्हे, ये आदमी इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि बच्चे ही फूलों के सच्चे कद्रदान हैं। बच्चे फूलों के साथ नहीं खेलेगे तो उनके फूलों जैसे मन कैसे होंगे। बच्चे फूलों से ही तो हँसना सीखते हैं, गुनगुनाते हैं, अपनी कल्पना के महल खड़े करते हैं। काश! हमें बच्चों के साथ ही रहने दिया जाता तो कितना अच्छा होता।’’
‘‘दादा देखो तो उस बदमाश चौकीदार ने बच्चे को एक चाँटा भी जड़ दिया है। उसके गाल पर पाँचों अंगुलियाँ उछल आई हैं। यह तो पूरा कसाई निकला।’’ कहते-कहते नन्हा फूल भय से पीला पड़ गया। वह कँपकँपाकर डाल से नीचे गिर गया। नन्हे पुष्प को शाखा से गिरते देख एक-एक कर सारे फूल अपनी शाखाओं से टूटकर नीचे जा गिरे। वे सब जमीन पर पड़े-पड़े अंतिम साँसें ले रहे थे। वह बच्चा चौकीदार द्वारा बाहर खदेड़ दिया गया था।
उधर मार खाकर भी वह बच्चा खुश था, उसकी जेब में रंग-बिरंगे फूल जो भरे थे।


एम0आई0जी0 - 8 विजयनगर, जबलपुर - 482002

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कवरेज कम्पलीट


लघुकथा / जुलाई-अक्टूबर 08
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डा0 पूरन सिंह



रामप्रसाद बहुत ही स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्ति था। उसने जब ठाकुर जसवीर सिंह के घर बेगार (गुलामी) करने से मना किया तो ठाकुर साहब के अहंकार को ठेस पहुँची, लगा कि किसी ने सदियों से चली आ रही परम्परा को चकनाचूर किए जाने की नापाक कोशिश की हो। फिर क्या था ठाकुर साहब ने बंदूक उठायी और रामप्रसाद की झोपड़ी की तरफ कूच कर गए।
रामप्रसाद अपनी पत्नी और सवा साल के बच्चे के साथ घर पर ही था। ठाकुर साहब को घर आया देख वह संभला ही था कि ठाकुर साहब ने अपनी दोनाली बंदूक से गोली चला दी। देखते ही देखते रामप्रसाद और उसकी पत्नी भगवान को प्यारे हो गये। मासूम बच्चा मोनू को कुछ ज्ञात नहीं था कि उसके माँ-बाप को आततायी ठाकुर ने मार डाला है। वह कभी रामप्रसाद के मृतक शरीर को देखता तो कभी अपनी माँ को। गाँव में किसी की हिम्मत नहीं थी कि रामप्रसाद के बेटे मोनू को उठाता।
बच्चा एक घंटे तक यों ही तड़पता रहा। एक घंटे के पश्चात पुलिस पहुँच गई और आला आफिसर्स, मीडियाकर्मी क्यों पीछे रहते। आफिसर्स अपनी जाँच-पड़ताल में लग गए और मीडिया-कर्मियों का फोटो सेशन शुरू हो गया। एक महिला मीडियाकर्मी चाहती थी कि मोनू रोए लेकिन मासूम मोनू कभी अपनी माँ के मृत शरीर पर लेट जाता तो कभी अपने पिता के। उसके लिए तो यह एक खेल बन गया था। महिला मीडियाकर्मी ने बहुत चाहा कि बच्चा मोनू रोए लेकिन जब वह नहीं रोया तो उसे लगा कि उसका कवरेज अधूरा रहा जा रहा है। उसने अपने बालों में लगी पिन निकालकर बच्चे मोनू के चूतड़ में चुभो दी। बच्चा असहनीय पीड़ा से बिलबिलाने लगा और चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा था। कैमरे चमकने लगे थे, खुशी से नाचती उस महिलाकर्मी ने अपने कैमरामैन से सिर्फ इतना ही कहा था ’‘वाओ!! कवरेज कम्पलीट!!’’



240 फरीदपुरी,
वेस्ट पटेलनगर,
नई दिल्ली-08

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उल्लू कौन?


लघुकथा / जुलाई-अक्टूबर 08
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विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी



आओ बच्चों एक किस्सा सुनाएँ। भोले बाप बेटे का किस्सा बताएँ। बात थोड़ी सी पुरानी है। मगर इसमें न राजा है न रानी है। एक बाप और उसका बेटा साथ-साथ बाजार जा रहे थे। अपने विचारों में खोए-खोए कुछ बुदबुदा रहे थे। इतने में ही बेटा एक फल के ठेले से टकरा गया। ठेले का सामान बिखर सड़क पर आ गया।
अपना नुकसान देख फल वाले को गुस्सा आया। उसने बेटे को उल्लू का पट्ठा कह बुलाया। यह सुन बाप का सिर भन्नाया। उसको तनिक ताव भी आया। बोला ‘मेरे बेटे ने गलती की है। मगर तुमने गाली मुझे क्यों दी? तुमने मेरे बेटे को उल्लू का पट्ठा कह बुलाया है। सीधा सा अर्थ है कि मुझे उल्लू बताया है। इसे मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा। तुम्हें पकड़ कर दो थाप धरूँगा।’ यह कह कर बाप आगे बढ़ा। पकड़कर ठेलेवाले का गिरहबान सर पर चढ़ा। ठेलेवाले ने भी तैश खाया। दोनों हाथों से बाप को धक्का लगाया। बाप संभल नहीं पाया। एक ही पल में सड़क पर आया।
मुफ्त में तमाशा होने लगा। बाजार में मजमा जमने लगा। ट्रेफिक रुकता देख पुलिस वाला आया। आते ही ठेलेवाले को धमकाया। ट्रेफिक जाम करने का चालान करूँगा। अशान्ति करने पर अन्दर धरूँगा।
पुलिस की डाँट सुनकर ठेलेवाला वाला घबराया। तुरन्त ही समझौते का मार्ग अपनाया। बाप के सामने हाथ जोड़कर दयानीय भाव बनाया। उसको ज्ञानी व स्वयं को उल्लू बताया। ठेलेवाले की बात सुनकर बाप का सिर चकराया। ठेलेवाले के उल्लू बनने की बात पर विरोध जताया। बोला, ऐसे कैसे हो सकता है? ऐसे तो मेरा बेटा खो सकता है। मेरे बेटे को उल्लू का पट्ठा बता रहे हो। अब उल्लू स्वयं बनने जा रहे हो। भरे बाजार में मुझे लूटने जा रहे हो। मेरे बेटे को अपना बेटा बता रहे हो। मैं तेरी बातों में नहीं आऊँगा। अब तो उल्लू मैं ही कहलाऊँगा।

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2 तिलक नगर,
पाली (राजस्थान)

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फोड़ा


लघुकथा / जुलाई-अक्टूबर 08 /
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कमल चोपड़ा



जमीन पर बिछी हुई बोरी पर लेटा हुआ मन्नू बार-बार करवटें बदल रहा था। पास ही झिलंगी सी चारपाई पर लेटा हुआ बापू थोड़ी-थोड़ी देर बाद दर्द से कराह उठता था। बापू के लिए यह बात समझ पाना मुश्किल नहीं था कि भूखा होने के कारण मन्नू को नींद नहीं आ रही है।
कई दिन से काम पर नहीं जा पाया था बापू। पीठ पर फोड़ा निकला हुआ था। उसका काम ही पीठ पर लादकर बोरी ढोने का था। काम बन्द तो आमदनी बन्द। पीठ से ज्यादा पेट में कोई फोड़ा टीसने लगा तो मजबूर होकर काम पर जाना पड़ा उसे....। अभी वह अनाज की एक भी बोरी ट्रक पर लाद नहीं पाया था कि पट्टे से पैर रपट जाने के कारण नीचे गिर पड़ा, जिससे उसकी टाँग की हड्डी टूट गई थी। मालिक ने बस इतना किया कि उसकी टाँग पर प्लास्टर चढ़वाकर उसे घर भिजवा दिया था।
रोज कुआँ खोदकर रोज पानी पीने वाला मामूली पल्लेदार था वह। पीठ पर फोड़ा था ही, ऊपर से टाँग की हड्डी और टूट गई। आमदनी बन्द, ऊपर से इलाज का खर्चा। दो साल पहले उसकी बीबी हैजे से न मरी होती तो लोगों के घरों का चैका बर्तन करके किसी तरह उन बाप-बेटे को संभाल लेती पर....।
फोड़े, भूख और टूटी हड्डी के दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश करते करते बाप की आँखों से पानी बहने लगा था। दिहाड़ीदार के हाथ-पाँव सलामत रहें तो ठीक वर्ना.... टूटी रीढ़ वाले कुत्ते से भी बदतर हालत हो जाती है उसकी। कोई उम्मीद, कोई हिफाजत, कोई सहारा कुछ भी नहीं।
हाथ बढ़ाकर बापू ने नीचे बोरी पर लेटे हुए मन्नू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-‘‘नींद नहीं आ रही? भूख लगी है ना?’’
एकदम से उठकर बैठ गया मन्नू-‘‘नहीं बापू, भूख तो लगी थी पर मैंने पेट भर के खूब सारा पानी पी लिया। देखो अब मेरा पेट तो भरा हुआ है।’’
तड़फकर रह गया बापू-‘ये छोटा सा बच्चा। अभी से बर्दाश्त और दरगुजर करना सीख गया है। इतनी सी उम्र में मजबूर होकर ‘हार’ जाना सीख गया है, बड़ा होकर क्या कर पायेगा? एक इसी से कुछ उम्मीदें थीं लेकिन यह भी।’ विवश होकर बाप कलपने लगा था। ‘गाँव में था तो प्रधान के खेतों पर पसीना बहाकर अन्न उपजाता था। तब भी यही हालत थी। गाँव से शहर आया। यहाँ अनाज की बोरियाँ ट्रकों में चढ़ाता उतारता है। अब भी यही हालत है। खेतों और गोदामों में रहने के बावजूद भूख। अब यहाँ से कहाँ जायें?’
‘‘बापू गोदाम वाले लाला की टाँग पर चोट लग जाये तो उसे तो खाने को मिलता रहेगा ना? उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा? बापू लोग तो कहते हैं जो बोता है वही काटता है, लेकिन बोता मजदूर है और काटकर खाता है लाला। बापू ऐसा क्यों नहीं होता, जो बोये वही काटे, वही खाये?’’

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1600/114, त्रिनगर,
दिल्ली-35

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भिखारी बालक


लघुकथा / जुलाई-अक्टूबर 08
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ओमप्रकाश ‘मंजुल’



वह भिखारी बालक किसी भिखारी का ही बालक था, उसकी भाषा और भूषा दोनों से ही यह स्पष्ट आभास हो रहा था। कालेज से लौटकर आते समय मैंने उसे अपने पड़ोसी के दरवाजे पर भीख माँगते हुए देखा था। वह जाली वाले किवाड़ों से अन्दर झाँकते हुए कह रहा था,‘‘मोर माता! थोड़ा आटा दै देस’’ वह गोरा चिट्टा पर मैला-कुचैला था। बादामी रंग का फटा-गंदा कुर्ता और सिलाई उधड़ रहा सफेद चीकट पाजामा वाला यह अल्हड़ बालक बामुश्किल आठ वर्ष का रहा होगा, पर लम्बाई से दस-ग्यारह साल का लग रहा था। अमूमन मंगतों के बच्चे इतनी जल्दी-जल्दी नहीं बढ़ते, जितनी त्वरा से भारत की सामूहिक और सांविधिक पोल खोलने वाली यह कोमल काया बढ़ती दिखाई दी खैर.....।
घर आकर मैंने तेजी से बाहरी वस्त्र उतारे और हाथ, मुँह तथा पैर धो करके मुख्य द्वार के समक्ष वाले बरामदे में भोजन करने बैठ गया। मैं लगभग आधा भोजन कर चुका था तभी कानों में आवाज आई ‘‘माता! ओ मोर माता! थोरा आटा दै देस।’’ दरवाजे पर खड़ा वही लड़का टीन का कटोरा आगे बढ़ाये यह वाक्य कहे जा रहा था।
भिक्षा देने से पूर्व भिखारी की भिक्षाटन योग्य स्थिति का अवलोकन आकलन कर लेना मेरी आदत रही है। इसी वृत्ति की बाध्यतावश मैंने वहीं से उससे कड़ककर कहा, ‘‘अभी से भीख माँगने की आदत डाल रहा है, कोई काम-धाम नहीं किया जाता?’’ वह बोला, ‘‘बाबूजी! का करे? कुछ करै लाग जाई, ताबै पुलिस पकड़ै आ जाई।’’ यकायक मुझे 14 वर्ष से छोटे बच्चों द्वारा शारीरिक श्रम का संवैधानिक अपराध वाला सरकारी कानून याद आ गया। उस पर दया तो मुझे पहले ही उसके नाजुक बदन के कारण आ रही थी। मैं तो उसके सामने सख्त होने का मात्र स्वांग कर रहा था। मैंने पूछा, ‘‘बेटा! खाना खाओगे?’’ बोला, ‘‘हाँ।’’ पत्नी दो रोटियाँ और थोड़ी सी सूखी सब्जी उसके कटोरे में रख आई। चबूतरे पर उस समय कड़ाके की धूप थी और सामने सड़क पर कुछ उधर हटकर सामने के मकान की छाया पड़ी थी। पत्नी जब उसके कटोरे में भोजन रख रही थी तभी लड़के ने कातर दृष्टि से उनसे अनुमति माँगते हुए अनुनय की, ‘‘का वाहाँ छइयाँ मां ही बइठ जाये माता?’’ मानो सड़क और सड़क की छाया पर भी अमीरों का विशेषाधिकार हो, पत्नी द्वारा ‘बैठ जाओ’ कहे जाने पर उसने छाया में बैठकर बहुत धीरे-धीरे से रोटियाँ खाईं। एक तो, वह खा कम रहा था, भांैचक्का सा होकर सामने की बिल्डिंगों को गौर से देखे जा रहा था दूसरे आज के जमाने में बिना प्याज, लहसुन की सब्जी हम जैसे कुछ जानवर जैसे व्यक्ति ही खाते होंगे, हाई-फाई सोसाइटी में संभ्रांतजन नहीं। पत्नी ने उससे जब और रोटी लेने को पूछा, तो उसने असमर्थता व्यक्त कर दी और पानी पीकर आगे बढ़ने लगा। दो-चार कदम चलने के बाद वह मुड़कर फिर दरवाजे के सामने आ गया और बोला, ‘‘माता! कोई पैंट दे देई’’ पत्नी ने कहा, ‘‘रुको देख रहे हैं।’’ थोड़ी देर बाद अंदर से निकल कर दरवाजे पर जाकर उसने बालक से कहा, ‘‘बेटा! पैंट तो है, पर बड़ी है वे तुम्हें फिट नहीं होगीं।’’ यह सुनकर लड़का चला गया पर उसकी भाव मुद्रा से ऐसा नहीं लगा कि उसे पत्नी की इनकार बुरी लगी हो। लौटकर आती हुई बोली, ‘‘बेचारा बड़ा सीधा है।’’ मैंने कहा ‘‘निसंदेह, लगता है अभी भिक्षाटन का प्रशिक्षण ले रहा है। अगर थोड़ा भी टेंªड और चालाक होता तो बड़े भाई के लिए ही पैंट माँग लेता।



कामायनी,
मो0-कायस्थान पूरनपुर
(पीलीभीत) उ0प्र0

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लघुकथा

लघुकथा ======= मार्च - जून 06

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बदलाव
रश्मि दुबे
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मेरे आगे की सीट पर बैठा वह मेरी चेन और अंगूठी को ललचाई नजरों से देख रहा था। खुद को उस इलाके का ‘डान’ बताते हुये गालियों के द्वारा वह गाड़ी के लोगों को और शायद मुझे डराने का प्रयास कर रहा था। पन्द्रह दिन पहले ही जेल से छूटा हूँ ‘मर्डर के केस में’ कह कर स्वयं को ‘पक्का’ और भयंकर जताने की कोशिश में लगा हुआ था। ‘‘एक में अंदर हुआ तो एक और सही, कोई माई का लाल आंख उठाने की हिम्मत तो करे। .......पर सुधरना चाहिये आखिर घर-बार, बीवी-बच्चे हैं उनका भी तो ख्याल रखना है ......‘‘खुद ही बड़बड़ाता और बीच-बीच में अपनी हैवानियत की भी याद दिलाता जाता। मैंने उसकी आँखों में देखा और पढ़ने का प्रयास किया उसकी बैचेन आवाज को, जिसमें इस बात का स्पष्ट संकेत था कि बिना किसी जुर्म के हत्यारा बना देने पर आज स्वयं को हत्यारा महसूस कर रहा था वह !
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दोस्ती
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मैं अस्पताल में बैठी अपने पापा का इंतजार कर रही थी जो मेरी एक्सरे रिपोर्ट लेने गये थे। पास की कुर्सी पर मेरी हर उम्र लड़की शून्य में निहारती, आँखों में दिल का गुबार लिये बैठी हुयी थी। बहुत कोशिश की उससे बात करने की पर एक अजनबी से बात करने की हिम्मत न हुयी। फिर भी औपचारिकता के नाते मैंने उसके आने का कारण पूछा। जैसे वह इसी प्रतीक्षा में थी। उसकी आँखों की रक्तिम रेखायें और भी लाल हो गयीं। आँखों के रास्ते दिल का तूफान बह ही गया ‘‘मेरे पापा ........... आई. सी. यू. में भर्ती में है। एक्सीडेंट हो गया है। बैलेंस बिगड़ जाने से गाड़ी पुल पर लटक गयी। पापा ने गाड़ी को संभालते हुये एक-एक सवारी को नीचे उतारा और खुद फंस गये। उनके जरा भी हिलने पर गाड़ी नदी में गिरने लगती। जिनकी जान बचाई वे भी तमाशबीन बने रहे और अपने रक्षक की रक्षा न कर सके। जिंदगी और मौत के बीच झूलते पापा जैसे ही पीछे आये गाड़ी 25 फुट नीचे गहरी नदी में गिर गयी ....’’ कहते-कहते वह फूट-फूट कर रोने लगी .... ‘‘सुनते ही मम्मी को अटैक पड़ गया। मेरे मम्मी और पापा दोनों इसी अस्पताल में है। छोटे भाई-बहन हैं, उन्हें संभालने के लिये मैं हिम्मत बाँधे हुये थी, तुमसे दिल की बात कह दी, दिल हल्का हो गया। सब ठीक तो हो जायेगा न ?’’ कहते हुये उसने मेरे हाथों पर हाथ रखा। उसकी आँखों के सागर की अथाह लहरें अब थमती नजर आ रही थीं। मैंने उसकी हथेलियों को अपनी हथेलियों में थाम कर उसे साँत्वना दी। मैं कुछ कह पाती कि ‘‘दीदी ........पापा ......’’ सुनकर वह अंदर की ओर दौड़ी। एक पल को उसने पीछे मुड़कर देखा और जैसे मुझे धन्यवाद किया कि मैंने एक अच्छे दोस्त की भाँति उसके मन का बोझ उतारने में उसकी सहायता की। मैं मन ही मन उसके माता पिता के स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना कर दोस्ती की नई परिभाषा गढ़ने लगी।

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49/144, डी. डी. ए. फ्लैट्स दक्षिणपुरी, नई दिल्ली

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

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